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सार्वजनिक जीवन की सीमाएं

तवलीन सिंह

Updated Sat, 06 Oct 2012 09:26 PM IST
limitations of public life
भारतीय पत्रकारिता का एक अनकहा उसूल-सा बन गया है कि हम नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों की आलोचना हमेशा डर-डर के करते हैं। इस परिवार को हमने दरअसल वह स्थान दे रखा है, जो शायद ही किसी दूसरे लोकतांत्रिक मुल्क में किसी राजनीतिक परिवार को मिला होगा कभी। अगर तुलना उनके दरजे की हम करें ब्रिटेन के शाही परिवार के साथ, तो गलत न होगा, लेकिन वहां भी अब परंपराएं बदल गई हैं इतनी कि अखबारों में युवरानी साहिबा की निजी तसवीरें भी छप जाती हैं।
यहां तो हम यह कहने की भी हिम्मत नहीं करते कि सोनिया जी और राहुल जी का पत्रकारों को इंटरव्यू न देने का फैसला गलत है। बावजूद इसके कि हम अच्छी तरह जानते हैं कि लोकतांत्रिक देशों में सार्वजनिक जीवन में कदम रखने के बाद किसी को इस तरह चुप रहने का अधिकार नहीं होता है। इतना जरूरी होता है राजनेताओं को अपने जीवन को एक खुली किताब बनाकर रखना कि अमेरिका के एक राष्ट्रपति ने कभी इन शब्दों में नसीहत दी थी राजनीति में आने वालों को, 'अगर आपको गरमी बरदाश्त नहीं होती, तो इस रसोई से बाहर निकल जाएं।'

दिल्ली के मशहूर शायर, मीर तकी मीर ने इसी बात को बड़े खूबसूरत अंदाज से पेश किया है अपने एक शेर में, आफाक की मंजिल से गया कौन सलामत। असबाब लुटा राह में यां हर सफरी का। सम्मान लुटा है राजनीति की डगर पर चलने वाले हर मुसाफिर का, क्योंकि लोकतंत्र अधिकार देता है आम आदमी को अपने राजनेताओं से हर तरह के सवाल पूछने का।

यही तो आधार है राजनेताओं के उत्तरदायित्व का। लेकिन अपने इस भारत देश में नेहरू-गांधी परिवार परंपराएं खुद ही बनाता है। इसीलिए सोनिया जी जबसे राजनीति में हैं, अमूमन पत्रकारों को इंटरव्यू नहीं देतीं और राहुल गांधी भी अपनी माता के नक्शेकदम पर चल रहे हैं, लेकिन हम लोगों ने कभी इस पर किसी तरह का ऐतराज नहीं जताया।

सोनिया जी बीमार हुईं पिछले वर्ष, तो उनकी बीमारी को राज रखा गया। वह इलाज करवाने चुपके से चली गईं विदेश और हमने इतना भी नहीं पूछा कि किस अस्पताल में इलाज चल रहा है उनका, न ही यह पूछा कि किसी भारतीय अस्पताल में उनका इलाज क्यों नहीं हो सकता। हमने यह भी नहीं पूछा कि उनकी विदेश यात्राओं और विदेशी अस्पतालों में इलाज के पैसे आखिर कौन दे रहा है?

बल्कि जब पिछले सप्ताह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी जनसभा में 1,880 करोड़ रुपये वाली बात कही, तो उनकी खूब आलोचना हुई मीडिया में। और जब नरेंद्र मोदी अपनी बात पर अड़े रहे, तो उनकी और ज्यादा आलोचना हुई, और यह कहा गया कि उन्हें सोनिया जी के 'निजी' मामलों में इस तरह दखल कतई नहीं देना चाहिए। भूल गए मेरे पत्रकार दोस्त कि यह लोकतांत्रिक देश है, जहां जनता को अधिकार है ऐसे सवाल उठाने का। लीजिए, कुछ और सवाल सुनिए। सोनिया जी के इलाज का खर्च अगर भारत सरकार नहीं दे रही है, तो कौन दे रहा है? कितना खर्च हुआ है अभी तक इलाज में? और अगर यह सारा पैसा कांग्रेस पार्टी दे रही है, तो फिर हिसाब-किताब जनता के सामने रखने से क्यों डरती है?

देश की सबसे ताकतवर नेता स्वस्थ रहें, यह हम सबकी दुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ खुद उन्हें पारदर्शिता रखनी चाहिए। उनकी जगह अगर खुद नरेंद्र मोदी होते, तो क्या होता? यदि वह इन सवालों का जवाब नहीं देते, तो कोलगेट जैसा हंगामा हो जाता। हम पत्रकार उनसे इतने सवाल कर डालते कि उनकी बदनामी हो जाती इतनी कि हम उनकी बीमारी का हाल भी पूछना भूल जाते। भूलना नहीं चाहिए कि सोनिया जी का हम पत्रकारों ने जितना साथ दिया है, उतना किसी और राजनेता का नहीं। ऐसे में उनका भी फर्ज बनता है कि वह सार्वजनिक जीवन में कोई राज न रखें।

फिलहाल लोकतंत्र में हमें सोनिया जी से ऐसे सवालों का जवाब मांगने का हक है। अगर उनको इस तरह के सवालों में गुस्ताखी दिखती है, तो शायद समय आ गया है उनके लिए यह फैसला करने का कि वह सार्वजनिक जीवन में बनी रहना चाहती हैं या नहीं।
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