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अर्थव्यवस्था को गति की उम्मीद

नारायण कृष्णमूर्ति

Updated Fri, 01 Jul 2016 11:01 AM IST
Hope to growth in economy

नारायण कृष्णमूर्ति

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंत्रिमंडल की मंजूरी को लेकर उत्साह है, हालांकि इसकी उम्मीद पहले से थी। शेयर बाजार ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, लेकिन बाजार से जैसी उछाल की अपेक्षा थी, वैसी नहीं दिखी। बाजार की इस नरम प्रतिक्रिया की मुख्य वजह यह है कि बाजार ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया तभी दी थी, जब विगत फरवरी में केंद्रीय बजट पेश करते वक्त सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की संभावित तिथि का जिक्र किया गया था।
इसके बावजूद वेतन आयोग की सिफारिशों को जिस समय मंजूरी दी गई है, वह ध्यान देने लायक और स्वागतयोग्य है। यह कदम तब उठाया गया है, जब वैश्विक आर्थिक कारणों से शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का माहौल है। आयोग द्वारा 23.55 फीसदी वेतन वृद्धि की सिफारिश की गई, जो एक जनवरी, 2016 से प्रभावी होगी। इसलिए अगर बकाया राशि का भुगतान सितंबर से किस्तों में किया जाएगा, तो बकाया राशि के भुगतान में छह से आठ महीने का समय लगेगा, जो उतना ज्यादा नहीं होगा, जितना 2008 में केंद्रीय कर्मियों को एरियर के रूप में दिया गया था। नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार भुगतान वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में किया गया था, जब सरकार ने प्रोत्साहन पैकेज की भी शुरुआत की थी, जिसमें उत्पाद शुल्क को सोलह फीसदी से घटाकर आठ फीसदी कर दिया गया था और अक्तूबर, 2008 से अप्रैल, 2009 के बीच ब्याज दरों में 425 बेस पॉइंट की कटौती की गई थी। वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल सरकारी नीतियों और निजी क्षेत्र में शानदार निवेश के अतिरिक्त था।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल होने से बाजार में उपभोक्ताओं की मांग बढ़ेगी, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत उम्मीद जता रहे हैं कि सरकारी कर्मचारियों के हाथों में जो अतिरिक्त पैसे आएंगे, वे सबसे ज्यादा आवास और स्थायी उपभोक्ता क्षेत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। सरकारी घोषणा के बाद ऑटो एवं कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियों के शेयर मूल्यों में तेजी देखी गई। उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में वृद्धि होने से शेयर बाजार ऊपर उठेगा। फिर भी कुछ अन्य कारक हैं, जो इस परिकल्पित नतीजे में भूमिका निभाएंगे। सबसे प्रमुख भूमिका वास्तविक मानसून की होगी, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। वेतन वृद्धि का भुगतान ऐसे समय होगा, जब त्योहारों का मौसम भी शुरू होगा। यह अच्छी खबर है, क्योंकि तब उपभोक्ता वस्तुओं और हाउसिंग उद्योग की तरफ से ज्यादा छूट एवं ऑफर की पेशकश की जाएगी। इससे अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों, मसलन सीमेंट, आवास, पेंट्स एवं आवास से जुड़े अन्य उद्योगों को मजबूती मिल सकती है। भुगतान के समय को देखते हुए यात्रा एवं वस्त्रोद्योग क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

इससे निश्चित रूप से कुछ चुनींदा क्षेत्रों में मजबूती आएगी और यह निवेशकों के लिए भी ऑटो, पर्दे, एसी, फ्रिज तथा गैस स्टोव तथा आवास क्षेत्रों में उपभोक्ता केंद्रित शेयरों में संभावनाएं तलाशने का अच्छा अवसर है। कुल एक लाख करोड़ रुपये के बाजार में जाने से अर्थव्यवस्था को मदद मिलनी चाहिए। हालांकि अर्थव्यवस्था में जब वृद्धि होगी, तो व्यय से सरकार पर बोझ भी बढ़ेगा, खासकर ऐसे समय में, जब मुद्रास्फीति बढ़ रही है। उपभोक्ताओं को हाथ में ज्यादा पैसे आने पर मांग बढ़ेगी, लेकिन इससे महंगाई भी बढ़ेगी। सरकार पर अतिरिक्त बोझ का असर राजकोषीय घाटे को 3.5 फीसदी पर लाने के लक्ष्य पर भी पड़ेगा, जो सारा मजा किरकिरा कर सकता है।

सरकारी कर्मचारियों के हाथों में ज्यादा पैसे होने का असर क्या होगा, इसका जिक्र रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने केंद्रीय बैंक के नीतिगत बयान में किया है, जिसमें उन्होंने सातवें वेतन आयोग के भुगतान के बाद खास तौर पर मुद्रास्पीति बढ़ने की आशंका जताई है। संकेत हैं कि रिजर्व बैंक वेतन वृद्धि और मानसून के प्रभाव को देखेगा, जिसके चलते केंद्रीय बैंक द्वारा संभवतः ब्याज दर कटौती में देरी होगी। ब्याज दर में कटौती न होने की स्थिति में वेतन आयोग को लागू करने से जो उम्मीदें पैदा हो रही हैं, उस पर बाजार और अर्थव्यवस्था की प्रतिक्रिया उतनी सकारात्मक नहीं रहेगी।

हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं, जब पूरी दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, और केवल स्थानीय मुद्दे ही बाजार और आर्थिक गतिविधियों की गति तय नहीं करते। ब्रेग्जिट की उथल-पुथल, ब्याज दरों में कटौती को लेकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की चर्चा और अमेरिकी चुनाव के नतीजों के मद्देनजर हम अर्थवस्था में गिरावट की आशंका से इन्कार नहीं कर सकते, जो एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर सकता है। मुद्रा बाजार, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था पर असर डालेगी।

रोजगार पाने योग्य हमारी युवा आबादी को मुश्किल अर्थव्यवस्था में रोजगार के लिए कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जो शेयर बाजार की संभावनाओं को बिगाड़ सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि हम बड़े पैमाने पर निवेशकों को बाजार से अपना पैसा खींचते हुए देखेंगे, लेकिन सतर्कता की भावना रहेगी, खुशी की नहीं, जो छठे वेतन आयोग को लागू करने के बाद दिखी थी।
अच्छी बात यह है कि हम आधारभूत संरचना की बाधाओं से बाहर हैं। इस क्षेत्र में काम हो रहा है, और नई परिजनाओं को तेजी से मंजूरी दी जा रही है। दीर्घकालीन अर्थों में भारत की प्रभावी कहानी और किसी तरह की बाधा उत्पन्न होने के कोई संकेत नहीं होने के कारण नए निवेशकर्ताओं के लिए भी यह अच्छा समय है। जिन कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का लाभ मिलेगा, उन्हें इस अवसर का उपयोग करते हुए अपने वेतन वृद्धि का कुछ हिस्सा अलग करके दीर्घकालीन शेयर बाजार में निवेश करना चाहिए। धन कमाने के लिए शेयर बाजार में भागीदारी जरूरी है।

लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं
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