आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

तमिलनाडु में गालिब और दिल्ली में तिरुवल्लुवर

तवलीन सिंह

Updated Sat, 29 Sep 2012 09:40 PM IST
पिछले सप्ताह दक्षिण अफ्रीका में हिंदी सम्मेलन हुआ और मुझे भारत देश में सख्त तकलीफ हुई। कुछ इसलिए कि जब भी मुझे दिखते हैं भारत सरकार के अधिकारी विदेश यात्राओं पर जाने के नए-नए बहाने ढूंढ़ते हुए, मुझे अच्छा नहीं लगता। और कुछ इसलिए कि किसी भाषा पर जब सम्मेलन होने लगते हैं, तो ऐसा लगने लगता है कि उस भाषा के आखिरी दिन आने वाले हैं।
अंगरेजी पर क्यों नहीं होते हैं सम्मेलन? ब्रिटेन के विदेश मंत्री क्यों नहीं किसी खूबसूरत विदेशी शहर में जाते हैं अपनी मातृभाषा पर चर्चा करने? इसलिए कि इसकी जरूरत ही नहीं है। अंगरेजी अब विश्व भाषा बन गई है और अपने भारत देश में तो इसकी ताकत इतनी बढ़ गई है कि छोटे, दूर-दराज के गांवों में भी आज मिलते है, 'इंग्लिश मीडियम स्कूल'।

इन स्कूलों में न पढ़ाने वालों को अंगरेजी आती है और न ही सीखने वाले को, मगर सीखने की कोशिश में भूल जाते हैं अपनी ही भाषा। नतीजा यह कि इस देश की कई भाषाओं का हाल बुरा हो गया है। भारतीय भाषाओं में से सबसे अच्छा हाल हिंदी का है आजकल। इतना अच्छा, जितना कभी पहले न हुआ होगा। अंगरेजों का राज समाप्त होने के बाद जो स्वतंत्रता का पहले दशक था, उसमें हिंदी का इतना अच्छा हाल नहीं होता था, बावजूद इसके कि सरकारी कामकाज इस भाषा में शुरू हो गया था।

इसके बाद भारत सरकार ने हिंदी को जबर्दस्ती थोपने की कोशिश की उन राज्यों के लोगों पर, जिनका हिंदी से दूर का कोई रिश्ता नहीं था। विरोध हुआ दक्षिण के राज्यों में भाषा के मुद्दे पर, तनाव फैला। ये राज्य अंगरेजी को तो स्वीकार करने को तैयार थे, लेकिन हिंदी को नहीं। आज स्थिति यह है कि कुछ तो बॉलीवुड की मेहरबानी से और कुछ निजी टीवी चैनलों के कारण कि आपको देश भर में हिंदीभाषी लोग मिल जाते हैं। दक्षिणी राज्यों में जहां कभी रास्ता पूछना हो, तो अंगरेजी जरूरी हुआ करती थी, अब हिंदी से काम चल जाता है।

तो हिंदी पर सम्मेलनों की क्या जरूरत है? क्या सिर्फ इसलिए कि भारत सरकार के मंत्रियों और आला अधिकारियों को विदेश यात्रा करने का अच्छा बहाना मिलता है? मुझे तो कुछ ऐसा ही लगने लगा है। वरना हिंदी भाषा से इतना प्यार होता हमारे अधिकारियों को, तो क्यों नहीं पिछले 65 वर्षों में उन्होंने थोड़ी-सी भी कोशिश की भारतीय स्कूलों में हिंदी साहित्य को अहमियत देने की? अपने इस भारत महान के स्कूलों में बच्चों को जितनी सहजता से विदेशी लेखकों की किताबें मिलती हैं या उनका भारतीय भाषाओं में अनुवाद मिलता है, वैसा भारतीय लेखकों और कवियों के बारे में नहीं कहा जा सकता।

