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नया नहीं लॉबिंग का खेल

देविंदर शर्मा

Updated Thu, 13 Dec 2012 11:24 PM IST
lobbying is not a new game
भारत के पांच सौ अरब डॉलर के आकर्षक बाजार पर पकड़ मजबूत करने के लिए  अमेरिका और भारत में लॉबिंग पर 125 करोड़ रुपये खर्च करने के वालमार्ट के खुलासे ने एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। इसको लेकर राज्यसभा और लोकसभा में हुए हंगामे के बाद बहस की जा रही है कि लॉबिंग रिश्वत का ही एक प्रकार है या नहीं।
 
सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि आखिर लॉबिंग का असल अर्थ क्या है और यह कैसे संचालित होती है? दरअसल, लॉबिंग कोई नई बात नहीं है। हां, यह जरूर है कि अब यह पहले की तुलना में कुछ ज्यादा परिष्कृत हो गई है। करीब 25 वर्ष पहले जब पंजाब में दूसरी बागवानी क्रांति लाने का दावा करती हुई पेप्सी भारत में पिछले दरवाजे से प्रवेश की तैयारी कर रही थी, तो उसने पंजाब के एक वरिष्ठ नौकरशाह को अमेरिका में अपनी उत्पादन इकाइयां देखने के लिए आमंत्रित किया। आश्चर्य की बात है कि अमेरिका जाने के पहले उक्त अधिकारी पेप्सी के देश में प्रवेश के सख्त खिलाफ थे, लेकिन वहां से लौटने के बाद उनकी राय बदल चुकी थी।

लॉबिंग की ऐसी कुटिल, लेकिन प्रभावशाली गतिविधियों को अमूमन नजरंदाज कर दिया जाता है। जरा याद कीजिए कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से ठीक पहले अखबारों में ऐसे लेखों और साक्षात्कारों की भरमार थी, जिनमें इस विवादित फैसले को रोके रखने की तीखी आलोचना की गई थी। दावे किए जा रहे थे, मानो रिटेल में एफडीआई की अनुमति को रोकना, आजादी के बाद की सबसे बड़ी भूल हो। वास्तव में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘अंडरअचीवर’ बताने वाली टाइम पत्रिका की कवर स्टोरी भी परोक्ष रूप से लॉबिंग ही थी। इसके पीछे सोच यह थी कि मनमोहन सिंह पर लंबित मामलों को निपटाने के लिए दबाव बनाया जाए।

अमूमन मीडिया के ऐसे छद्म अभियानों के पीछे कॉरपोरेट लॉबिंग का हाथ होता है। राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करने में इनकी भूमिका का पर्दाफाश नीरा राडिया के टेपों में भी हुआ था। तीक्ष्ण, आक्रामक और हमेशा पैसों से भरा बैग अपने साथ रखने वाले लॉबिस्ट सत्ता के गलियारों में घूमते रहते हैं। मंत्रियों, राजनीतिकों, अर्थशास्त्रियों और मीडिया के लोगों से इनकी साठगांठ रहती है। वे इन्हें सिखाते हैं कि बेरोजगारी और कृषि से जुड़े संकटों से निजात पाने के लिए भारत को बड़े खुदरा कारोबारियों को आमंत्रित करने की जरूरत क्यों है?

फॉर्मास्युटिकल कंपनियों ने तो सारी हदों को तोड़ते हुए लॉबिंग को अनैतिक आचरण बना दिया है। महंगे उपहारों और यात्राओं जैसे प्रलोभन से भरे प्रस्तावों को तुरंत स्वीकारने वाले लालची डॉक्टरों की आज भरमार है। हालांकि औषधि बाजार के लिए एक समान संहिता बनाने की सरकार की योजना है, लेकिन सचाई यह है कि गुजरते हुए हर दिन के साथ ही भ्रष्टाचार और लॉबिंग के बीच की रेखा निरंतर धुंधली होती जा रही है।  

डाऊ केमिकल्स का ही उदाहरण लें, जिसे बाद में यूनियन कार्बाइड ने खरीद लिया। एक रिपोर्ट की मानें, तो डाऊ केमिकल्स ने वर्ष 2011 में थाईलैंड, भारत और चीन के बाजारों तक पहुंच बनाने में 50 करोड़ रुपये खर्च किए। इससे पहले अमेरिका के सिक्यूरिटीज और एक्सचेंज कमीशन ने वर्ष 2007 में डाऊ केमिकल्स पर अमेरिका और कई अन्य देशों में प्रतिबंधित अपने पेस्टिसाइड्स बेचने की अनुमति दिलाने के लिए भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने के आरोप में 3,25,000 डॉलर का जुर्माना लगाया था।

भारत ने इसके लिए सीबीआई जांच बिठाई, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। भले ही भोपाल गैस कांड में यूनियन कार्बाइड की भूमिका के मुद्दे पर ढिलाई बरतने के पीछे तमाम व्यावहारिक कारण छिपे हों, लेकिन इससे यह तो जाहिर है कि जब बात बड़े उद्यमियों की हो, तो उत्तरदायित्व की परिभाषा बदलने लगती है।

बीज और प्रौद्योगिकी की वैश्विक कंपनी मोनसेंटो विकासशील देशों में जैविक रूप से परिष्कृत फसलों की आक्रामक वकालत करने के लिए जानी जाती है। अमेरिका के न्याय विभाग ने 2005 में मोनसेंटो पर इंडोनेशियाई अधिकारियों को रिश्वत देने के आरोप में जुर्माना लगाया था। आखिर लॉबिंग और रिश्वतखोरी के बीच कुछ अंतर तो जरूर होना चाहिए।

कुछ समय पहले न्यूयॉर्क टाइम्स ने मैक्सिको में वालमार्ट के एक और कारनामे का पर्दाफाश किया था, जहां इसने अपने स्टोर्स की तादाद बढ़ाने के लिए रिश्वत का सहारा लिया था। भारत में इस कंपनी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय जांच कर रहा है।

काफी शॉप ‘स्टारबक्स’ को जनवरी 2012 में भारत में कारोबार की अनुमति मिली। अमेरिकी सीनेट के सामने पेश किए गए दस्तावेजों की मानें, तो इस कंपनी ने भारत में अपने बाजार की शुरुआत करने के लिए 2011 के पहले छह महीनों में एक करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम खर्च की। भारत में प्रवेश के लिए लॉबिंग करने वाली कंपनियों की फेहरिस्त में फाइनेंशियल सर्विसेज मेजर मॉर्गन स्टेनले, न्यूयार्क लाइफ इंश्योरेंस, प्रूडेंशियल फाइनेंशियल के अलावा तकनीकी कंपनियां जैसे इंटेल, डाऊ केमिकल्स इत्यादि शामिल हैं।

लेकिन चिंता तब होती है, जब राष्ट्रों के प्रमुख लॉबिंग जैसी गतिविधियों में लिप्त पाए जाते हैं। गौरतलब है कि 2009 के बाद से भारत की यात्रा पर आए सभी प्रमुख आर्थिक शक्तियों के प्रमुखों ने रिटेल में एफडीआई की पुरजोर वकालत की है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल, सभी ने भारतीय प्रधानमंत्री को रिटेल क्षेत्र को खोलने की जरूरत का एहसास कराया।



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