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इस चक्रव्यूह से कैसे निकलें

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मधुरेंद्र सिन्हा

Updated Wed, 19 Dec 2012 11:21 PM IST
how to exit from this chakravyuh
इस समय वित्त मंत्रालय एक बहुत बड़े सवाल का हल ढूंढ़ने का प्रयास कर रहा है, जो सीधे तौर पर अगले आम बजट से जुड़ा हुआ है। यह है, सरकार की घटती आमदनी और बढ़ते खर्च। वर्ष 2012-13 के बजट में सरकार को जितनी टैक्स वसूली की उम्मीद थी, वह अर्थव्यवस्था में आई मंदी की भेंट चढ़ती दिख रही है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों की वसूली का लक्ष्य अब धुंधला होता जा रहा है।
एक तरफ सरकार के खर्चे थमने का नाम नहीं ले रहे, दूसरी ओर चुनाव नजदीक आने के कारण लोकलुभावन योजनाओं को मूर्त रूप देने की उसकी चुनौती बढ़ती जा रही है। लोकसभा चुनाव के पहले सरकार कई तरह की योजनाएं लागू करना चाहती है, लेकिन समस्या है कि इसके लिए विशाल धनराशि कहां से आएगी। यही नहीं, देश में चल रही कई ऐसी योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए जो अरबों रुपये चाहिए, उनका प्रबंध भी मुश्किल से होता दिख रहा है। और इनकी वजह है, करों की वसूली में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होना।

हालांकि वित्त मंत्री कह रहे हैं कि सरकार इस वित्त वर्ष में 5.7 लाख करोड़ रुपये की कर वसूली का लक्ष्य पूरा कर लेगी, पर जानकारों को इस पर संदेह है, क्योंकि कुल प्रत्यक्ष कर वसूली में बढ़ोतरी सात प्रतिशत की है, जबकि सरकार का इरादा 15 प्रतिशत का है। इस कमी की वजह यह है कि सरकार को अभी बड़े पैमाने पर रिफंड भी देना है। इसी तरह अप्रत्यक्ष करों की वसूली भी लक्ष्य से काफी पीछे है। सरकार की मंशा थी कि इनमें 27 प्रतिशत का इजाफा हो, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

इनमें अप्रैल से सितंबर तक महज 15.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, और सरकार को 2.17 लाख करोड़ रुपये ही मिले। इसका सीधा कारण यही है कि कारखानों में उत्पादन कम हुआ, विदेशों से आयात भी घटा और लोगों ने खरीदारी भी कम की। सरकार को उम्मीद है कि रेल यात्रियों पर सर्विस टैक्स अक्तूबर से लगाने के कारण इस मद में आय बढ़ जाएगी। शेयर बाजारों में आई मंदी का असर भी यहां दिख रहा है। अप्रैल-सितंबर की अवधि में सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन ऐक्ट (एसटीटी) में वसूली 12.83 प्रतिशत गिरकर 2,914 करोड़ रुपये रह गई है। स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में गिरावट का असर कर वसूली के रूप में दिख रहा है।

यह भी एक दिलचस्प बात है कि आयकर देने वालों की तादाद अब भी काफी कम है। लगभग 120 करोड़ की आबादी वाले इस देश में महज 14 लाख लोग ऐसे हैं, जो 10 लाख रुपये से ज्यादा आय वर्ग के हैं और उसी हिसाब से कर देते हैं। इनकी आमदनी घटने का असर कर वसूली पर पड़ता है। देश में आयकर देने वालों की संख्या कुल आबादी का महज पौने तीन फीसदी है, जबकि अमेरिका में यह 45 प्रतिशत है। इस वज़ह से भी सरकार यहां लगातार अप्रत्यक्ष कर थोपती जा रही है।

इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि आबादी का 60 प्रतिशत अब भी खेती पर निर्भर है और बड़ी तादाद में लोग असंगठित क्षेत्र में हैं, जहां आयकर देने की नौबत नहीं आती। इसके अलावा शहरों में रहने वाले और छोटा-मोटा व्यापार करने वाले लाखों लोग आयकर नहीं चुकाते। सरकार ने उन्हें इसके लिए कभी मजबूर भी नहीं किया है। इसी का नतीजा है कि नौकरीपेशा लोग ही आयकर के दायरे में आते हैं। कर कानूनों में छिद्र की वजह से लाखों व्यापारी एवं पेशेवर लोग आयकर चुकाने से बच जाते हैं।

बहरहाल सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन चाहिए। पिछले वर्ष सरकार ने 40,000 करोड़ रुपये मनरेगा पर खर्च के लिए दिए थे। ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं पर कुल 88,000 करोड़ रुपये पिछले साल खर्च हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार को कितनी बड़ी राशि कल्याणकारी योजनाओं के लिए चाहिए। लेकिन अर्थव्यवस्था की कमजोरी उसे यह इजाजत नहीं देती कि अगले बजट में वह बड़ी घोषणाएं करे।

यहां तक कि कर की दरें भी वह बढ़ा नहीं सकती, क्योंकि प्रत्यक्ष कर संहिता तब तक पूरी तरह से लागू हो जाएगी। वैसे भी आम चुनाव निकट होने के कारण सरकार कर बढ़ाने के बारे में नहीं सोच सकती। जाहिर है, सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। इससे स्वाभाविक तौर पर बजट घाटा बढ़ेगा। लिहाजा सरकार को अन्य स्रोतों की ओर देखना होगा।

सरकार का राजकोषीय घाटा खतरनाक स्तर तक जा पहुंचा है। पिछले पांच वर्षों में राजकोषीय घाटा चार गुना बढ़ चुका है, जो सरकार के बेहिसाब खर्च को दर्शाता है। आलोचकों का तो कहना है कि इस बार देश का राजकोषीय घाटा पुर्तगाल, स्पेन जैसे देशों से भी ज्यादा होगा। इससे देश कंगाली की ओर बढ़ जाएगा। बढ़ते घाटे को पूरा करने के लिए सरकार लगातार कर्ज लेती जा रही है, जिसके चलते उसे ब्याज चुकाने पर भारी राशि खर्च करनी पड़ रही है। यह अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है।

मगर समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है। बढ़ते राजकोषीय घाटे के कारण अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां रेटिंग गिराने की धमकी भी दे रही हैं। एसऐंडपी ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो वह भारत की रेटिंग जंक यानी कूड़ा कर देगी। इससे देश में निवेश आना लगभग बंद हो जाएगा और पूंजी का भारी अभाव हो जाएगा।

अब देखना है कि वित्त मंत्री कैसे राजकोषीय घाटे को कम कर पाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या सरकारी तंत्र के बढ़ते खर्च को लेकर है। वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद से सरकारी कर्मचारियों पर तो खर्च बढ़ा ही है, मंत्रिमंडल का खर्चा भी बढ़ा है। सांसद, विधायक तथा अन्य जनप्रतिनिधियों पर भी खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार खर्च में कटौती की बात तो करती है, लेकिन उस पर अमल नहीं हो पाता। इतिहास गवाह है कि सरकार ने जब भी अपने खर्च में कमी की बात की है, तो वह दिखावा ही साबित हुआ है। सरकारी खर्च घटाना वक्त की मांग है।


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