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किताबों के कारोबार में नया खेल

सुभाष गाताडे

Updated Thu, 15 Nov 2012 01:05 AM IST
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दक्षिण अमेरिका के मुल्क कोस्टारिका की राजधानी सान जोस और भारत की राजधानी दिल्ली में क्या समानता है? निश्चय ही इसका जवाब आसान नहीं है। अलबत्ता दोनों में इस बात पर साझापन दिखता है कि दोनों ही शहरों के छात्र प्रकाशन उद्योग में मुब्तिला कॉरपोरेट किस्म के मालिकानों द्वारा पाठ्यपुस्तकों की फोटोकॉपी पर लगाई जा रही बंदिशों को लेकर उद्वेलित दिखते हैं। पिछले दिनों से जहां दिल्ली विश्वविद्यालय की सड़कों पर सैकड़ों की संख्या में उतरे छात्र इस बात की गवाही दे रहे थे, वहीं सान जोस में आयोजित प्रदर्शन में हजारों की संख्या में शामिल छात्र शैक्षिक मकसद के लिए पाठ्यपुस्तकों की फोटोकॉपी के अपने अधिकार की मांग बुलंद कर रहे थे।
मालूम हो कि कोस्टारिका की राष्ट्रपति चिचिंला ने बौद्धिक संपदा अधिकारों के नाम पर किताबों की फोटोकॉपी रोकने के प्रस्ताव पर पिछले दिनों मुहर लगाई है। प्रदर्शनकारी छात्रों का मानना था कि शिक्षा एवं ज्ञान के जनतांत्रिकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि शैक्षिक कार्यों के लिए फोटोकॉपी के प्रयोग को कानूनी बनाया जाए। जहां तक दिल्ली के छात्रों का सवाल है, तो यही प्रतीत हो रहा है कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस तथा टेलर ऐंड फ्रांसिस जैसे अकादमिक प्रकाशनों के क्षेत्र के अग्रणी संस्थानों द्वारा एक अदद फोटोकॉपी दुकान के खिलाफ दर्ज 65 लाख रुपये हर्जाने का मुकदमा एक स्थानीय किस्म का मामला है।

इन अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रकाशकों द्वारा न्यायालय की शरण लेने के बाद मामले को लेकर जबरदस्त चर्चा छिड़ी है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पिछले दिनों पुणे में भी चंद बड़े कॉरपोरेट प्रकाशकों ने इसी तरह कुछ फोटोकॉपी दुकानों को निशाना बनाने की कोशिश की और हवाला यही दिया कि यह अवैध है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अपने मुनाफे में बढ़ोतरी की खातिर अब प्रकाशक किताबों की फोटोकॉपी को ही अपराध घोषित करने पर तुले हैं।

वैसे इस मामले में भारत का कानून क्या कहता है? अपने एक आलेख में लेफ्टवर्ड बुक्स की मैनेजिंग एडिटर तथा संस्कृतिकर्मी सुधन्वा देशपांडे लिखते हैं कि भारत का कॉपीराइट कानून इस मामले में काफी साफ है। इसके दो स्पष्ट प्रावधान हैं, जो शैक्षिक कार्यों के लिए अपवाद का काम करते हैं। दरअसल कानून की धारा 52(1) अध्ययन के दौरान किसी भी रचना के पुनःउत्पादन की इजाजत शिक्षक एवं छात्र को देती है।

इसके अलावा इस कानून का अगला हिस्सा निजी या व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए, जिसमें शोध का मसला भी शामिल है, किसी भी रचना (जिसमें कंप्यूटर प्रोग्राम्स शामिल नहीं है) के साथ फेयर डीलिंग की बात करता है। अन्य पश्चिमी देशों में भी इस मामले में कानून में स्पष्टता है। अमेरिका में भी अकादमिक कार्यों के लिए किसी भी पुस्तक के 10 फीसदी हिस्से की फोटोकॉपी की इजाजत है। कॉपीराइट कानून के अन्य जानकारों के मुताबिक भी इस मामले में चाहे छात्र हों या अध्यापक, बेहद मजबूत बुनियाद पर खड़े हैं और हर्जाने की मांग करके प्रकाशक ही कानून में अन्तर्निहित अपवादों के प्रावधानों को रौंद देना चाहते हैं।

आज जब किताबों की कीमतें आसमान छू रही हैं, तब यह बहुत कम छात्रों के लिए मुमकिन है कि वे तमाम पाठयपुस्तकों को खरीदें सकें। जहां तक पुस्तकालयों का सवाल है, तो फिर चाहे दिल्ली विश्वविद्यालय हो या देश का अन्य कोई भी विश्वविद्यालय, वहां पाठ्यपुस्तकों की इतनी प्रतियां कभी भी नहीं होतीं कि वह हर छात्र की जरूरत पूरी कर सके।

पिछले दिनों नोबल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने भी इस मसले पर चिंता जाहिर की। अपने एक करीबी मित्र को उन्हें खत लिखा, ' मैं साझा वक्तव्यों पर दस्तखत नहीं करता, मगर मैं यह बताना चाहूंगा कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से जुड़े लेखक के तौर पर यह खबर सुनकर चिंतित हूं। मुझे उम्मीद है कि विद्यार्थियों के शिक्षा के अकादमिक प्रबंधन को कम कठिन और अधिक तार्किक बनाने के लिए कुछ किया जाएगा।’ यह सवाल भविष्य के गर्भ में है कि डॉ सेन की चिंता दूर हो सकेगी या नहीं।
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