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सत्ता की चाबी कांग्रेस के पास

अरुण नेहरू

Updated Fri, 28 Sep 2012 08:55 PM IST
भारत के नागरिकों ने हमेशा विवेक से मतदान किया है और वही विजेता एवं पराजित का फैसला करेगा। लेकिन मेरी चिंता है कि जैसा हम मध्य पूर्व एवं यूरोप के कई हिस्सों में देख रहे हैं, वैसा हमारे देश में नहीं होना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से तो ऐसा होना नहीं चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र एवं इसकी संस्थाएं हमारी व्यवस्था में पिछले 60 वर्षों से भी अधिक समय से गहरी जड़ जमा चुकी हैं। पर हकीकत यह है कि साढ़े छह दशक से भी अधिक की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमने जो कुछ अर्जित किया है, वह साल भर के पागलपन से ध्वस्त हो सकता है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से व्यवस्था को कोई खतरा नहीं है। पर समस्या तब शुरू होती है, जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों से हिसाब बराबर करने के लिए 'बाहरी' तत्वों को जमीनी आधार हासिल करने का मौका देने लगते हैं। निकट अतीत में हम इसके साक्षी रहे हैं, जब टीम अन्ना को मौका दिया गया। पर व्यवस्था को काफी नुकसान हुआ।

दो राष्ट्रीय दल, कांग्रेस और भाजपा, 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए एक दूसरे के खिलाफ जिस तरह संघर्षरत हैं, वह देखने लायक है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एवं भाजपा ने मिलकर 320 सीटें जीती थीं, जबकि अन्य दलों को 220 सीटें मिली थीं। लेकिन 2014 में स्थिति बदल सकती है और कांग्रेस और भाजपा 280 से 290 सीटों तक सिमट सकती है, जबकि अन्य दलों की सीटों की संख्या बढ़कर 250 तक पहुंच सकती है। क्या यह भावी गठबंधन ढांचे में कोई मौलिक बदलाव करेगा? क्या क्षेत्रीय ताकतें भविष्य में कांग्रेस व भाजपा पर बढ़त बना सकती हैं? सवाल यह भी कि भाजपा और कांग्रेस में कौन आगे रहेगा।

मुलायम सिंह यादव सत्ता की राजनीति समझते हैं। उन्होंने इसकी तैयारी भी की है। वह जानते हैं कि यदि कांग्रेस 150 सीटें या उससे ज्यादा हासिल करती है, तो 'सत्ता की चाबी' उसी के पास होगी। यदि वह इससे कम सीटें हासिल करती है, तो धर्मनिरपेक्ष मोरचा ही सरकार गठन की पहल करेगा। लेकिन कोई भी कांग्रेस की अनदेखी नहीं कर सकता, क्योंकि उसके सहयोग के बिना धर्मनिरपेक्ष मोरचे की सरकार का गठन संभव ही नहीं है। इस कारण यूपीए से कोई समर्थन वापस नहीं लेगा।

हालांकि मुलायम सिंह ने तीसरे मोरचे के लिए जल्दी पहल की है, पर अगर क्षेत्रीय दलों के पास सरकार गठन के लिए जादुई आंकड़ा होगा, तो प्रधानमंत्री पद के भी कई दावेदार होंगे। तब शरद पवार, जयललिता, मायावती, नीतीश कुमार या ममता बनर्जी की नेता पद के लिए दावेदारी शायद ही कोई खारिज कर पाए। इनमें से सभी 20 या उससे अधिक सीटें जीतने में सक्षम हैं। शरद पवार बेशक अपवाद हैं, लेकिन अगर वह 10 से 14 सीटें जीतते हैं, तब भी उनका महत्व कम नहीं होगा।

धर्मनिरपेक्ष मोरचे में वाम दल, सपा, तेदेपा, राकांपा, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, रालोद, जद (एस), बीजद, जद (यू), अन्नाद्रमुक या द्रमुक, इनेलो, अकाली दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, वाईआरएस कांग्रेस और अन्य छोटे दल शामिल हो सकते हैं। पर ऐसा तभी हो सकता है, जब भाजपा एवं शिवसेना को अलग-थलग कर दिया जाए और बसपा एवं तृणमूल कांग्रेस तटस्थ रहें। 230 से 240 सीटें जीतकर क्षेत्रीय दल 150 सीटों वाली कांग्रेस एवं उससे थोड़ी कम सीटों वाली भाजपा को मैदान से बाहर कर सकते हैं। कुछ क्षेत्रीय ताकतें दोनों तरफ जा सकती हैं। भावी राजनीतिक गणित को समझने के लिए किसी विशेषज्ञ गणितज्ञ की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि कोई दल किसी के साथ नहीं है और कोई पार्टी बिना दूसरे के सहयोग के कुछ नहीं कर सकती।

2014 के लोकसभा चुनाव में अभी समय है, पर सवाल है कि भविष्य के लिए हम क्या चाहते हैं। हम सबके पास आदर्श समाधान है, लेकिन हम यथार्थ से अनजान बने नहीं रह सकते। हमें विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच उचित संतुलन के लिए सुधारों की जरूरत है। जब तक निचले स्तर को नियंत्रित एवं जवाबदेह नहीं बनाया जाता, हम अराजकता की तरफ बढ़ते रहेंगे। इसके साथ ही हमें निवेश के लिए आत्मविश्वास और वैश्विक निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है।

सचाई यह है कि नई आर्थिक नीतियों का वैश्विक बाजारों में जितना लाभ भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिला है, उतना और किसी को नहीं। ऐसे में रिटेल में एफडीआई पर सरकार के फैसले की तीखी आलोचना कर हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। सवाल है कि जब कांग्रेस एवं भाजपा, दोनों 150-150 सीटों के आसपास सिमट जाएंगी, तो क्या क्षेत्रीय दल 20 से 30 सीट जीतने वाले नेता को प्रधानमंत्री के रूप में अपना नेता चुन लेंगे? फिर अगर धर्मनिरपेक्ष और गैर धर्मनिरपेक्ष का मामला उठा, तो स्थिति एक अलग मोड़ ले लेगी और वैसे में कांग्रेस को फायदा होगा।

लेकिन अभी हमें नहीं मालूम कि यूपीए और एनडीए एकजुट रहेगा या नहीं और चुनाव से पहले या बाद में कौन-सा दल किसके साथ गठजोड़ करेगा। इस स्थिति में राजनीतिक दलों की मुद्राएं तो भांपी जा सकती हैं, पर उनके फैसलों के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता। राजनीति में भावना की कोई जगह नहीं होती, संख्याबल ही रणनीति तय करेगा।

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