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जब तंत्र ही नाकाम हो जाए

मधु पूर्णिमा किश्वर

Updated Wed, 19 Dec 2012 12:44 AM IST
If system fails
मीडिया को महिलाओं की याद तभी आती है, जब उसके खिलाफ कोई जघन्य अपराध होता है। जैसा कि दिल्ली में चलती बस में हुई गैंगरेप की घटना के बाद दिख रहा है। वरना मीडिया को महिलाओं की ग्लैमर डॉल व फिल्म स्टार छवि ही ज्यादा पसंद है। मीडिया, खासकर टीवी चैनल वाले अक्सर एक से दूसरे अपराध के बीच ही झूलते रहते हैं।
ऐसी खबरों पर अक्सर मीडिया वाले झूम उठते हैं और उसे दिन भर घिसे-पिटे भावनात्मक फिल्मी जुमलों के जरिये चलाते हैं, जिससे घटना की संवेदनशीलता खत्म हो जाती है। परंतु जब समाज में आए दिन ऐसी घटनाएं घटे, तो ये इंफोटेनमेंट (मनोरंजन प्रधान सूचना) नहीं रह जातीं।

एक-आध दिन में उस सनसनीखेज अपराध की चर्चा से दिल ऊब जाता है और महिला मुद्दे ठंडे बस्ते में पहुंच जाते हैं, जहां से निकालने के लिए हमें एक नए सनसनीखेज अपराध का इंतजार करना पड़ता है। और जब महिलाओं की याद आती है, तो बहस थोथली हाय-तौबा के अंदाज तक ही सीमित रहती है कि सरकार व पुलिस निकम्मी है, बलात्कारियों को फांसी क्यों नहीं देती, उन्हे चौराहे पर खड़ा कर सार्वजनिक मौत के घाट क्यों नहीं उतारती इत्यादि का राग हर बार एक ही सुर में सुनने को मिलता है।

किसी भी समाज में अपराध तभी बढ़ता है, जब कानून-व्यवस्था स्वयं अपराध में लिप्त हो जाए। वस्तुस्थिति यह है कि आज जितना अपराध थानों में होता है, उतना सड़कों पर नहीं। हालत यह है कि महिलाओं की बात तो छोड़िए, कोई शरीफ पुरुष भी थाने जाने से डरता है। यदि किसी के दरवाजे पर पुलिस पहुंच जाती है, तो उसे सुरक्षा भावना नहीं मिलती, बल्कि लगता है कि कोई आफत आ गई।

पुलिस पर जब तक बहुत ज्यादा दबाव नहीं पड़ता, तब तक वह अपराध दर्ज ही नहीं करती। बड़ी और चर्चित घटनाओं में भी पुलिस ने तभी कार्रवाई की, जब उस पर मीडिया का भारी दबाव बना, चाहे वह प्रियदर्शिनी मट्टू कांड हो, जेसिका लाल हत्याकांड हो या रुचिका का मामला। आम आदमी की तो एफआईआर दर्ज कराने में ही हालत खस्ता हो जाती है। जब तक आपके पास कोई बड़ी सिफारिश न हो, आपके साथ कोई बड़ा वकील न हो या पुलिस को मोटा चढ़ावा चढ़ाने की औकात न हो, तो एफआईआर तक दर्ज नहीं होती।

हां, मुंहमांगा चढ़ावा चढ़ा दीजिए, तो जितनी मर्जी झूठी एफआईआर दर्ज हो जाएगी। पुलिस अगर सही जांच करके सुबूत पेश करे, तो अपराधियों को सजा मिलने की संभावना बढ़ जाती है। पर सही सुबूत को दबाना और झूठे सुबूत पेश करना पुलिस का रोजमर्रा का काम हो गया है। एक तरफ आम आदमी पुलिस के पास रिपोर्ट तक लिखाने के लिए जाने से डरता है, दूसरी तरफ अपराधियों को संरक्षण देना पुलिस की लत बन चुकी है, क्योंकि 'असली' कमाई तो अपराधियो के साथ मिलीभगत से ही होती है।

