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बलात्कार निरोध, उर्फ समरथ को नहिं दोष

मृणाल पांडे

Updated Sat, 13 Oct 2012 09:18 PM IST
mrinal pande report on rape in haryana
हरियाणा इन दिनों कतई गलत वजहों से सुर्खियों में है। एक तरफ उसके खिलाफ संदिग्ध जमीन अधिग्रहण और खरीदी के मामलों को लेकर इंडिया अगेंस्ट करप्शन महाभारतकालीन शिशुपाल की भूमिका में लगातार कड़वे सवालिया तीर फेंक रहा है। दूसरी तरफ महज तीस दिनों के भीतर बलात्कार के पंद्रह संगीन मामले राज्य में उजागर हुए हैं। जमीन से जुड़े मसले जटिल हैं और अभी उसके ब्योरे तथा फलादेश दूर तलक जाएंगे, लिहाजा उस पर अलग से चर्चा फिर।
फिलवक्त हम इलाके में कमउम्र लड़कियों के साथ बलात्कार की बढ़ती वारदातों और उस पर नेताओं की प्रतिगामी प्रतिक्रियाओं पर ध्यान टिकाना चाहेंगे। सराहनीय आर्थिक तरक्की के बावजूद देश का यह राज्य  महिलाओं, दलितों के प्रति हो रहे अपराधों, राजनेताओं के भ्रष्टाचार तथा अवैध कन्या भ्रूण हत्या के निंदनीय पैमानों पर भी बहुत ऊपर नजर आता है।

वजह यह कि यह तमाम अपराध कमजोर वर्ग के प्रति हिकारत और जर, जोरू, जमीन पर ताकतवर पुरुषों का सहज हक समझने को राज समाज से लगातार दी जा रही व्यापक और मूक स्वीकृति से उपजते और खाद-पानी पाते हैं। और यह प्रवृत्ति राज्य में अमीरी आने के बाद भी घटी नहीं, बल्कि नया रूप पकड़ रही है। इसी मानसिकता के दबाव से कन्या भ्रूण हत्या का चलन वहां लगातार बढ़ रहा है और महिलाओं की तादाद में इतनी गिरावट आ चुकी है कि युवाओं को शादी के लिए बाहरी राज्यों की तरफ जाना पड़ रहा है।

राज्य के गांवों के तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण खेती की पुश्तैनी जमीन बिल्डरों को जमीन बेचकर रातोंरात संपन्न बने कई खेतिहर परिवारों में कर्मठ खेतिहर जीवन शैली भी गायब हो गई है। जिन कुछ बड़े जोतदारों ने राजनीतिक सरपरस्ती हासिल कर खुद बिल्डर का धंधा चमका लिया है, उनके घरों के बिगड़ैल युवा अकसर दिन भर निठल्ले बैठे शराब पीते ताश खेलते और रातों को दिल्ली और गुड़गांव में नई नकोर गाड़ियों में फर्राटा भरते पब्स से सड़कों तक लड़कियों को छेड़ते, उठाते हड़कंप मचाते देखे जा रहे हैं।

राज्य में कई खाप पंचायतों के महिला विरोधी फतवों और लड़कियों के लगातार घटते अनुपात (हजार लड़कों के पीछे औसतन 762 लडकियां) से साफ है कि बेटियों के प्रति इस राज्य में उत्कट और व्यापक घृणा के चलते जवान बेटों को बहुएं न मिलें, तो न सही, पर आज भी लोग बाग अपने घरों में बेटी का जन्म कतई नहीं चाहते। यही नहीं, अब एक पूर्व मुख्यमंत्री जी की ताजा सलाह है कि ‘इज्जतदार’ लोगों को अपनी लड़कियों को रेप से बचाना है, तो वे खाप पंचायतों की सलाह मानें और उनको जल्द से जल्द ब्याह दें।

अचरज क्या कि इस मानसिकता वाले नेताओं के राज्य में एक दलित लड़की के साथ गैंग रेप होने के बाद जब उसे कोई न्याय नहीं मिला, तो वह जल मरी। दूसरी गीतिका शर्मा राज्य के एक ताकतवर बिल्डर मंत्री की हवस का शिकार बनी और कोई सुनवाई न होने पर आत्महत्या को विवश हुई। हरियाणा के सयानों तथा उनके ताकतवर संगठनों से बलात्कार की रोकथाम पर जो सद्विचार सामने आए हैं, वे दिखाते हैं कि महिलाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता का स्तर क्या है। वे फर्माते हैं :
-लड़कियों का ब्याह जल्दी कर देना चाहिए, ताकि उनमें यौन हवस बेकाबू न होने पाए।
-लड़कियों से मोबाइल छीन लेने चाहिए, ताकि वे लड़कों से बेवजह बतियाती न रहें।
-लड़कियों को दिन ढलने के बाद सड़कों पर बिना अभिभावक के नहीं निकलने देना चाहिए।
-शिक्षा संस्थाओं में लड़कियों के जीन्स टॉप या स्कर्ट पहनने पर रोक लगे।
-लड़कियों को ज्यादा उम्र तक पढ़ाना लिखाना खतरनाक है, क्योंकि कॉलेजों में सहशिक्षा के चलते वे प्रेम संबंध बनाकर जात-बिरादरी के बाहर शादी कर लेती हैं।
-सगोत्री या गैर जाति में विवाह की सजा मौत!  

