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व्यक्ति नहीं, परिवार अहम

रीतिका खेड़ा

Updated Fri, 02 Aug 2013 09:25 PM IST
Not Per capita, per households
यह दुर्भाग्य की ही बात है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को अध्यादेश के जरिये लाना पड़ा। फिर भी यह एक सकारात्मक घटना है, क्योंकि इसमें लाखों गरीब परिवारों की भूख मिटाने की क्षमता है। चूंकि इस पर संसद की मुहर लगनी है, इसलिए इसके कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालना जरूरी है, ताकि संसद में इस पर होने वाली चर्चा में लाभ हो।
प्रस्तावित कानून स्कूली बच्चों को मिड-डे मील, गर्भवती महिलाओं को मातृत्व लाभ एवं छह वर्ष तक के बच्चों को आंगनबाड़ी के जरिये पौष्टिक आहार की गारंटी देता है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों की 75 फीसदी और शहरी क्षेत्रों की पचास फीसदी आबादी को पीडीएस से प्रति महीने प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच किलो अनाज दिया जाएगा। इस समय केंद्र के नियमों के मुताबिक, गरीबी रेखा से नीचे के प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम अनाज प्रति महीने दिया जाता है। हालांकि कई राज्यों ने इसे घटाकर 25 या 20 किलो कर दिया है। प्रति व्यक्ति के आधार पर अनाज देने के पीछे मुख्य तर्क इसे न्यायपूर्ण बनाना है, ताकि बड़े परिवारों को उनका उचित हिस्सा मिले। यदि प्रति व्यक्ति मॉडल को लागू किया गया, तो सात से अधिक सदस्यों वाले परिवारों को फायदा होगा। नेशनल सैंपल सर्वे के 2009-10 के आंकड़ों के मुताबिक, केवल दस फीसदी ग्रामीण परिवारों में ही सात से अधिक लोग हैं। एक या दो सदस्य वाले परिवार काफी हद तक ऐसे बहुत नाजुक और कमजोर वर्ग के होते हैं, जैसे कि एकल महिला या बूढ़े-बुजुर्ग। इन्हें ज्यादा देने में कोई अन्याय नहीं है। जिस एकल नारी को आज 25 किलो मिल रहा है, उन्हें कल पांच किलो ही मिलेगा। ऐसे में प्रति व्यक्ति मॉडल के मुकाबले मौजूदा प्रति परिवार वाला मॉडल ही संभवतः ज्यादातर परिवारों के लिए फायदेमंद होगा।

इसके अलावा कुछ लोग तर्क देते हैं कि प्रति व्यक्ति वाला मॉडल उन परिवारों की धोखाधड़ी को रोकेगा, जो अपना अधिकार बढ़ाने के लिए अलग परिवार दिखाते हैं। यह एक ऐसा खतरा है, जो प्रति व्यक्ति वाले मॉडल में ज्यादा हो सकता है। आखिरकार, कुल आबादी अच्छी तरह से परिभाषित है और परिवारों की गिनती के मुकाबले लोग उससे अच्छी तरह से वाकिफ हैं। इसलिए राज्यवार अनाजों के आवंटन के लिहाज से यही बेहतर है।

आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु में प्रति व्यक्ति के हिसाब से अनाज देने से तीन तरह के नुकसान उभरकर सामने आए हैं। पहला, प्रति परिवार वाला मॉडल यह सुनिश्चित करता है कि लोग अपने अधिकार से वाकिफ हैं। स्पष्ट एवं एक समान अधिकार से यह सुनिश्चित होता है कि लोग ठगे नहीं जाते। प्रति व्यक्ति मॉडल में परिवारों के हिसाब से अधिकार में अंतर आएगा। लोग यह नहीं समझेंगे कि उनके पड़ोसी को उनसे ज्यादा अनाज क्यों मिलता है। सबसे बुरी बात है कि स्पष्टता के अभाव में पीडीएस दुकानदार द्वारा भ्रम फैलाकर लोगों का दोहन बढ़ जाएगा और परिवारों को कम अनाज दिया जाएगा।

दूसरा नुकसान यह है कि प्रति व्यक्ति वाले मॉडल से उत्पीड़न के रास्ते खुलेंगे। जब कोई बच्चा जन्म लेगा, तो राशन कार्ड में उसका नाम जुड़वाने में परेशानी होगी, इसके लिए घूस भी मांगी जा सकती है। जिन राज्यों में प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है, वहां भी ऐसी परेशानी हो सकती है, जैसा कि इन दोनों दक्षिणी राज्यों में देखा गया है।

तीसरी बात यह है कि प्रति व्यक्ति के हिसाब से अनाज देने से मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, खासकर छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, और कुछ हद तक राजस्थान जैसे राज्यों में, जहां अभी प्रति परिवार वाला मॉडल अच्छी तरह से चल रहा है। कोई भी परिवर्तन न सिर्फ परेशानी बढ़ाएगा, बल्कि इससे क्रियान्वयन में भी देरी होगी। कुछ राज्यों ने प्रति व्यक्ति मॉडल का विरोध किया है। इसके अलावा, प्रति व्यक्ति मॉडल के साथ एक जोखिम यह है कि लोग झूठे सदस्यों का नाम राशन कार्ड में दर्ज करवाएंगे। ऐसी धोखाधड़ी को रोकने के लिए पीडीएस को बॉयोमिट्रिक्स से जोड़ने की मांग बढ़ रही है। विशिष्ट पहचान पत्र के साथ नकद हस्तांतरण को जोड़ने की पायलट योजना की अब तक नकारात्मक समीक्षा ही आई है। महीनों बाद भी इसमें गरीब लोग शामिल नहीं हो पाए हैं। यदि पीडीएस को बॉयोमिट्रिक्स से जोड़ा जाता है, तो इसकी भी स्थिति वैसी ही होगी। राज्यों को प्रति व्यक्ति मॉडल अपनाने के लिए मजबूर किए बिना ही न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है। वैकल्पिक रूप से केंद्र सरकार संभावित लाभार्थियों के आधार पर राज्यों को अनाज आवंटित कर दे और यह राज्यों के ऊपर छोड़ दे कि वे कौन-सा तरीका अपनाते हैं।

सामान्य तौर पर राज्यों के प्रति लचीला रुख अच्छा सिद्धांत है और प्रति व्यक्ति मॉडल पीडीएस के अत्यधिक केंद्रीकरण की चिंता को बढ़ाता है। इस के पर्याप्त सुबूत हैं कि हाल के वर्षों में विकेंद्रीकृत पहल ने पीडीएस को पुनर्जीवित करने में खासा योगदान दिया है। इस विधेयक में पीडीएस से संबंधित ज्यादातर सुधार राज्यों के अनुभव के आधार पर हुए हैं। जब तक संसद का अगला सत्र शुरू नहीं होता, विधेयक का भविष्य अनिश्चित है। सरकार के आधे-अधूरे प्रयास, विपक्ष एवं सहयोगी दलों के विरोध बहुत आश्वस्त नहीं करते। इस बीच लाखों लाभार्थी परिवार अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। एक उम्मीद है कि जिन सांसदों ने खाद्य सब्सिडी का लाभ उठाया है, वे इन वंचित परिवारों के बारे में सोचेंगे।
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