देश में बढ़ते अपराध के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि कत्ल, जघन्य गैंगरेप, बड़ी डकैती, बम विस्फोट जैसे बड़े हादसों को छोड़ छोटे अपराध तो पुलिस गिनती में ही नहीं लाना चाहती। यहां मामला सिर्फ पुलिस भ्रष्टाचार का नहीं। इस समस्या की जड़ तो गृह मंत्रालय व पुलिस के उच्चतम नीति-निर्धारकों के आदेशों में है। देश में अपराध दर कम दिखाने के चक्कर में पुलिस प्रशासन उन थानों को लताड़ता है, जहां अपराध दर ज्यादा दर्ज होता है।

जिस एसएचओ के थाने में अपराध दर के आंकड़े गिरते दिखते हैं, उनकी प्रोन्नति के अवसर बढ़ जाते हैं और जिसके थाने में अधिक अपराध रिकॉर्ड में आ गए, उसका करियर बिगड़ गया। ऐसे में भला कोई भी एसएचओ ईमानदारी से अपराध के केस क्यों दर्ज होने देगा? मेरे निजी अनुभव में कई ऐसे मामले हैं, जहां पुलिस ने पीड़ित पर मनगढंत केस दर्ज कर दिए, ताकि वह दबाव में आकर एफआईआर करने की हिम्मत न करे।

इसलिए छोटे अपराधों को (जिनमें छेड़छाड़, चोरी, छोटी-मोटी डकैती भी शामिल है) पुलिस बिल्कुल नजरंदाज कर देती है। इसकी वजह से छोटे गुडों के हौसले बढ़ जाते है और पुलिस सहभागिता की वजह से वे माफिया डॉन बन जाते है। दाऊद इब्राहिम की शुरुआत भी छोटे-मोटे अपराधों से हुई थी। महाराष्ट्र पुलिस और राजनेताओं ने मिलकर उसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय डॉन बनने में सहयोग दिया। आज भी कराची में बैठकर वह महाराष्ट्र पुलिस और राजनेताओं को उंगली पर नचाने के लिए ताकत का इस्तेमाल करता है। ऐसे में मीडिया में उठ रही यह मांग मुझे बहुत दुख पहुंचाती है कि बलात्कार की सजा बढ़ाकर मृत्युदंड कर दी जानी चाहिए।

किसी भी समाज में अपराध तब कम होता है, जब कानून-व्यवस्था के प्रति लोगों में आस्था हो। सजा कड़ी करने से अपराध कम नहीं होते। यह जगजाहिर है कि जिन देशों में अपराध दर नगण्य है, वहां फांसी की सजा है ही नहीं, और जहां बात-बात पर सूली पर लटका दिया जाता है, वहां अपराध दर कम नहीं हुआ। बस कानून का दुरुपयोग बढ़ गया, जैसा अपने यहां दहेज विरोधी कानून के साथ हो रहा है।

फांसी की सजा की मांग, तो फूहड़ मानसिकता की उपज है, क्योंकि जिस देश की पुलिस ईमानदारी से एफआईआर दर्ज करने की तहजीब नहीं रखती, उससे यह उम्मीद करना कि वह इस हथियार का सही इस्तेमाल करेगी, निरी मूर्खता है। यदि आज पुलिस बलात्कार केस को रफा-दफा करवाने के एवज में एक लाख घूस लेती है, तो फांसी की सजा इस अपराध से जुड़ जाने पर यह रेट बढ़ जाएगा।

यदि हम ईमानदारी से अपराध कम करना चाहते हैं, तो सबसे पहले देश की पुलिस व न्याय व्यवस्था में व्यापक सुधार लाने की जरूरत है। फिलहाल कोई भी राजनीतिक दल इसके लिए तैयार नहीं दिखता, क्योंकि कमोबेश हमारी सभी पार्टियां गुंडों को पालने का काम कर रही हैं। इस देश के नागरिकों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है- पुलिस, प्रशासन व राजनेताओ पर कैसे अंकुश लगाया जाए। जिस दिन हमने सरकारी गुडों पर नकेल डालने का रास्ता खोज लिया, असली अपराधियों को काबू करने का रास्ता आसानी से मिल जाएगा।

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