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भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की सीमाएं

विनीत नारायण

Updated Fri, 14 Sep 2012 04:50 PM IST
limitations of fight against corruption
मायावती के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने सार्वजनिक जीवन की शुचिता और भ्रष्टाचार को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां तक बात सीबीआई के दुरुपयोग की है, तो यह कोई नई बात नहीं है। हर दल जब सत्ता में होता है, तो यही करता है। किसी ने भी आज तक सीबीआई को स्वायत्तता देने की बात नहीं की। यह सही है कि भ्रष्टाचार ने हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था को जकड़ लिया है और विकास की जगह पैसा चंद लोगों की जेबों में जा रहा है। पर क्या यह सही नहीं है कि जिस राजनेता के भ्रष्टाचार को लेकर मीडिया और सिविल सोसाइटी बढ़-चढ़ कर शोर मचाती हैं, उसे आम जनता भारी बहुमत से सत्ता सौंप देती है।
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को भ्रष्ट बताकर सत्ता से बाहर कर दिया गया था, लेकिन दोबारा उसी जनता ने उनके सिर पर ताज रख दिया। क्या उनके 'पाप' धुल गए? मायावती पर ताज कॉरिडोर का मामला जब कायम हुआ था, उसके बाद जनता ने उन्हें उत्तर प्रदेश की गद्दी सौंप दी थी। वह कहती हैं कि उन्हें यह दौलत उनके कार्यकर्ताओं ने दी। जबकि सीबीआई के स्रोत बताते हैं कि उनको लाखों-करोड़ों रुपये की बड़ी-बड़ी रकम उपहार में देने वाले खुद कंगाल हैं। इसलिए दाल में कुछ काला है।

पर यहां ऐसे नेताओं के कार्यकर्ताओं द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि जब दलितों और पिछड़ों के नेताओं का भ्रष्टाचार सामने आता है, तब तो देश में खूब हाहाकार मचता है, पर जब सवर्णों के नेता पिछले दशकों में अपने खजाने भरते रहे, तब कोई कुछ नहीं बोला। यह बड़ी रोचक बात है। सिविल सोसाइटी वाले दावा करते हैं कि एक लोकपाल देश का पूरा भ्रष्टाचार मिटा देगा, पर वह भूल जाते हैं कि इस देश में नेताओं और अफसरों के अलावा उद्योगपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों, खान मालिकों आदि की एक बहुत बड़ी जमात है, जो भ्रष्टाचार का भरपूर फायदा उठाती है और उसका संरक्षण भी करती है।

सच तो यह है कि भारतीय अब पैसे की दौड़ में मूल्यों की बात नहीं करते। गांव का आम आदमी भी अब चारागाह, जंगल, पोखर, पहाड़ व ग्राम समाज की जमीन पर कब्जा करने में संकोच नहीं करता। ऐसे में कोई एक संस्था या एक व्यक्ति कैसे भ्रष्टाचार को खत्म कर सकता है? 120 करोड़ के इस मुल्क में 5,000 लोगों की सीबीआई किन-किन भ्रष्टाचारियों के पीछे भागेगी?

अपने अध्ययन के आधार पर कुछ सामाजिक विश्लेषक यह कहने लगे हैं कि देश की जनता विकास और तरक्की चाहती है, उसे भ्रष्टाचार से कोई तकलीफ नहीं। उनका तर्क है कि अगर जनता भ्रष्टाचार से उतनी ही त्रस्त होती, जितनी सिविल सोसाइटी बताने की कोशिश करती है, तो भ्रष्टाचार को दूर भगाने के लिए जनता अब तक एकजुट होकर कमर कस लेती।

रेल के डिब्बे में आरक्षण न मिलने पर लाइन में खड़ी रहकर घर लौट जाती, पर टिकट परीक्षक को हरा नोट दिखाकर, बिना बारी के, बर्थ लेने की जुगाड़ नहीं लगाती। हर जगह यही हाल है। लोग भ्रष्टाचार की आलोचना में तो खूब आगे रहते हैं, पर सदाचार को स्थापित करने के लिए अपनी सुविधाओं का त्याग करने के लिए सामने नहीं आते। इसलिए 'सब चलता है' की मानसिकता से भ्रष्टाचार पनपता रहता है।

देखने वाली बात यह भी है कि जो लोग भ्रष्टाचार को लेकर आए दिन टीवी चैनलों पर हंगामा करते हैं या आक्रामक बहस करते दिखते हैं, वे खुद के और अपने संगी-साथियों के अनैतिक कृत्यों को ढंकने की भरपूर कोशिश भी करते हैं। ऐसे विरोधाभासों के बीच हमारा समाज चल रहा है। जो मानते हैं कि वे धरने और आंदोलनों से देश की फिजा बदल देंगे, उनके भी किरदार सामने आ जाएंगे, जब वह अपनी बात मनवाकर भी भ्रष्टाचार को कम नहीं कर पाएंगे, रोकना तो दूर की बात है।

फिर क्यों न भ्रष्टाचार के सवाल पर आरोप-प्रत्यारोप की फुटबाल को छोड़कर प्रभावी समाधान की दिशा में सोचा जाए। जिससे धनवान धन का भोग तो करे, पर सामाजिक सरोकार के साथ और जनता को अपने जीवन से भ्रष्टाचार दूर करने के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि हुक्मरान भी सुधरें और जनता का भी सुधार हो।
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