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खाद्य सुरक्षा के समाधान का भ्रम

सीमा जावेद

Updated Sat, 20 Oct 2012 08:01 PM IST
illusion of food security solutions
आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और खासकर देश की खाद्यान्‍न सुरक्षा में संभावित मूल्य के बारे में चल रही बहस के बीच प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति ने देश की खाद्यान्‍न सुरक्षा के लिए जीएम फसल अपनाने की सलाह दे डाली। हालांकि संयुक्त राष्ट्र प्रायोजित अंतरराष्ट्रीय कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास आकलन दुनिया भर के 900 विशेषज्ञ पिछले 50 वर्षों में सभी कृषि प्रौद्योगिकियों और पद्धतियों का मूल्यांकन कर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ऐसी कृषि नीतियां, जो पारिस्थितिकी दृष्टिकोण एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देते हुए जैविक खेती को प्रोत्साहित करती हैं, वे गरीबी कम करने और खाद्य सुरक्षा में सुधार लाने में ज्‍यादा सार्थक साबित हुई हैं।
देश के मौजूदा कृषि परिदृश्‍य पर नजर डालें, तो बीटी कपास देश में इस वक्‍त बाजार में उपलब्‍ध एकमात्र जीएम फसल है। हकीकत यह है कि केंद्र सरकार तथा उद्योग जगत ने इसकी कामयाबी की कहानी को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। उदाहरण के लिए, यह कहा जा रहा है कि इस फसल से कृषि उत्‍पादन में बढ़ोतरी और उत्‍पादन लागत में गिरावट आई है। जबकि जमीनी सचाई इसके ठीक विपरीत है।

कृषि संसदीय समिति ने विगत मार्च में इस बारे में एक अध्‍ययन रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र में जारी की। इसके लिए समिति में शामिल विभिन्‍न दलों के 31 सांसदों ने देश के विभिन्‍न कपास उत्‍पादक क्षेत्रों के किसानों के साथ गहन चर्चा की। सरकारी एजेंसियों द्वारा उपलब्‍ध कराए गए तथ्‍यों-आंकड़ों एवं जाने-माने कपास वैज्ञानिकों की बातों का विश्‍लेषण करने के अलावा विदर्भ के किसानों के साथ बातचीत के बाद सांसद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बीटी कपास की गाथा उतनी सुहावनी नहीं है, जितनी कि प्रचारित की जा रही है। व्यावहारिक धरातल पर देखें, तो कटु सचाई यह है कि विदर्भ में शुरुआती वर्षों में कुछ बेहतर नतीजों के बाद कपास उत्‍पादन में गिरावट आने लगी है। फिर आम तौर पर सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर रहने वाले 85 प्रतिशत कपास उत्‍पादक किसानों को बीटी कपास से कोई लाभ नहीं है। इसके बीज की भारी लागत के कारण किसानों पर भारी कर्ज का बोझ भी है।

जब हम खाद्य सुरक्षा के बारे में बात करते हैं, तब हमेशा के लिए खाद्य उत्पादन को इतना बढ़ाना चाहते हैं कि यह बढ़ती आबादी की भूख शांत करने के लिए पर्याप्त हो। ऐसे में ताज्‍जुब की बात नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनिया हमें जैव तकनीक का छलावा देकर अपनी जेबें भरना चाहती हैं। हम खाद्य सुरक्षा के लिए नई तकनीकों के उपयोग की ऐसी नीतियां बनाते हैं, जो खाद्य उत्पादन में वृद्धि करें। लेकिन खाद्य सुरक्षा को गरीबी कम करने और दुनिया में सभी लोगों में भोजन की क्रयशक्ति के नजरिये से भी देखा जा सकता है। दरअसल खाद्य सुरक्षा का सही मतलब हर किसी की पहुंच के अंदर सस्‍ते और पौष्टिक भोजन की उपलब्‍धता ही है। क्या सचमुच में ऐसा हो रहा है? कतई नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा के नाम पर खाद्य पदार्थों की पहुंच अब निम्न आय वर्ग के लोगों के हाथ से निकलती जा रही है।

पिछले काफी समय से खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों के चलते कुपोषण की समस्‍या से आज भी हमें निजात नहीं मिल सकी। देश की घटती खेतिहर भूमि और बढ़ती आबादी की खाद्य सुरक्षा के लिए धुंधली पड़ चुकी हरित क्रांति के बाद अब जीएम फसलों को अपनाने पर बल दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इन फसलों के आने का सीधा मतलब खाद्यान्न की कीमतों में कमी और हर किसी की पहुंच के अंदर अनाज और सब्‍जी खरीदने की शक्ति आने से है। लेकिन हम अब भी मोनसेंटो के बीटी कपास के प्रवेश के बाद से कपास बीज में अपनी संप्रभुता नष्ट होने की भारी कीमत चुका रहे हैं : कपास बीज की कीमत में 800 गुना वृद्धि और कीटनाशकों के इस्तेमाल में बढ़त के साथ फसल की विफलता से कपास उत्पादक किसान कर्ज के बोझ तले बुरी तरह दब चुके हैं। आज हमारे कपास के बीजों का 95 फीसदी स्वामित्व 60 भारतीय बीज लाइसेंस कंपनियों के साथ समझौते के माध्यम से मोनसेंटो के हाथों में है।

सभी जीन संवर्द्धित फसलों के बीज बौद्धिक संपदा कानून के तहत बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों द्वारा पेटेंट हैं, और ये कंपनियां इन बीजों पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। देश में व्यावसायिक उत्पादन के लिए जारी इकलौती फसल बीटी कपास के मामले में यह मंशा साफ देखी गई। राष्ट्रीय स्तर पर भी मोनसेंटो ने किस तरह कपास के बीज के दाम बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों पर दबाव डाला, वह जग जाहिर है। देश में व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन मंजूरी की सीमा तक पहुंची पहली जीन संवर्द्धित फसल बीटी बैंगन में भी क्राय1 एसी नामक जीन था, जिसका मूल अधिकार मोनसेंटो और उसके जरिये बीटी बैंगन विकसित करने का लाइसेंस भारत में उसकी सहयोगी कंपनी महको के पास है।
 
जीएम मुनाफाखोर कंपनियों के बीज एकाधिकार पर आधारित गहन मूलधन निवेश वाली गैर-टिकाऊ कृषि तकनीक है, जो कर्ज की मार झेल रहे भारतीय किसानों के लिए एक अभिशाप है। जीएम फसलों के भारतीय कृषि में पदार्पण से केवल उन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों को ही लाभ पहुंचेगा, जो अपने जीएम बीजों के माध्यम से हमारी कृषि व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेना चाहती हैं। यदि जीएम फसलें आती हैं, तो सरकार कृषि व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बीज बाजार को पूरी तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देगी।
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