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कब सांसों में महकेगा असली भारत?

गुलजार/गीतकार और फिल्मकार

Updated Sun, 26 Jan 2014 01:06 AM IST
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गणतंत्र सही मायनों में तभी है, जब देश में हर तरह के लफ्जों को आजादी हो। लफ्जों या जुबानों की किसी किस्म की सरहद या उन पर बंदिश नहीं होनी चाहिए। हिंदुस्तान की पहचान कमोबेश इसीलिए दुनिया भर में है। यहां कदम-कदम पर बदलाव भले ही नजर आते हैं, मगर कहीं न कहीं उनमें एक सूत्र है जो सबको आपस में जोड़ता है या पिरोता है।
जैसे हमारे गीत-संगीत और फिल्मों को ही देखिए। दुनियाभर में हमारे संगीत और हमारी फिल्मों को पसंद किया जा रहा है। लोग हमारे कामों को भी बेपनाह तरजीह देने लगे हैं। हमारी स्वीकार्यता बढ़ी है। सात समंदर पार तक हमारा संगीत गूंज रहा है। फिल्‍म स्लमडॉग मिलेनियर और उसके गीत जय हो को ही देखिए। आखिरकार विदेश में भी लोग हमारे कामों का लोहा मान रहे हैं। दरअसल, सरहदें खत्म करने में ये गीत-संगीत और फिल्में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

मगर, इसे हासिल करने के लिए अपने में इल्म का होना बेहद जरूरी है, जो सिर्फ पढ़ने-लिखने से ही आता है। हमारे देश के युवाओं को आज जरूरत है दुनिया के साहित्य को ज्यादा से ज्यादा पढ़ने की। गीत-संगीत को सुनने और फिल्मों को देखने की, ताकि हमारी सोच का दायरा बढ़े, खुले। जाहिर है इससे देश की बुनियाद के बारे में हमारी समझ भी विकसित होती है। एक राय कायम होती है। सबसे पहले इसके लिए देश की मिट्टी के सोंधेपन को महसूस करना, उसकी खुशबू में रमना जरूरी है।

इसके लिए स्‍थानीय लहजे पर भी जोर होना चाहिए। ये चीजें हमें कहीं न कहीं एक-दूसरे से जोड़ती हैं जैसे गीतों में कोई शब्द आता है और चर्चित होता है तो पूरे देश में उसकी पहचान कायम हो जाती है। देश की संस्कृति उसमें ध्वनित होने लगती है। मगर, आजकल जो गीत लिखे जा रहे हैं, उनमें सुकून नहीं है, चैन नहीं है। उसकी वजह है कि हमारे समाजों से ये सुकून गायब होता जा रहा है।

आखिर कैसा गणतंत्र चाहते हैं हम, जहां पीपल तो है, मगर उसकी छांव नहीं है। जिंदगी की रफ्तार इतनी ज्यादा है कि उसमें सुकून कहीं खो गया है। इस देश की एक खास संस्कृति है, जिसमें अपनापन बेहद अहमियत रखता है। भूख लगने पर मां से कहना कि दाल-रोटी बना दो, उसमें एक लहजा है, तहजीब झलकती है। इसीलिए जब हम कोई लफ्ज बोलते हैं तो पूरा का पूरा कल्चर कम्युनिकेट होता है। मैं खुद इस मामले में बेहद लालची हूं। बहुत कुछ ओढ़कर जी लेना चाहता हूं। उतनी ही बेचैनी से करवटें लेता हूं, उतनी ही शिद्दत से जीना चाहता हूं।
(दिनेश मिश्र से बातचीत पर आधारित)
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