यह देखना कठिन नहीं कि इन सुझावों का लक्ष्य अपराधियों की पकड़-धकड़ और समुचित सजा का प्रावधान नहीं, बल्कि उत्पीड़ित वर्ग को ही घर की चहारदीवारी की कैद में असूर्यंपश्या बनाकर चाभी ‘इज्जतदार’ पुरुषों को थमा देना है। न बाहर निकलेगी लड़की, न होंगे बलात्कार। वे कतई देखना नहीं चाहते कि घरों के भीतर महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा या बच्चियों के साथ स्वजनों द्वारा बलात्कार के मामले अब तक कुल बलात्कारों का 40 फीसदी भाग बन चुके हैं।

सच तो यह है कि एक कन्या विरोधी समाज में महिला प्रजाति के खिलाफ अपराध सिर्फ तभी दंडनीय माने जाते हैं, जब वे ‘इज्जतदार’ मानी गई जाति या परिवार की ‘बेइज्जती’ का प्रकरण बन गए हों या उनकी मार्फत राजनीतिक उल्लू सीधे किए जा सकें। वरना महिलाएं चिल्लाती रहें, उनकी कौन सुनता है, उल्टे थाने से लेकर पड़ोसी तक उनको और अधिक भोग्या मान लेते हैं। जब थाने में दर्ज किए जाने से लेकर अदालत में बलात्कारी को दंड मिलना, न मिलना अकसर इस पर ही निर्भर है, कि बलात्कार पीड़िता दलित थी कि सवर्ण?

उत्पीड़न उसकी जाति के लोगों ने किया था कि दूसरी जाति-समुदाय वालों ने? उस बलात्कार का आरोपी कोई जाना-माना व्यक्ति है या सड़क छाप चरसी? ऐसे में देश के कानून के तहत आप बलात्कार के लिए मृत्यु दंड का भी प्रावधान करा दें, वह कागज पर ही रह जाएगा और बलात्कारी फिर भी दंड का सहज भागी नहीं माना जाएगा।
 
जहां तक पारंपरिक सामाजिक संगठनों का सवाल है, वे तो यही मानकर चल रहे हैं कि औरत अपनी दशा के लिए खुद ज़िम्मेदार है। वे समझते हैं कि यौन हिंसा अकारण किसी महिला पर नहीं बरपा होती, कहीं न कहीं बलात्कार पीड़िता (अपने चाल, चरित्र या चेहरे से) ही पुरुष को उकसाती और उसे बलात्कार को न्योतती है। और इसलिए यदि समाज में बलात्कार रोकना है, तो हरियाणा की खाप पंचायतों तथा धार्मिक संगठनों की राय में सहशिक्षा, आधुनिक परिधान या लड़की के 18 साल की उम्र के बाद ही शादी की इजाजत देने वाले कानून पर, जो सारी दुनिया में एक लड़की की सही बाढ़ के लिए जरूरी और उसके सहज मानवाधिकार मान लिए गए हैं, तुरंत रोक लगानी होगी।

सोचने की बात है कि बिना व्यापक जन सहमति के कोई भी जातीय या धार्मिक संगठन प्रतिगामी खयालों को इस तरह थोप नहीं सकते। और कहीं न कहीं आम जन, वह चाहे मजलिसों या मीडिया में जो कहे, भीतर-भीतर अब भी महिला के यौन उत्पीड़न को चटखारे लेने लायक या हास्यास्पद मसला मानता है। हाल के दिनों में आई दबंग, गैंग्स ऑफ वासेपुर या 'बॉडीगार्ड' सरीखी फिल्मों तथा फूहड़ कॉमेडी शोज में महिलाओं के साथ जोर ज़बर्दस्ती का रूमानीकरण और फूहड़ महिला विरोधी चुटकुलों से हास्य परोसने वाले कॉमेडी कार्यक्रमों की सफलता साबित करती है कि आम लोगों के बीच औरत को एक हीन उपभोग्या माननेवाला यह सोच शेष देश में भी कितना व्यापक और सहज स्वीकार्य बन गया है।
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