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हमारी फिल्मों में यह कैसी हिंदी है

गौतम कौल

Updated Sat, 13 Oct 2012 09:25 PM IST
gautam kaul report on decline standards of hindi in films
हाल ही में मैं निजी काम से लंदन गया था। अपने काम के संदर्भ में मैं कुछ अंगरेजों से मिला। मैंने अंगरेजी में अपनी बात रखी, उन्होंने अपनी भाषा में उनका जवाब दिया। हमारी बातचीत में लैटिन, फ्रेंच, पंजाबी, बांग्ला और उर्दू का एक शब्द नहीं था, केवल अंगरेजी के शब्द थे। उस दौरान एकाधिक अवसरों पर मैं वहां रह रहे भारतीयों से भी मिला। उनके साथ बातचीत में मुझे अंगरेजी, पंजाबी, हिंदी और उर्दू के शब्द बोलने पड़ते थे। मैंने देखा कि अंगरेजी शब्दों के इस्तेमाल के बगैर मैं हिंदी नहीं बोल सकता। मेरी उर्दू पर कुछ लोगों की टिप्पणी थी, इतनी अच्छी उर्दू बोलते हैं, आप कहां से हैं? लेकिन केवल हिंदी में बोलते हुए मुझे बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है।
इस मामले में मैं अकेला नहीं हूं। हिंदी प्रदेश में आज हम जो हिंदी बोलते हैं, पचास साल पहले उसका अस्तित्व नहीं था। आज आप किसी गांव में चले जाएं, वहां के लोगों की बातचीत में अंगरेजी के एक-दो शब्द होंगे, जबकि उन्होंने स्कूल में अंगरेजी की शिक्षा नहीं ली होगी। मातृभाषा से हमारा दुराव आज बढ़ता ही जा रहा है। शहरों में तो और भी खराब स्थिति है। मांएं अपने नवजात बच्चों के साथ अंगरेजी में बात करती हैं। वर्ष 1955 तक उत्तर भारतीय दर्शकों के लिए सिनेमा की भाषा मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी और बोली जाने वाली भाषा थी। मेरे स्नातक के कोर्स में प्रेमचंद की एक कहानी, नमक का दारोगा थी। उस दौरान मैंने प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला भी पढ़ा। आज जब मैं बारहवीं के छात्रों से प्रेमचंद के बारे में पूछता हूं, तो उनका सवाल होता है, वह कौन हैं?

इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी के माता-पिता इन सबके लिए जिम्मेदार हैं। उनको लगता है कि उनके बच्चों को जल्दी से जल्दी अंगरेजी में बोलना और लिखना सीख लेना चाहिए।
ऐसे में जब वे बच्चे हिंदी बोलते हैं, तो उसमें जाने-अनजाने अंगरेजी आ ही जाती है।
परिवारों में भी ऐसा कोई नहीं होता, जो बच्चों की इन विसंगतियों को दूर करे। रही-सही कसर टेलीविजन के कार्यक्रमों और हिंदी फिल्मों से पूरी हो जाती है। इस तरह हमारे यहां आज सिनेमा की एक ऐसी श्रेणी भी है, जिसे भारतीय अंगरेजी सिनेमा कहा जा सकता है। इंगलिश-विंगलिश को इसका ताजा उदाहरण कह सकते हैं।
पिछले साल करीब 210 हिंदी फिल्में बनीं, लेकिन उनमें से एक भी ऐसी नहीं थी, जिसकी भाषा प्रेमचंद की भाषा से मिलती-जुलती हो।

आज हिंदी फिल्मों में ऐसी-ऐसी नायिकाएं आ रही हैं, जो व्याकरण की शुद्धता के लिहाज से एक वाक्य नहीं बोल सकतीं। हमारे पास बड़े फिल्म-निर्देशकों का एक बड़ा समूह है, जो अच्छी मराठी, पंजाबी या बांग्ला बोल लेते हैं, लेकिन अच्छी हिंदी नहीं बोल सकते।

हिंदी फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले हिंदी में लिखने के बजाय रोमन हिंदी में लिखते हैं। गुलजार को छोड़कर कोई भी उर्दू में संवाद नहीं लिखता। हिंदी सिनेमा में आज करीब 240 अभिनेता-अभिनेत्रियां हैं, लेकिन इनमें अमिताभ बच्चन, ओम पुरी, हिमानी शिवपुरी, अनुपम खेर और आशुतोष राणा जैसे कुछ ही लोग हैं, जो प्रभावी हिंदी बोलते हैं। पुरानी पीढ़ी के कलाकारों में केवल मनोज कुमार, धर्मेंद्र और ओम पुरी ही हैं, जो अपनी फिल्मों में हिंदी में संवाद चाहते हैं। हिंदी फिल्मों की ऐसी बदतर स्थिति क्यों है? दरअसल एक बड़ा वर्ग मानता है कि चूंकि आज ऐसी हिंदी बोली जाती है, इसलिए फिल्मों में इसी तरह की हिंदी होनी चाहिए।

यह तर्क सरासर गलत है। हिंदी फिल्मों में जिस तरह के संवाद सुने जाते हैं, उनका प्रयोग समाज के सबसे निचले स्तर पर अशिक्षितों द्वारा होता है। और फिल्मों के स्क्रिप्ट लिखने वाले इसी भाषा को परदे पर ले आते हैं। ब्लडी फूल, इडियट और नॉनसेंस जैसी गालियां तो अब पुरानी पड़ गई हैं। आज के हिंदी सिनेमा की भाषा इतनी निकृष्ट है कि हम अपने परिवार को फिल्म दिखाने साथ नहीं ले जा सकते।

जब तक इस तरह के फूहड़ संवादों वाली फिल्में बुरी तरह नहीं पिटेंगी, तब तक हिंदी सिनेमा में भाषिक शुद्धता के लिए चलाया जाने वाला कोई भी आंदोलन सफल नहीं होगा। एक तरीका यह हो सकता है कि नई पीढ़ी को फूहड़ हिंदी लिखने वाले फिल्मकारों के खिलाफ क्रांति के लिए प्रेरित किया जाए। एक कानूनी तरीका यह भी हो सकता है कि हिंदी भाषा के नाम पर खराब भाषा वाली फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया जाए। तभी सिनेमा में शास्त्रीय हिंदी का पुराना दौर वापस लौटेगा। एक बार ऐसा हो जाए, तो फिर कोई यह सवाल नहीं करेगा कि प्रेमचंद कौन हैं।
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