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पुलिस का अमानवीय चेहरा

शिवदान सिंह

Updated Wed, 08 Nov 2017 06:29 PM IST
Inhuman face of the police

शिवदान सिंह

कन्या पूजन एवं स्त्री को देवी के रूप में पूजने वाले देश में एक बार फिर मानवता को शर्मसार करने वाली घटना भोपाल में उस समय घटी, जब भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन से मात्र 500 मीटर की दूरी पर चार दरिंदों ने एक 19 वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया तथा उसे गला दबाकर मारने की भी कोशिश की। किसी तरह वह पीड़िता छूटकर चौकी पर पहुंची और अपने घरवालों को सूचित किया।
माता-पिता जब उसे लेकर हबीबगंज थाने पहुंचे, तो उसकी रिपोर्ट लिखने और फौरी तौर पर मानसिक व चिकित्सकीय सहायता पहुंचाने के बजाय उन्हें क्षेत्र का हवाला देकर दूसरे थाने भेजा गया और फिर वहां से तीसरे थाने। इस तरह रात दस बजे से लेकर अगले दिन सुबह आठ बजे तक यह पीड़ित परिवार राजधानी भोपाल की सड़कों पर भटकता रहा। जब पीड़िता ने दो दरिंदों को पहचान लिया और उसके माता-पिता ने स्वयं पकड़कर उसे पुलिस को सौंपा, तभी पुलिस ने कुछ करने की सोची। देश भर के लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि पीड़िता के माता-पिता, दोनों मध्य प्रदेश पुलिस में कार्यरत हैं। समझा जा सकता है कि दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले आम लोगों के साथ पुलिस का रवैया कैसा हो सकता है! यह घटना विभागीय वफादारी तथा मानवता के नैतिक मूल्यों, दोनों के आधार पर बहुत ही शर्मनाक है, जो सत्ता में बैठे लोगों को यह सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी है कि सामूहिक बलात्कार जैसे गंभीर अपराध में भी पुलिसकर्मियों का ऐसा संवेदनहीन तथा अमानवीय व्यवहार देखने में आता है। कठोर कानून होने के बावजूद अगर ये अपराध कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं, तो इसकी एक वजह पुलिस का अमानवीय और संवेदनहीन रवैया भी है।

निर्भया कांड के बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी ने महिलाओं के प्रति अपराध रोकने के लिए मुख्य रूप से आठ सुझाव दिए थे। वर्मा कमेटी के सुझावों के अनुसार, नागरिकों की मूलभूत सुरक्षा, उनके सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए कोई भी पुलिस अधिकारी क्षेत्र या अन्य कारणों से अपराधों की सूचना लेने से मना नहीं कर सकता। इसके विरुद्ध आचरण करने वाले कर्मी के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्यवाही के रूप में सेवा समाप्ति तथा दो वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। तो क्या मध्य प्रदेश सरकार उपरोक्त कानून के अनुसार एक सख्त संदेश देने के उद्देश्य से संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करेगी या केवल संकेतात्मक निलंबन करके ही अपने कर्तव्य से मुक्ति पा लेगी।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्ष 2006 में उच्चतम न्यायालय तथा 2013 में वर्मा आयोग की सिफारिशों के बावजूद अभी तक देश में पुलिस सुधार लागू नहीं हुए हैं। इन सुधारों के लागू न होने के कारण देश की पुलिस नागरिकों की सुरक्षा, स्वतंत्रता तथा सामाजिक मूल्यों की रक्षा करने में विफल होती नजर आ रही है। पुलिस में नियुक्ति, प्रमोशन तथा तबादलों पर प्रदेश सरकारों का नियंत्रण होने के कारण अक्सर सत्ताधारी दल के कैडर प्रदेश में अपनी मर्जी से पुलिस को चलाते हैं, जिसके उदाहरण अक्सर देखने में देश के हर हिस्से से आते हैं। देश में महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानूनों की कमी नहीं है, लेकिन उनका ठीक तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। हमें शीघ्र ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिससे महिलाओं के साथ होने वाले अपराध रोके जा सकें। महिला अपराधों को रोकने के लिए सरकारी तंत्र के साथ समाज का सहयोग भी जरूरी है।
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