बावजूद इसके कि साहित्य अकादेमी को स्थापित किया गया था दशकों पहले भारतीय साहित्य को लोगों तक पहुंचाने के लिए। काम किया होता इस अकादमी ने दिल लगाकर, तो गालिब का कलाम पढ़ रहे होते तमिलनाडु के बच्चे और दिल्ली के स्कूलों में महान संत कवि तिरुवल्लुवर की कविताएं पढ़ने को मिलतीं। और तो और छोड़िए, देश के बड़े शहरों में अंगरेजी की किताबें आपको हर नुक्कड़ दुकानों पर मिलेंगी, लेकिन भारतीय भाषाओं में अगर आपको किताबें खरीदनी हों, तो आपको जाना होगा किसी तंग, पुरानी गली में किसी छोटी सी दुकान की तलाश करते हुए।

दिल्ली में जब हिंदी, उर्दू या पंजाबी की कोई किताब खरीदनी हो, तो दरियागंज जाना पड़ता है मुझे, लेकिन अंगरेजी की किताबें हर बाजार में मिलती हैं। मुंबई में मराठी किताबें मुश्किलें से मिलती हैं, कोलकाता में बांग्ला साहित्यकारों की इज्जत तो बहुत है, लेकिन उनकी किताबें इतनी आसानी से नहीं मिलतीं, जितनी आसानी से अंगरेजी लेखकों की किताबें मिलती हैं। चेन्नई में तमिल किताबों का भी यही हाल है।

कितने शर्म की बात है कि 65 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद यह हाल है। ऐसा भी नहीं है कि पढ़नेवाले कम हो गए हैं। हिंदी के कई अखबारों की प्रसार संख्या अब दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों से ज्यादा है। तो किताबें क्यों न बिकतीं, अगर उनको बेचने की किसी ने कोशिश की होती? यह सवाल जब मैंने हाल में हिंदी के एक मशहूर कवि से पूछा, तो उन्होंने कहा कि समस्या दुकानों के न होने की है। दुकानें होतीं अगर शहरों के बड़े बाजारों में, तो जरूर बिकतीं भारतीय भाषाओं में किताबें।

कहने का मतलब यह है कि जोहान्सबर्ग में हिंदी सम्मेलन करने के बदले अगर भारत सरकार को इतना प्यार है हिंदी से तो, क्यों नहीं देश के अंदर ही कुछ काम किया जाए? क्यों नहीं सरकारी दुकानें खोली जाएं हर बाजार में, जिनमें आसानी से मिल सकें भारतीय भाषाओं में किताबें? गांधी जी के नाम पर अगर हम सस्ता कपड़ा बेच सकते हैं, तो सस्ती किताबें क्यों नहीं? क्या ऐसा करने से गांधी जी की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी और भी ज्यादा?

  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

स्पॉटलाइट

PICS: पार्टी में पत्नी को छोड़ श्रद्धा कपूर को चूम बैठे मोहित सूरी, मच गई खलबली

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

लड़कियों के इस खास ऐप के बारे में नहीं जानते होंगे लड़के, यहां होती हैं ऐसी बातें

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

शाम की पूजा में भूलकर भी ना बजाएं घंटी, होते हैं अशुभ परिणाम

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

शर्लिन चोपड़ा ने खिंचवा डाली ऐसी फोटो, जमकर आए भद्दे कमेंट

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

रमजान 2017: सेहरी में खाएंगे ये 5 चीजें तो दिनभर नहीं लगेगी प्यास

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

Most Read

सामरिक आत्मनिर्भरता की ओर

Toward strategic self-reliance
  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

पत्थरबाज और मेजर गोगोई

Stone-pelter and Mejor Gogoi
  • गुरुवार, 25 मई 2017
  • +

ये तय करेंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे

Four Implications Leading Up to India’s 2019 General Election
  • सोमवार, 22 मई 2017
  • +

दूसरी पारी में चुनौती अमेरिका से भी

Challenge in second term from US too
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

विपक्षी एकता की परीक्षा

Test of Unity of Oppositions
  • मंगलवार, 23 मई 2017
  • +

नक्सलवाद: पचास साल और आगे?

Naxalism: 50 years and henceforth?
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +
Live-TV
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top