आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

उनकी अंगीठी का कोयला

यशवंत व्यास

Updated Fri, 07 Sep 2012 10:20 AM IST
old coal of his warmer
वे कबाड़ से पुरानी अंगीठी निकाल लाए हैं। भुट्टे बाजार में हैं। वे सेंककर खाना चाहते हैं। कोयले की समस्या है। पत्नी का मानना है कि लकड़ी का कच्चा कोयला इस काम के लिए ठीक रहता है और वे पत्‍थर वाली खदान के कोयले पर भरोसा करना चाहते हैं। कच्चे कोयले को जरूरी हवा से आंच लेने लायक बनाया जा सकता है। पक्का कोयला मुश्किल से दहकता है। लेकिन देर तक आंच देता है। बड़ी मुश्किल है। कोयले को लेकर उनकी स्मृति दलाली और काले हाथ वाले मुहावरे से ऊपर नहीं जाती। दोनों किस्म के कोयले हाथ काले करते हैं, लेकिन बात आंच और भुट्टे के बीच अंतर्संबंध की है। वे स्वाद आदि पर कोई समझौता नहीं करना चाहते, इसलिए बार-बार सोच रहे हैं कि कोयले और दलाली से हटकर आगे बढ़ें।
'तुम ऐसा क्यों चाहती हो कि मैं लकड़ी के कच्चे कोयले ही लेकर आऊं? '
'पुराना अनुभव है। कच्चे कोयले पर हवा करके भुट्टे सेंकती रही हूं।'
'तुम्हारे हाथ कभी काले हुए?'
'मैंने भुट्टों पर ध्यान दिया, आंच पर ध्यान दिया, हाथों को खामख्वाह देखने की जरूरत क्या थी? वैसे वे हाथ ही थे, जो आंच को हवा देते थे और पलटते थे।'
'मान लो पक्के कोयले ले आएं, तो कोई दिक्कत होगी?'

'और तो कुछ नहीं। मुझे लगता है पक्के कोयले में ज्यादा पक्की दलाली होती होगी। यहां तक कि कोयले और काले हाथ के बीच मुझे संदेह रहता है। कभी कोयले का बना हुआ हाथ निकल आता है। तब हम नैतिक संकट में फंस जाते हैं। हाथ तो हाथ ठहरा। कोयले के भाव थोड़े ही डाल देंगे।'
इस वार्ता के बाद वे और ज्यादा परेशान हो गए। उनकी इच्छा हुई कि देश के महानियंत्रक लेखा परीक्षक से बात कर लें। पता तो चले कि हाथ के हिसाब से दलाली तय होती है या दलाली के हिसाब से हाथ तय होते हैं? या दलाली वाले हाथ अलग होते हैं और काले होने वाले हाथ अलग?
कभी कभी खदान में फंसे मजूदरों की तस्वीरें उन्होंने देखी हैं। मजदूर तो काले ही लगे। उनके हाथ क्या, शरीर ही काला था। तो दलाली के क्षेत्र में उनका क्या स्‍थान होना चाहिए? जाहिर है, मजदूर दलाली खाने लायक नहीं होते। उन्हें सिर्फ मजदूरी मिलनी चाहिए, इसलिए इस कालिख का आधार कहीं और होगा।

उन्होंने हीरे के बारे में सोचा, आत्मा के बारे में सोचा और खदानों के ठेके के बारे में सोचा। हीरा भी कोयले का ही एक अलग रूप है। आत्मा हीरे जैसी होती है, तो प्रणम्य होती है। मगर खदानों के ठेके आत्मा के हिसाब से नहीं उठते। वे कालिख की संभावनाओं के आधार पर उठते हैं, इसलिए हीरे को इस बहस के बीच लाना ठीक नहीं है।
'मान लो मैं तुम्हें एक हीरे की अंगूठी दूं, तो क्या कार्बन के उस रूप से तुम्हारे चेहरे पर कोई काला असर पड़ेगा? ' उन्होंने पूछा।

'ठीक है, ले आओ। पर पहनने से पहले मैं तुम्हारे हाथ देखूंगी। हीरे की अंगूठी लाने के लिए कोयले की दलाली का आदर्श चाहिए। मैं दमकती अंगूठी पहनना चाहती हूं, लेकिन तुम्हारे हाथों में कालिख देखना असंभव जान पड़ता है। आखिर अंगूठी लाओगे कहां से?'

