आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

हिंद स्वराज से सुषमा स्वराज तक

मृणाल पाण्डे

Updated Thu, 06 Sep 2012 05:55 PM IST
hind swaraj sushma swaraj
‘...आपका मिजाज उतावला है। ...स्वराज्य की इच्छा रखनेवाली प्रजा अपने बुजुर्गों का तिरस्कार नहीं कर सकती। अगर दूसरे की इज्जत करने की आदत हम खो बैठे, तो हम निकम्मे हो जाएंगे।...उनके खयाल गलत हैं और हमारे ही सही हैं या हमारे खयालों के मुताबिक न बरतने वाले देश के दुश्मन हैं, ऐसा मान बैठना बुरी भावना है, जो हक-न्याय चाहते हैं, उन्हें सबके साथ न्याय करना होगा।’
(गांधी, हिंद स्वराज,1905 )

सत्ताइस अगस्त को मीडिया को दिए भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज का वक्तव्य सुनकर 1905 में छपी पुस्तिका ‘हिंद स्वराज’ में सभी जुझारू स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई गांधी जी की उपरोक्त सलाह याद आ गई। सुषमा जी ने जो कहा, वह यह था, कि अगर प्रधानमंत्री सारे सवालों का जवाब देते, तो बेआबरू हो जाते, क्योंकि, ‘देहाती भाषा में कहूं तो (खदान आवंटन में) कांग्रेस को मोटा माल मिला,... ‘मोटा माल’ ही लिखिएगा। विपक्ष की नेता होने के नाते मैं यह बात पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रही हूं।’

यह सही है कि हाल में एकाधिक बड़े घोटाले देश के आगे उजागर हुए हैं। पर उनकी न्यायिक पड़ताल के बीच देश की दो लंबे राजनीतिक अनुभव वाली पार्टियों के बीच की जंग जिस तरह चौराहे पर उतर आई है, वह शर्मनाक है। यह और भी शर्मनाक है कि दोनों पक्षों के जो संगीन आरोप-प्रत्यारोप तथा क्रमवार सफाइयां संयत शब्दों में ठोस तथ्यों सहित संसद में प्रस्तुत होने चाहिए थे, वे जाने-माने विघ्नसंतोषी मीडिया के बीच आपत्तिजनक तरीकों से हलकी भाषा में गंदे लत्तों की तरह लगातार पहुंचाए और फींचे जा रहे हैं। इससे न तो भ्रष्टाचार कम होगा, न ही पेचीदा बहुआयामी मुद्दों को लेकर आम नागरिक की जानकारी बढ़ेगी।

लगता है, गांधी का संयमित भाषा और सत्य के प्रति कठोर आग्रह वाला गांधीवाद अधिक दिन तक हमको पचा नहीं। 2012 तक आते-आते हमारे राजनीतिक प्रतिष्ठान का वह सहज स्वभाव फिर सतह पर आ चला है, जिसके तहत हम लोग बाहरी-भीतरी चुनौती के क्षणों में मध्यकालीन भारत के रजवाड़ों की तरह पीढ़ियों पुरानी निजी अदावतों को निपटाने बैठ जाते हैं।

शायद जिसे हम आजादी के बाद का लोकतांत्रिक राजनीतिक विमर्श समझ रहे थे, वह कमोबेश ऊर्जा से चालित छत के पंखे की तरह बिजली चली जाने के बाद भी गति भौतिकी के नियमानुसार कुछ देर तक घूमता रहा। इस बीच हमने नहीं नोट किया कि गांधी युग की बिजली के संयंत्र एक-एक कर ट्रिप कर रहे हैं। उनकी सुध लेने के बजाय चुनाव दर चुनाव वही पैंतरेबाजी अपनाई जाती रही, जिसकी संभावना पहचान कर गांधी जी ने आजादी के बाद कांग्रेस को राजनीति त्याग कर सामाजिक कामों में जुटने को कहा था।

कुछ पाठक कह उठेंगे कि इस बरस संसद से सड़क तक जो प्रदर्शन, सार्वजनिक सभाओं में विशाल जनसमूह और गांधीवाद की भाषा नए संदर्भों में हमने देखी-सुनी, वे क्या एक नई सुबह का आगाज नहीं करते? हम क्षमा याचना सहित कहना चाहेंगे कि वे धरने-प्रदर्शन नाना घोटालों के ब्योरों के सायास या अनायास लीक होने से भले निकले हों, लेकिन उपचार के स्तर पर पार्टियों के वैचारिक शून्य के चलते वे बहस का आभासी झाग भर हैं। जो गंभीर और लंबे लोकतांत्रिक राजनीतिक विमर्श हमारे विविधताओं के पिटारे मुल्क में बदलाव की नई राह बना सकते हैं, उनके लिए नेतृत्व में प्रतिपक्ष को लेकर गांधी सरीखा गहन धीरज और अमर्ष भाव जरूरी हैं।

