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कालीवेंई नदी बन सकती है मिसाल

सुरेंद्र बांसल

Updated Fri, 12 Oct 2012 09:24 PM IST
Kaliveni river can become a precedent
अपना देश पानी की संस्कृति का देश है और हमें गर्व है कि हम पानी की संस्कृति के लोग हैं। हमारा सबसे पवित्र शब्द 'तीर्थ' नदियों के तीर (तटों) पर ही रहा है। इसी से तीर्थ शब्द बना। तीर्थ शब्द का एक अर्थ घाट भी है। हमारे तीर्थ समाज को भी एक चलता-फिरता तीर्थ माना गया है। इन तीर्थराजों का काम पानी के बिना कभी नहीं चलता। हमारे समाज का जो भी सर्वश्रेष्ठ है, वह नदियों और सरोवरों के सत्संग से ही आया है। इसके बावजूद हमारे संतों को प्रायः देश की सड़ती नदियों, सरोवरों, कुंडों, झरनों, बावड़ियों, तालाबों और हमारे हजारों सदपुरुषों, अवतारी पुरुषों से जुड़े किसी भी पवित्र जलस्रोत तक की सुध लेने का ध्यान नहीं आया। उलटे इन संतों ने नदियों-सरोवरों को पवित्र रखने वाली सभी परंपराओं को पवित्र जलस्रोतों को गंदा करने में ही योगदान दिया है। देश की समस्त नदियों या अन्य जलस्रोतों में सड़े फूल, सड़ी लाश, मरे पशु, मल-मूत्र, फैक्टरियों का रासायनिक कचरा तैरता है। लेकिन संत समाज की संवेदनहीनता ज्यों की त्यों बनी रहती है। लाखों संतों के इस काई जमे सरोवर में संत बलबीर सीचेवाल ने स्वयं उठकर एक ठीकरी मारने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने 162 किमी लंबी कालीवेंई नदी को साफ करके उसे निर्मल बनाने का अनूठा प्रयास किया है।
यह घटना वर्ष 2001 की है। सुलतानपुर लोधी (पंजाब) के नजदीक कुछ लोग संडास की तरह सड़ते पानी में उतरे थे। सूर्य उदय होने ही वाला था। उस सड़ते काले पानी की सफाई करते हुए लोगों के पास कुछ जीपें आकर रुकीं और नदी की सफाई करते कार सेवकों पर लोगों ने धावा बोला दिया। उन धावा बोलने वालों का नेतृत्व एक स्थानीय नेता कर रहा था। उसने कहा कि हम गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य हैं, जिस नदी को तुम लोग साफ कर रहे हो, वह कालीवेंई नदी है। इसमें हमारे प्रथम गुरु नानक जी ने डुबकी लगाई थी, इसलिए इस नदी पर सिर्फ हमारा अधिकार है। इसकी कारसेवा कोई और नहीं कर सकता। कारसेवक भयभीत होकर संत बलबीर सिंह के पास पहुंचे, जिन्होंने कुछ दिन पूर्व ही नदी किनारे गुरुद्वारा साहिब के प्राचीन घाट पर कालीवेंई नदी की सफाई करने का संकल्प लिया था। बलबीर जी की नेतृत्व क्षमता यहां बखूबी काम आई।

कालीवेंई नदी होशियारपुर जिले के धनोआ गांव से निकलकर हरीके पत्तन में ब्यास और रावी में जा मिलती है। इसमें लगभग 35 शहरों का सीवरेज गिरता था। नदी के आसपास की अधिकतर जमीनों पर या तो कब्जे हो चुके थे या पटवारी बेच चुके थे। लेकिन बरबीर सिंह ने मजबूत इरादों के साथ नदी से जुड़ी तमाम समस्याओं का विश्लेषण किया और मन ही मन अडिग होकर नदी को फिर निर्मल बनाने के लिए अंगदी मन का पैर जमा दिया। उनकी मुख्य तपोभूमि सीचेवाल गांव है। उन्होंने वहीं से नदी की कारसेवा का काम शुरू किया। उन्होंने नदी से सटे गांवों में इस पवित्र नदी में गिरने वाली गंदगी को रोकने के लिए संदेश भिजवाया। इससे भू-माफिया में हड़कंप मच गया। मामला तत्कालीन मुख्यमंत्री के पास पहुंचा। आखिरकार राज्य सरकार को झुकना पड़ा।

संत बलबीर ने एक ट्रीटमेंट प्लांट द्वारा खेतों की ओर पाइप बिछाने का काम शुरू किया। उस काम में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह पूरा क्षेत्र जो कि सबमर्सिबल पंपों की शर-शय्या पर टिक चुका था, वहां अब धीरे-धीरे भू जलस्तर भी सुधरने लगा है। अब यहां के किसान तीन फसलें ले रहे हैं। गंदे पानी से पनपने वाले रोगों से भी मुक्ति मिली है। आज पंजाब गहरे जल संकट के कगार पर है। आब शब्द का अर्थ पानी तो है ही, इज्जत, आबरू और चमक भी है। हरित क्रांति के हिंसात्मक दौर के बाद पंजाब के लोक जीवन की फुलकारी का समस्त ताना-बाना खतरे में है। ऐसे में बलबीर जी का यह प्रयास गंगा अवतरण की कथा की याद दिलाता है। अगर हमारे देश के लाखों संत ठान लें, तो छोटे-बड़े सरोवरों से लेकर छोटी-बड़ी नदियों की सफाई बेहद सहज रूप से हो सकती है। कार सेवा का सही अर्थ अहिंसा की शाख पर खिला पर्यावरण का फूल ही है।
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