'सरकार और महानियंत्रक एवं लेखा परीक्षक के बीच जहां से गुंजाइश निकल आए, वहां से।'
'तब तो बात संसदीय लोकलेखा समिति में फंस जाएगी और मेरी अंगुली सूनी रह जाएगी।'
उन्होंने पत्नी की अंगुलियों की तरफ देखा। कई सालों से रोटियां पकाते-पकाते उनकी शक्ल बदल गई थी। वे हर बार सोचते थे कि घर का साबुन बदल दें, ताकि विज्ञापनों के हिसाब से आए नए साबुन से उसकी अंगुलियां सुरक्षित और सुंदर रह सकें। वे कई बार चाहते थे कि वह शानदार मेहंदी लाकर लगाएं, जिनका जिक्र शाहरुख खान की फिल्मों में होता है। कभी-कभी उन्होंने सोचा कि वे भट्टी में तपकर कुंदन होने के मुहावरे से प्रेरित होकर जीवन को जिएं। एक न एक दिन उनकी आत्मा जिंदगी की भट्टी में तपकर कुंदन होगी तो पत्नी के सामने उनके हाथों में कालिख देखने की आशंका ही नहीं रहेगी।
उन्होंने एक कोशिश और की।
'चलो पहले भुट्टे तो खरीद लाएं। फिर तय करेंगे कि अंगीठी पर कोयला कौन-सा जलाएंगे।'
कोशिश बेकार साबित हुई। बारिश तेज हो गई थी। टीवी बता रहा था कि ओलंपिक से मेडल जीतकर लौटे सुशील कुमार के घर के बाहर डेढ़-डेढ़ फीट के गड्डे हैं और इंडिया गेट पर जुलूस चल रहा है। पत्नी ने कहा, 'मेडल से देश कितना खुश है। चलो बारिश हो रही है।'
उन्होंने गहरी सांस ली,' देश गड्डे में यकीन करता है। कोई आदमी अपनी मेहनत से ओलंपिक से मेडल ला सकता है, लेकिन अपने घर के सामने के गड्डों से हार जाता है। आखिर वह मेडल समेत घर कैसे पहुंचेगा?'

पत्नी ने कहा,'वैसे ही जैसे बिना कालिख के तुम्हारा भुट्टा सिंकेगा।'
एक खामोशी छा गई।
न भुट्टे थे न कोयला।
अंगीठी सूनी पड़ी थी।
जब तक तय न हो जाए कि कोयला कौन सा हो तब तक वे क्या करेंगे? उन्हें कांग्रेस और कोयला मंत्री से पूछना चाहिए कि वह कौन सी तरकीब है जिससे कोयला भी उठ जाए और हाथ काले भी न हों। आखिर देशवासियों को भुट्टा खाने में सरकार से इतनी मदद तो मिल ही सकती है।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

coal scam congress bjp

स्पॉटलाइट

इस तरह से रहना पसंद करते हैं नए नवेले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017
  • +

बारिश में कपल्स को रोमांस करते देख क्या सोचती हैं ‘सिंगल लड़कियां’

  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017
  • +

शाहरुख को सुपरस्टार बना खुद गुमनाम हो गया था ये एक्टर, 12 साल बाद सलमान की फिल्म से की वापसी

  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017
  • +

बिग बॉस ने इस 'जल्लाद' को बनाया था स्टार, पॉपुलर होने के बावजूद कर रहा ये काम

  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017
  • +

इस मानसून फ्लोरल रंग में रंगी नजर आईं प्रियंका चोपड़ा

  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017
  • +

Most Read

मिट्टी के घर से रायसीना हिल तक का सफर

Travel from mud house to Raisina Hill
  • गुरुवार, 20 जुलाई 2017
  • +

तेल कंपनियों का विलय काफी नहीं

oil companies merger is not enough
  • सोमवार, 24 जुलाई 2017
  • +

खतरे में नवाज की कुर्सी

Nawaz government in Danger
  • शनिवार, 22 जुलाई 2017
  • +

परिवहन की जीवन रेखा बनें जलमार्ग

waterways be lifeline for transportation
  • सोमवार, 24 जुलाई 2017
  • +

विपक्ष पर भारी पड़ते चेहरे

Faced with overwhelming faces on the opposition
  • बुधवार, 19 जुलाई 2017
  • +

बच्चों को चाहिए ढेर सारी किताबें

Children should have a lot of books
  • बुधवार, 19 जुलाई 2017
  • +
Top
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!