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हे नीति के ईश्वरों, आग बहुत मुलायम है!

Varun Kumar

Varun Kumar

Updated Thu, 16 Aug 2012 01:17 PM IST
O god of policy the fire is so soft
देश में जितने भी भावी प्रधानमंत्री हैं, वे अचानक प्रसन्न हो उठे हैं। हमारे एक पुराने साथी का विचार है कि वे भी प्रधानमंत्री हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल बाकी को मौका देना चाहते हैं। तब तक वे एक साबुन फैक्टरी की योजना बना रहे हैं। 'आप प्रधानमंत्री कैसे हो सकते हैं? आप तो कांग्रेस में कभी रहे नहीं।' मैंने पूछा। 'जो भी प्रधानमंत्री होगा, वह अंततः कांग्रेसी ही होगा। क्योंकि, कोई भी उत्तम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री अंततः मूल कांग्रेस या कांग्रेस की खराब फोटोकॉपी बन चुकी पार्टी का ही हो सकता है।' उन्होंने साबुन फैक्टरी का नक्शा दिखाते हुए कहा।
'यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कई ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं, जिन्होंने कभी सोचा नहीं था कि उन्हें टिकट भी मिलेगा, लेकिन वे प्रधानमंत्री हो गए।' उन्होंने आग तथा डिटर्जेंट के साथ गंदगी और विज्ञापन का अंतर्संबंध समझाते हुए स्पष्ट किया, 'लेकिन ऐसा भी है कि कई ऐसे हैं जिन्होंने सोचा कि उन्हें हर हाल में प्रधानमंत्री बनना है, इसलिए वे कांग्रेस या कांग्रेस जैसों की मदद से प्रधानमंत्री बन गए।'

'आप विचारों की मिलावट कर रहे हैं।' मैंने उन्हें रोका। 'विचार क्या है?' उन्होंने एक सुप्रसिद्ध साबुन का रैपर हटाकर दिखाते हुए कहा, 'निरंतर सिद्धांतों की क्रमबद्ध मिलावट का नाम विचार है। अब अगर यह साबुन शिवसेना के लोग लगाएंगे, तो आप उसे सेक्यूलर मानेंगे या नहीं?' 'पता नहीं। अब तक तो वह सांप्रदायिकता के खाते में गरियाई जाती रही है।'

'वह भावी राष्ट्रपति बनाने में सेक्यूलर कांग्रेस की मदद करेगी और कांग्रेस प्रसन्न है। कांगेस का साबुन बिक रहा है।' 'लेकिन आपको भी प्रसन्न होना चाहिए। स्वच्छता तंत्र का मूल है। यह सर्वोच्च पद के लिए सर्वानुमति का सुंदर आधार है।' 'यह सुंदर आधार ही है, कि अयोध्या रथयात्री आडवाणी के साथ सालों साल आनंद भाव में प्रकाशमान होते गए एक भावी प्रधानमंत्री भी अचानक सर्वोच्च पद के लिए विचारों के उसी बिंदु पर प्रस्थान कर गए हैं, जहां शिवसेना ने विश्राम पाया है।''इसका साबुन, स्वच्छता और सेक्यूलर होने से क्या संबंध है? '

'मैं आपको समझाता हूं।' कहकर वे भीतर गए और बाहर आए, तो कई डिटर्जेंट पाउडर के थैले, साबुन के रैपर और बाल्टियां साथ थीं। उन्होंने एक-एक करके रहस्य खोलना शुरू किया। मान लीजिए, आपको प्यास लगी है, डकैत को भी प्यास लगी है और गंगा मैली करने वाले को भी प्यास लगी है। तीनों एक ही पानी से एक-सी प्यास बुझा सकते हैं। इसी तरह मान लो, आग लगी है। वह फैलती जाएगी तो विवाह पत्रिका, मार्क्सवादी किताब या हिटलरवादी दर्शन को समान भाव से जलाती हुई निकल जाएगी।

आग और पानी, वर्ग चेतना से मुक्त होते हैं। उसी तरह साबुन भी क्षुद्र चीजों से ऊपर होता है। उन्होंने बताया कि बाल्टी में डिटर्जेंट गिरते ही अपने ब्रांड से मुक्त हो जाता है। इसी तरह रैपर से निकलते ही साबुन अपने ब्रांड से मुक्त हो जाता है। मैं जो प्रधानमंत्री बनना छोड़ साबुन फैक्टरी लगाने की सोच रहा हूं, वह इसीलिए महत्वपूर्ण है। मैं अपने ब्रांड से मुक्त हूं इसलिए प्रधानमंत्री होने में मुक्ति का शास्त्र रच सकता हूं।

मुझे हैरत हुई। वे नीतियों का ईश्वर होना चाहते थे, पर नीतीश कुमार के बारे में नहीं बोलते थे। वे आग पर बात कर रहे थे, पर बताते नहीं थे कि आग विचार कर लगाई जाए तो वह चुनकर कुछ फाइलों को जलाती, कुछ को छोड़ती निकल जाती है। वे आग के मुलायम मुहावरे गढ़ते थे, पर उनके बयान में मुलायम सिंह यादव का नाम नहीं था। वे उन ठंडे अंगारों के जिक्र को भी उड़ा गए, जो बिना ब्रांड के करुणानिधि के घर से जनपथ तक बिछे जाते हैं। वे प्रधानमंत्री की रेस में नहीं है, बस अपनी साबुन फैक्टरी पर काम कर रहा है। हे नीति के ईश्वरो, आग बहुत मुलायम है। वे उसकी आंच पर जो साबुन पकाएंगे उसका ब्रांड 2014 में पूछना।
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