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जब छिपने की कहीं कोई जगह नहीं होगी

Varun Kumar

Varun Kumar

Updated Thu, 16 Aug 2012 01:11 PM IST
Google Glass Applications Scientific Miracle
मैंने पिछले दिनों गूगल के सह-संस्थापक सर्गेई ब्रिन को एक कॉन्फ्रेंस में गूगल ग्लास पेश करते हुए देखा। गूगल ग्लास दरअसल एक चमत्कारी चश्मा है, जो वीडियो, ऑडियो, चैट, ई-मेल, मौसम की जानकारी, जीपीएस, वस्तुओं के दाम और उसकी जानकारी चश्मे के शीशे पर प्रक्षेपण तकनीक द्वारा पहुंचाएगा। यह कार्यक्रम देखना वाकई एक बहुत रोमांचक अनुभव था। लेकिन इस वैज्ञानिक चमत्कार को मैं वस्तुतः दूसरी तरह से देख रहा था।
मैं सोच रहा था कि इस पृथ्वी पर प्रत्येक आदमी के पास अगर गूगल ग्लास हो, तो क्या होगा! गूगल स्ट्रीट कैमरे पहले से ही दुनिया भर के शहरों को ढूंढते फिर रहे हैं। गूगल अर्थ उपग्रह ऊपर आसमान से हमारे घर में ताक-झांक कर रहे हैं। मान लीजिए, अगर गूगल अर्थ लाइव कवरेज पर उतर आए, तो वह सहारा रेगिस्तान में आपके फंसे होने की तसवीर न्यूयॉर्क में रह रही आपकी प्रेमिका को दिखा सकता है। अगर प्यास के मारे आप कुछ ही मिनटों में मरने वाले हैं, तो वह इसकी तसवीर भी आपकी प्रेमिका को दिखा सकता है। लेकिन मरने से पहले आप जो सोच रहे हैं, उस बारे में क्या वह आपकी प्रेमिका को बता पाएगा?

जरा सोचिए कि इस दुनिया में छिपने की अगर कोई जगह न हो, तो क्या होगा! हर कदम पर लगे हुए कैमरे अगर आपकी निजता को खत्म करने पर तुले हों, तो आप क्या करेंगे? मुझे कृपया संदेहवादी न समझा जाए। वैसे भी सर्गेई ब्रिन दैत्य की तरह नहीं लगते। उनका गूगल ग्लास तकनीकी श्रेष्ठता का एक चमत्कार ही है। लेकिन मैं दरअसल कुछ और ही सोच रहा हूं। आने वाले दिनों में हमारे जीवन की तमाम गतिविधियां कैमरों में दर्ज होंगी। हमारे जीवन का हर टुकड़ा एक आंकड़ा होगा। सवाल यह है कि इन आंकड़ों से दुनिया करेगी क्या। और इन आंकड़ों से हम हमारे जीवन को भला कैसे विश्लेषित कर पाएंगे?

अपने एक पिछले ब्लॉग में मैंने कैमरे के भविष्य पर लिखा था। कैमरा और कुछ नहीं, आंकड़े इकट्ठा करने वाला उपकरण भर है। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह केवल 'देख' सकता है और अपने हिसाब से आंकड़ा एकत्रित कर सकता है। भविष्य में कैमरा उन सूक्ष्म कणों की भी तसवीर ले सकेगा, जिनमें से ज्यादातर गोपनीय और संवेदनशील हैं। कल्पना कीजिए कि एक फिल्मकार एक पार्टी के दृश्य की शूटिंग कर रहा है। लेकिन भविष्य का कैमरा अभिनेताओं के प्रदर्शन और उनके संवादों के अतिरिक्त उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए परफ्यूम, यहां तक कि उनके शरीर के तापमान तक को दर्ज कर लेगा। अपने एडिटिंग रूम में बैठा फिल्मकार इन आंकड़ों का क्या करेगा? कम से कम मैं ऐसा फिल्मकार नहीं होना चाहता।

इस दौर में तमाम आंकड़े इंटरनेट के जरिये आ रहे हैं। आज हमारे पास जितनी सूचनाएं हैं, उतनी इससे पहले कभी नहीं थीं। अनेक विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में सर्च इंजन की जगह इंटीट्यूटिव (अंतदर्शी) सर्च इंजन ले लेगा। लेकिन कैसे? दिक्कत यह है कि जो आपके लिए अंतदर्शी है, वह मेरे लिए नहीं है। ऐसे में क्या कोई ऐसा उपकरण विकसित कर सकता है, जिसके आंकड़े हमारी जरूरत के अनुरूप हों, जो महज आंकड़े न होकर हमारी संवेदनाओं से जुड़े हों? तभी हम 'खोज' के क्षेत्र में लंबी छलांग मार सकते हैं। क्या आने वाले दिनों में वीडियो गेम्स और सर्च इंजन मिलकर एक तकनीक बनेंगे? कहने का मतलब यह कि क्या सोशल मीडिया, वीडियो गेम्स और सर्च इंजन क्या हमारी भावनाओं और संवेदनाओं से संचालित होंगे!
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