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विचारों की परिधि, शब्दों का गणतंत्र

निर्मल वर्मा

Updated Sat, 25 Jan 2014 07:39 PM IST
nirmal verma poems
मशहूर कथाकार निर्मल वर्मा ने कहा था-''दुनिया में भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है, जो अपनी गरीबी, राजनीतिक सनकीपन और प्रशासनिक अराजकता के बावजूद अब तक अपने भीतर एक ऐसे लोकमानस की भूमिका संभाले है, जहां एक लेखक की कल्पना आज भी अपेक्षाकृत मुक्त भाव से सत्य और भ्रम, माया और यथार्थ, सनातन परंपरा और इतिहास की छायाओं के बीच विचर सकती है।''
यहीं से बनती है विचारों की परिधि और यहीं बनता है शब्दों का गणतंत्र। शब्दों के इस गणतंत्र में मिथक और यथार्थ के साथ-साथ सपने भी होते हैं। मगर ठीक इसी वक्त याद आते हैं येट्स जब वे कहते हैं-''सपनों में ही हमारी जिम्मेदारियां शुरू होती हैं।"

सवाल यह भी है कि एक गणतंत्र में लेखक या कवि की क्या जिम्मेदारी बनती है? जाहिर है, इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने में शब्द अपने लेखकों या कवियों से असीम साहस की मांग करता है। लाल सिंह दिल ऐसे ही कवि थे। पंजाबी भाषा के इस कवि के शब्दों में आपको एक ऐसा गणतंत्र दिखेगा, जिसमें कुछ छिपाया नहीं गया। सच को सच की तरह स्वीकार किया गया है। दिल जब तक रहे, एक नए समाज का सपना देखते रहे।

हाल ही में आधार प्रकाशन (पंचकूला) से हिंदी में अनुदित होकर उनकी प्रतिनिधि कविताओं की एक किताब आई है। कविताओं का अनुवाद सत्यपाल सहगल ने किया है।

इस गणतंत्र दिवस पर उस किताब से उनकी दो कविताएं-

1. शीशे की कैद
किसी के रहम पर
कुछ भी मंजूर नहीं
कोई स्वर्ग
कोई धर्मराज का राज
या कोई 'समाजवाद'
आप जरा हमें यह बताओ
कि आप हमारे लिए
कुछ करने वाले कौन होते हो?
आपको बहुत 'फिक्र' है
हमारा खून बहने की
और लहू को संभालने के लिए
जिन मर्तबानों का तुम
जिक्र करते हो
उनको ठोकरों के साथ
लोग तोड़ डालेंगे
शीशों में चमकना हमें मंजूर नहीं
कोई भी रंग उजाले का
कोई सपना कहीं का भी
किसी के रहम पर
कुछ भी हमें मंजूर नहीं।

2. देश
एक मेरे वतन की दूसरी शक्ल है
एक मेरी कौम कोई और भी है
जहां कहीं एक भी मुहल्ला
अध-भूखा
अध-सोया
सो रहा है-
कहीं भी जहां मेहनतकश
दुख रहे अंगों का दिल बहलाने के लिए तारे गिनें
मेरे देश से दूर
जहां कहीं भी
वह मेरा वतन है
कहीं भी बसती
वह मेरी कौम है
जब भी कभी मैं इस
अपने वतन का कोई गीत
गाने के लिए
छेड़ता हूं सितार
सागरों के पार से चले आते स्वांग
कौन है जो इनका स्वागत करे?
कौन है जो इन सरहदों के साथ
हर साल खून के दरिया बहाए?
एक मेरे वतन की दूसरी शक्ल है
एक मेरी कौम कोई और भी है।
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