सड़क छाप जमावड़ों में राष्ट्रीय राजनीति के अहम सवाल क्रोध और निजी बदले चुकाने की इच्छा से निहायत सतही बना दिए गए हैं। मीडिया बहसों के विषय हैं, भाजपा का प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा, सुषमा या जेटली? क्या कुछ कांग्रेसी मनमोहन सिंह को हटाने में जुटे हैं? राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए राजी हुए या नहीं? क्या तीसरा मोरचा सबको धूल चटाने के फेर में लगा है? 2014 के चुनाव तक कितने छोटे दल पाला और कितने मोटे विधायक दल बदलेंगे? इस किस्म के सवालों से लोकतंत्र की दशा-दिशा में कोई खास फर्क नहीं पड़ना है।

’69 से ’97 तक देश को लगता था कि शायद गैरकांग्रेसवादी विमर्श देश की राजनीति में, नए वैचारिक ध्रुवीकरण रचकर ताजा ऑक्सीजन का संचार करेगा। लेकिन मध्यावधि में शासन में आकर अपने चमड़े के सिक्के चलाने की महत्वाकांक्षा ने सारे दलों व दलगत समीकरणों को क्रमश: एक सरीखे तेवर दे दिए हैं। दुधमुंहे अन्ना दल तक में, वही अहं के टकराव, वही अवयस्क बयानबाजी, वही अपनी कमीज को उजला साबित करने की उतावली भरने लगी है, जैसी बहुनिंदित कांग्रेस-भाजपा में।

मानसून सत्र से पहले देश के प्रधानमंत्री और विपक्ष के आडवाणी सरीखे बुजुर्ग कुलीन घराने की बहू की तरह राजनीतिक परिसर के अनेक खानदानी झगड़ों, अशालीन सवालों और व्यक्तिगत छींटाकशी झेलकर घर की आबरू कुछ हद तक बनाए रहे। पर सवालों की आबरू बनाए रखनेवाली उनकी खामोशी और विनम्रता को बुढ़ौती या कमजोरी का लक्षण कहा जाने लगा, तो बात हद लांघ गई। लिहाजा घर की बहू वाली सौम्यता त्याग कर अब सब चौराहे पर आ टीवी कैमरों के आगे प्रतिपक्ष के गंदे लत्ते फींचने की धमकी देने पर उतारू हैं।

इस बिंदु पर तय है, तो बस यह, कि केंद्र में सरकार चाहे जिस भी दल की अगुआई में बने, आगे बीजद, जदयू और शिरोमणि अकाली दल, समाजवादी तथा बसपा सरीखे क्षेत्रीय दल ही हर केंद्रीय गठजोड़ को बनाए रखने या गिराने के असली औजार रहेंगे।

शिवराज सिंह चौहान या हुड्डा, मोदी या ममता अथवा नीतीश, नवीन या प्रकाश सिंह बादल राज-काज के आजमूदा तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव लाने के पक्ष में कोई नहीं हैं। और तो और, खुद मौजूदा काबीना भी विवादित भू आवंटन नीति में बदलाव के मुद्दे पर बंटी साबित हुई है।

जैसा भी वह है, क्रांति को लेकर जोश या तो अन्नावादी नेताओं में बचा है या कश्मीर के अलगाववादियों में या फिर सोशल मीडिया के वक्तव्य वीरों की टोलियों में, जिनमें से किसी के भी पास भारतीय राजनीति की उफनाती धारा में नाव खेने का फर्स्ट हैंड अनुभव या वैचारिक सहिष्णुता कम से कम अब तक तो हमको नहीं दिखती।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

स्पॉटलाइट

'पाकीज़ा' की इस एक्ट्रेस को हॉस्पिटल में छोड़कर भाग गया बेटा, कमरे में बंद करके पीटता था

  • रविवार, 28 मई 2017
  • +

'मि. इंडिया' से स्टार बनी थी नन्ही 'टीना', अब कर रही है ये काम

  • रविवार, 28 मई 2017
  • +

रमजान से जुड़ी इन बातों को नहीं जानते होंगे आप

  • रविवार, 28 मई 2017
  • +

90 के दशक में धमाल मचाने वाली ये स्टार आज कर रही ऐसा काम, दुनिया में हो रहा भारत का नाम

  • रविवार, 28 मई 2017
  • +

जानिए क‌ितना भ्‍ााग्‍यश्‍ााली है रविवार का द‌िन

  • रविवार, 28 मई 2017
  • +

Most Read

सामरिक आत्मनिर्भरता की ओर

Toward strategic self-reliance
  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

पत्थरबाज और मेजर गोगोई

Stone-pelter and Mejor Gogoi
  • गुरुवार, 25 मई 2017
  • +

ये तय करेंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे

Four Implications Leading Up to India’s 2019 General Election
  • सोमवार, 22 मई 2017
  • +

दूसरी पारी में चुनौती अमेरिका से भी

Challenge in second term from US too
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

विपक्षी एकता की परीक्षा

Test of Unity of Oppositions
  • मंगलवार, 23 मई 2017
  • +

नक्सलवाद: पचास साल और आगे?

Naxalism: 50 years and henceforth?
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +
Live-TV
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top