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एफडीआई में दलितों का कितना हिस्सा

उदित राज

Updated Tue, 11 Dec 2012 12:42 AM IST
how much part of dalit in fdi
खुदरा व्यापार में एफडीआई की इजाजत के कई पक्ष हैं। लोकसभा एवं राज्यसभा में एफडीआई पर सरकार की जीत हुई। संसद में इतनी बड़ी मैराथन चर्चा में किसी ने भी यह पक्ष नहीं रखा कि एफडीआई का दलितों एवं आदिवासियों पर क्या असर पड़ेगा?
यह भी सत्य है कि ज्यादातर दलित सांसद अर्थशास्त्र की जानकारी कम ही रखते हैं, इसलिए भी ऐसी आवाज नहीं उठ पाई। 1991 में जब नई आर्थिक नीति लाई गई थी, तो लगा था कि जाति आधारित व्यवसाय एवं व्यापार की सीमा टूटेगी और मुक्त अर्थव्यवस्था में सबको फलने-फूलने की आजादी होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

सवर्ण जातियों को जरूर दलित एवं पिछड़ी जातियों के व्यवसाय और व्यापार में हस्तक्षेप करने का मौका मिला, लेकिन पिछड़ों और दलितों को यह अवसर प्राप्त नहीं हो सका। जहां तक दलितों और आदिवासियों के विकास की बात है, तो उनको निजीकरण, भूमंडलीकरण से फायदे के बजाय घाटा ही हुआ है। सवर्णों को जरूर उसका लाभ मिला है और एफडीआई का भी लाभ उन्हें ही मिलने वाला है। एफडीआई भी तो निजीकरण एवं भूमंडलीकरण का ही प्रतिफल है।

निजीकरण एवं उदारीकरण से तमाम नए व्यापार एवं कारोबार खड़े हुए, जिसमें दलितों और आदिवासियों की भागीदारी शून्य के बराबर रही है। चाहे वह आईटी, दूरसंचार, मॉल, आईपीएल या टीवी चैनल एवं तमाम सेवा देने वाले क्षेत्र क्यों न हों, क्या कोई यह प्रमाण दे सकता है कि इन क्षेत्रों में पूरे देश में कितने दलित एवं आदिवासियों की भागीदारी है? भागीदारी की बात तो दूर, उलटा आरक्षण समाप्ति की ओर है। सरकारी विभागों में कर्मचारी-अधिकारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं, पर उनकी एवज में भरतियां नहीं हो पा रही हैं, जबकि इन वर्गों में शिक्षा बढ़ने से सरकारी नौकरियां बढ़नी चाहिए थी।

मुक्त अर्थव्यवस्था से प्रतिकूल प्रभाव जरूर पड़ा है। दिल्ली में मोहम्मदपुर गांव में, जो भीकाजीकामा प्लेस के पीछे है, छह सैलून का सर्वे किया गया, तो पता लगा कि इनके मालिक सारे सवर्ण हैं। इसी तरह जूता बनाने का काम दलित करता था, लेकिन अब बड़ी कंपनियां इस काम को कर रही हैं और जिनका पारंपरिक पेशा था, वे हाशिये पर चले गए हैं। कपड़ा धोना एवं ड्राई क्लीन का भी काम सवर्णों के हाथ में चला गया है। यह निजीकरण एवं भूमंडलीकरण की वजह से हुआ। यदि दलितों एवं पिछड़ों को भी सवर्णों के व्यवसाय या नए व्यापार के क्षेत्र में भागीदारी मिली होती, तो आपत्ति नहीं थी।  

हम उस बहस में नहीं पड़ना चाहते हैं कि एफडीआई किसके हित में है या नहीं, लेकिन यह निश्चित है कि इससे दलितों का कोई लाभ नहीं होने वाला। एफडीआई के प्रमुख दो पक्ष हैं। एक है, किसानों एवं छोटे उत्पादकों से तमाम वस्तुओं को खरीदना और उसको बेचना, अर्थात उत्पादक एवं उपभोक्ता। जहां तक दलित उपभोक्ता की बात है, उन्हीं के पास क्रय शक्ति ज्यादा है, जिन्होंने आरक्षण की वजह से सरकारी सेवाओं एवं राजनीति में रहकर अच्छी माली हालत बना ली है।

यदि इनमें क्रेता वे होते, जो उत्पादक हैं, तो यह कहा जा सकता था कि विदेशी खुदरा व्यापार की वजह से उत्पादित वस्तुओं का दाम अच्छा मिला है, इसलिए उनकी आमदनी एवं क्रयशक्ति बढ़ी है। दलित-आदिवासी जमींदार हैं नहीं, अगर हैं तो छोटे-मोटे किसान। इसलिए यह भी संभव नहीं है कि खुदरा में एफडीआई से इनकी आय बढ़ेगी।

एफडीआई न केवल विदेशी कंपनियों के जरिये आएगा, बल्कि भारतीय पूंजीपति भी इसे लाने वाले होंगे। विदेशी कंपनियां भी दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछड़ों को नौकरी देने वाली नहीं है, क्योंकि उनका प्रबंधन प्रायः सवर्णों के हाथ में होगा। जिस तरह से अमेरिका एवं तमाम विकसित देशों में दबे-कुचलों को संरक्षण देने का काम किया जाता है, वैसा प्रयास भारत में भी करना होगा।

अमेरिका में पूरी तरह से मुक्त व्यापार है, पर सरकारी संरक्षण की वजह से वहां के वंचित जैसे अश्वेत, हिस्पेनिक्स एवं मूल निवासी की भागीदारी सुनिश्चित है। हमारे यहां जब एफडीआई का खुदरा व्यापार में रास्ता साफ कर दिया गया है, तो सरकार को चाहिए कि अमेरिका की तर्ज पर या हमारी आरक्षण की नीति के अनुसार दलित-आदिवासियों को रोजगार सुनिश्चित कराए।
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