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प्रोन्नति में आरक्षण का मतलब

हरबंश दीक्षित

Updated Thu, 13 Dec 2012 11:22 PM IST
means of reservation in promotion
सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और जनजातियों से जुड़ा प्रोन्नति में आरक्षण का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया है। सरकार के सहयोगी दलों के बीच तलवारें खिंच गई हैं। बसपा संविधान में संशोधन कर प्रोन्नति में आरक्षण को निर्बाध बनाना चाहती है, जबकि सपा इसे किसी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं है। बसपा की जो मांग है, वह दरअसल प्रोन्नति में शाश्वत आरक्षण और सेवापर्यंत परिणामी लाभ की है।
यह लगातार आरक्षण का लाभ उठाकर अपने सथियों से आगे शीर्ष पर पहुंचने के अधिकार का आग्रह है। मसलन, यदि अनुसूचित जाति या जनजाति का कर्मचारी इसका लाभ पाकर नए कैडर में चला जाता है, तो वह आगे भी इसी प्रकार लगातार आरक्षण के आधार पर प्रोन्नति पाते हुए शीर्ष तक पहुंच जाएगा, जबकि उसके साथ नियुक्त सामान्य वर्ग का व्यक्ति अपने मूल पद पर ही बना रह सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन बनाम राजेश कुमार (2012) के मुकदमे में इस पर कुछ शर्तें लगाते हुए कहा कि ऐसा केवल तभी हो सकता है, जब प्रोन्नति वाले पदों पर अनुसूचित जाति या जनजाति के कर्मचारियों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो। मायावती चाहती हैं कि संविधान में संशोधन करके अनुसूचित जाति के लोगों के प्रमोशन में आरक्षण तथा उसके परिणामी वरिष्ठता पर कोई पाबंदी नहीं हो। सपा उससे सहमत नहीं है।

उसका मानना है कि इससे गैर अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों के साथ अन्याय होगा। उसका कहना है कि 52 फीसदी आबादी वाले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को इसकी अधिक जरूरत है, क्योंकि ऊंचे पदों पर उनकी नुमाइंदगी बहुत कम है, जबकि 20 फीसदी जनसंख्या वाले अनुसूचित जाति के लोग आबादी के अनुपात से ज्यादा वरिष्ठ पदों पर हैं।

प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था की यात्रा बहुत जटिल रास्तों से होकर गुजरी है। संविधान में इसे लेकर दो बार संशोधन हो चुके हैं तथा संविधान पीठ के इस पर चार महत्वपूर्ण निर्णय आ चुके हैं। सबसे पहले इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने प्रोन्नति में आरक्षण को असांविधानिक माना। इसे निष्प्रभावी करने के लिए संविधान में 77 वां संशोधन करके अनुच्छेद 16 में खंड 4क जोड़ा गया और प्रोन्नति में आरक्षण का रास्ता साफ किया गया।

मगर इससे नया असंतुलन पैदा हुआ। इसका लाभ उठाकर अनुसूचित जाति व जनजाति के कर्मचारी धड़ाधड़ ऊंचे पदों पर पहुंचते गए, जबकि दूसरे लोगों के मन में क्षोभ पनपने लगा। उसे चुनौती दी गई। वीरपाल सिंह बनाम भारत संघ (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने इसका तार्किक हल निकालते हुए निर्णय दिया कि प्रोन्नति में आरक्षण का लाभ केवल एक बार मिलेगा। मगर, अनुसूचित जाति व जनजाति के कर्मचारियों के दबाव में इस निर्णय को निष्प्रभावी करना पड़ा और 85 वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16(4 क) में संशोधन करके यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि प्रोन्नति में आरक्षण पाने वालों को इसकी परिणामी वरिष्ठता का लाभ आगे भी मिलता रहे।

इसे फिर अदालत में चुनौती दी गई। एम. नागराज बनाम भारत संघ (2000) में सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान सम्मत मानते हुए कहा कि अनुसूचित जाति व जनजाति के कर्मचारियों को परिणामी वरिष्ठता का लाभ देकर एक से अधिक बार प्रोन्नति में आरक्षण किया जा सकता है, किंतु शर्त यह है कि सरकार को साबित करना होगा कि प्रोन्नति वाले पद पर उनकी नुमाइंदगी पर्याप्त नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने एम. नागराज के निर्णय की अनदेखी करते हुए अनुसूचित जाति व जनजाति के कर्मचारियों की निर्बाध प्रोन्नति का नियम बना दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल 2012 के निर्णय में असांविधानिक घोषित कर दिया। संविधान में संशोधन का मौजूदा प्रयास इसी निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए है। इस संबंध में मौजूदा विवाद अब तक के सभी विवादों से अलग व गंभीर है। संविधान पूरे समाज को न्याय सुनिश्चित करने का दस्तावेज है। इसलिए सरकार को भी इस विषय पर सावधानी से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि किसी एक दबाव समूह की मांग मानने के कारण शेष लोगों के साथ अन्याय न हो।


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