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इस राहत पैकेज का मतलब

बीके चतुर्वेदी

Updated Wed, 01 Nov 2017 09:25 AM IST
Meaning of this relief package

बीके चतुर्वेदी

कुछ ही दिन पहले केद्र सरकार ने अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख निवेश योजना की घोषणा की। सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंकों को दो लाख करोड़ रुपये से अधिक प्रोत्साहन पैकेज देकर उन्हें मजबूत बनाने और सात लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश करके सड़क निर्माण कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को प्रति क्विंटल सौ रुपये बढ़ाने का भी फैसला किया गया है। कई टिप्पणीकारों ने इसे बड़ा कदम बताया और बाजार ने बीएसई सूचकांक में भारी उछाल दिखाकर इसका स्वागत किया। इस मुद्दे पर कई रिपोर्टों से प्रतीत होता है कि अर्थव्यवस्था में रोजगार के गंभीर संकट का हल ढूंढ लिया गया है और बड़े बैंकों का ऋण प्रवाह शुरू हो जाएगा। सत्य से बड़ा कुछ नहीं है।
सड़क निर्माण के क्षेत्र में निवेश की तेज बढ़ोतरी से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। पहला, सबसे बड़ी चिंता यह है कि सड़क निर्माण के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश में कटौती हो सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो यह हमारे बच्चों और समग्र मानव विकास सूचकांक के लिए विनाशकारी होगा। दूसरा, इसे भारत माला नाम दिया गया है, लेकिन वास्तविक विवरण में यह सड़कों का मिश्रण लगता है। इसमें पिछड़े राज्यों के लिए कोई प्राथमिकता नहीं दर्शाई गई है, जिनके लिए अधिकतम केंद्रीय निवेश की जरूरत होती है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को केंद्रीय निवेश में आगे रखने की जरूरत है। महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर व दक्षिण भारत के अन्य राज्यों की तुलना में इन राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में भारी अंतर है। लेकिन इसके कोई संकेत नहीं हैं कि इन राज्यों को निवेश में प्राथमिकता दी जाएगी। तीसरा, इसमें यह माना गया है कि निर्माण की गति दोगुनी करके 40 किलोमीटर प्रति दिन का लक्ष्य रखा जाएगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या बदलाव किए जाएंगे, इसका कोई विवरण नहीं है। इसके बिना इसमें विश्वसनीयता की कमी दिखती है। चौथा, सड़कों के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। भूमि हस्तांतरण की कार्यवाही पूरी करने में राज्य सरकारें काफी समय लेती हैं। ऐसे में इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है। पांचवां, यह निजी निवेश को प्रोत्साहित नहीं करता। यह सब सरकारी संसाधनों और उधार से वित्तपोषित है। दीर्घकाल में यह तेज विकास का आधार नहीं हो सकता।

बैंकों का क्रेडिट प्रवाह पिछले वर्ष रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर था। इसकी मुख्य वजह थी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खराब सेहत। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के कारण ये बैंक गंभीर तनाव में थे। इन बैंकों का एनपीए सात लाख करोड़ रुपये से अधिक है। अगर पुनर्संरचना सहित अन्य परिसंपत्तियों की गणना की जाए, तो विशेषज्ञों के मुताबिक यह पंद्रह से बीस लाख करोड़ रुपये हो सकता है। अगर ये कर्ज वसूले नहीं गए, तो बैंकों की पूंजी का सफाया कर सकते हैं। सरकार द्वारा पुनर्पूंजीकरण के जरिये 2.1 लाख करोड़ के निवेश से बैंकों की पूंजी उपलब्धता में सुधार होगा। अगर बैंकों ने कुछ खराब ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया, तो बासल मानक के अनुसार मानदंडों को बनाए रखने में यह निवेश मदद करेगा।

हालांकि पुनर्पूंजीकरण से एनपीए से ग्रस्त प्रमुख बुनियादी ढांचा क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता है। उन सभी को दिवालियेपन के मार्ग से गुजरना होगा। अगर बीआईएफआर के पिछले अनुभवों से कोई संकेत मिलता है, तो वह यह कि इन प्रक्रियाओं में काफी लंबा समय लग सकता है। इस बीच न चुकाए गए ब्याज की राशि इकट्ठा होती रहेगी। और इस तरह एनपीए का आकार लंबे समय तक कम नहीं होगा। अधिकांश बुरे कर्ज की समस्या ऊर्जा, दूरसंचार, सड़क एवं अचल संपत्ति क्षेत्र से संबंधित हैं। इस क्षेत्रों की समस्याएं क्षेत्र विशेष से संबंधित हैं। इसके अलावा कर्जों को बट्टे खाते में डालने से उनका मुनाफा तेजी से घटेगा और अगले चरण में फिर उन्हें नए सिरे से पूंजी की जरूरत होगी। क्षेत्र-विशेष से संबंधित पुनरुद्धार नीतियों के अभाव में बैंकों को आर्थिक रूप से मजबूत होने में लंबा वक्त लगेगा। इसके साथ ही ये मुख्य बुनियादी ढांचा क्षेत्र अर्थव्यवस्था के विकास में रुकावटें डालेगा।

इस संदर्भ में इसके औचित्य से संबंधित दो महत्वपूर्ण सवाल उभरते हैं। पहला, बुरे कर्ज की समस्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अधिकारियों और बैंकों के परिचालन में राजनीति हस्तक्षेप के चलते कुप्रबंधन के कारण पैदा हुई है। इससे पहले भी करदाताओं के भारी धन का इस्तेमाल किया गया था, जब इसी तरह पुनर्पूंजीकरण के लिए सरकारी धन उपलब्ध कराए गए थे। बैंकों को पेशेवर रूप से परिचालन की अनुमति मिलनी चाहिए। चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है, इसलिए सरकार की हिस्सेदारी घटाई जानी चाहिए और बैंकों से दूर रहने की नीति अपनाई जानी चाहिए। दूसरा, यह स्पष्ट है कि बैंकों द्वारा इन खराब कर्जों को बट्टे खाते में डालने से विजय माल्या जैसे समृद्ध लोगों को फायदा होगा। उनके कर्ज आंशिक या पूर्ण रूप से माफ कर दिए जाएंगे। इस तरह से अप्रत्यक्ष रूप से धनाढ्य लोगों को धन हस्तांतरित किया जाएगा। कुछ समय पहले जब एक के बाद एक राज्य सरकारों ने किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा की थी, तो वित्तीय अनुशासनहीनता का सवाल उठाया गया था। कई किसान छोटे और आर्थिक रूप से बेहद कमजोर थे। किसानों का कर्ज माफ करना एक तरह से एक बड़े गरीब तबके की मदद करना था। सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए बेहद सावधानी बरतनी होगी कि मौजूदा आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज से अमीरों के लिए परोक्ष रूप से धन हस्तांतरण को बढ़ावा न मिले और यह  बैंकिंग व्यवस्था के कर्ज प्रवाह को पुनर्जीवित करने के लिए न्यूनतम जरूरत है।

-लेखक पूर्व कैबिनेट सचिव हैं।
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