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सरकार है कि मानती नहीं

यशवंत व्यास

Updated Fri, 07 Sep 2012 10:20 AM IST
govt not ready to agree
भ्रांति के कारीगर काम पर हैं। वे समूचे समय को चालाक मौसम में बदलने का मजा ले रहे हैं। जमीन सूखी है, वे कहते हैं, लीजिए ये बादल आए। रोटी गायब होती है, वे कहते हैं, जादू है-जादू का मजा लीजिए। घोटालों की राशि पर शून्य बढ़ते जाते हैं, वे कहते हैं जीरो लगाने की आदत से बाज आइए। चार्जशीट की बात करो तो वे धमकी देते हैं। देश की बात करो, तो वे खुद को देश से बदल लेते हैं। उनके पास हमले हैं, अमले हैं और नकली आंकड़ों के ऊंचे-ऊंचे गमले हैं। इसलिए जब उनके लीडर ने कहा, डरो मत हमले करो, तो प्रसन्न भाव से उनके अनुयायियों ने कुछ इस तरह उद्घोष किया कि जैसे वे तो सिर्फ लीडर से डरे हुए थे, वरना खिलाफ बोलने वालों से धरती कभी की खाली कर चुके होते।
'क्या वजह है कि उधर घोटालों की संख्या बढ़ती जाती है और आपकी आक्रमकता बढ़ती जाती है?' मैंने पूछा।

वे वामपंथ के विश्वास और दक्षिणपंथ के व्यवहार का पान खाते हुए बोले, 'विचलनों को मोहनी चाल में रूपांतरित कर देना आसान नहीं होता। हमारी सत्ता को यह परम तत्व प्राप्त करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है। हमने श्रम किया है, अनुभव लगाया है, आत्माओं के बाजार को एफडीआई के लिए खोला है। इसके बाद भी अगर हमें हमलों का अधिकार नहीं देंगे, तो लोकतंत्र कैसे बचेगा?'

मैंने अफसोस में सिर हिलाया, देश के लोग आंदोलित हैं, आपको संभलकर चलना चाहिए। उन्होंने मुझे करीब लिया और एक कहानी सुनानी शुरू की। कहानी कुछ यों थी-

एक न्यूक्लियर फैमिली थी- एक बच्‍चा और पति-पत्नी। पति काम से लौटता और खाना खाकर टीवी के सामने बैठता। एक दिन बीवी ने आंखों में देखा और कहा,'तुम्हारी आंखों के नीचे काले घेरे आ गए हैं। शायद टीवी के स्क्रीन की वजह से है। कमरा छोटा है टीवी का ढांचा पुराना है। फ्लैट स्क्रीन टीवी हो, तो तुम्हारी आंखें शायद बच जाएं।' पति ईएमआई पर फ्लैट स्क्रीन टीवी ले आया। ईएमआई के लिए दो घंटे और काम शुरू हुआ।

अब बात-मुलाकात का समय कम होने लगा और एक रविवार को उसने देखा कि पत्नी सुबह से कपड़े धो रही है। उसकी थकान का अंदाजा लगाने पर बहुत ग्लानि हुई। वह एक वाशिंग मशीन ले आया। अब इसकी भी ईएमआई शुरू हुई। दो घंटे और काम बढ़ गया। एक ईएमआई, एक काम, फिर ईएमआई फिर काम।

एक रात दोनों लेटे हुए थे। उनके छोटे से फ्लैट में एक-दो फुट की बालकनी भी थी, जिससे बाहर चांदनी फैली होने की उम्मीद जगती थी। वे पास सोते हुए बच्चे को देखकर अपना बचपन याद करने लगे। इसे हम क्या दे पाते हैं? एक चांदनी रात भी नहीं। हम गांव में थे। गजब का बचपन था। तारे थे, जीवन था। वे अपराध बोध से भर गए।

दूसरे दिन से बच्चे के लिए अलग-अलग चीजें दिलाने का क्रम शुरू हुआ। इनका अपराध बोध नए बजट के तनाव से पीटने की दिशा में बढ़ा। आजकल वे अखबार नहीं पढ़ते ईएमआई देते हैं। सेहत की फिक्र में अनुलोम-विलोम करते हैं। उन्हें अन्ना हजारे अच्छे लगते थे, लेकिन 'क्या करें, वे ही नहीं चले। कोई ठीक-ठाक आंदोलन यदि सफल हो जाए तो बताना, हम भी साथ चलेंगे।'

कहानी खत्म होने पर उन्होंने निष्कर्ष बांटा- 'धुंधली चुराई हुई चांदनी रात में सोते हुए बच्चे के बाप के लिए महंगाई और भ्रष्टाचार पर बात करना समय की बर्बादी है। बीस साल बाद के लिए आज काम करें या कोलगेट और असम पर बहस करें? यह काम तो विपक्ष की बड़ी-बड़ी पार्टियों को करना चाहिए और विपक्षी पार्टियां जो हैं, इस उम्मीद से हैं कि सरकार एक दिन खुद भ्रष्ट होकर गिर जाएगी और उसके मलबे पर उनका फूल खिल उठेगा। क्या आप चाहते हैं कि सरकार मान जाए और विपक्ष का काम भी खुद ही कर ले ?' मैं उनके निष्कर्ष पर चुप हो गया।

वे गरीबी को शाश्वत विचार बताते हुए स्टॉक एक्सचेंज में टहलने निकल लिए।
यह सरकार नहीं मानेगी।
कोई सरकार नहीं मानती।
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