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चार साल बाद वहीं के वहीं

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Mon, 26 Nov 2012 12:10 PM IST
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पाकिस्तान प्रायोजित मुंबई हमले की चौथी वर्षगांठ से ठीक पहले अजमल कसाब की फांसी ने स्वाभाविक रूप से पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं। सुखद यह है कि कसाब की फांसी को देखते हुए पाकिस्तान में भी अंगरेजी मीडिया ने अपनी सरकार से 26/11 के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की मांग की है। इन लोगों को पाकिस्तान सरकार से संरक्षण मिला हुआ है। अजमल कसाब की फांसी से मुंबई हमले के घृणित अध्याय का अंत तो हो ही गया है, चार वर्षों के इंतजार के बाद निर्दोष पीड़ित परिवारों को भी खुशी मिली है। उनमें से कई लोगों का कहना है कि वे अब आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, जबकि कुछ चाहते हैं कि शांति का संदेश तेजी से फैले।
अलबत्ता हमारी सरकार अगर समझती है कि इससे दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के उसके संकल्प का संदेश गया है, तो यह उसका भ्रम ही है। जो कहते हैं कि कसाब की फांसी को 26/11 हमले की दुखद स्मृतियों का अंत माना जा सकता है, उन्हें बताना चाहिए कि जिस तत्परता से सरकार ने कसाब को फांसी देने का फैसला किया, उससे कई सवाल खड़े होते हैं। कसाब की फांसी से अगर किसी को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है, तो वह पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान है। कोई भी उसके चेहरे पर राहत के भाव को देख सकता है, क्योंकि कसाब की फांसी आतंक के साथ उसके गठजोड़ के महत्वपूर्ण और बड़े शर्मनाक सुबूत का अंत है। कसाब पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क का एक छोटा-सा मोहरा था। विद्रूप तो यह है कि मुंबई हमले के बाद कसाब को जिंदा पकड़ने के बावजूद हम पाकिस्तान का नकाब उतारने में उसका पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाए।

इसी का नतीजा है कि मुंबई हमले के षड्यंत्रकारी पहले की ही तरह पाकिस्तान में सरकारी संरक्षण में है। लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक हाफिज सईद लगातार सार्वजनिक सभाओं में आज भी बिना किसी रोक-टोक के भारत के खिलाफ जहर उगलता है। हालांकि लश्कर का मुख्य सैन्य कमांडर जकीउर रहमान लखवी अभी जेल में है। जैसा कि डेविड हेडली एवं अन्य लोगों ने बताया, कसाब निश्चित रूप से इन लोगों को जानता था। वह मुंबई हमले के योजनाकार साजिद मीर एवं आईएसआई के मेजर समीर को भी जानता होगा, जो अब भी छुट्टा घूमते हैं। साफ है कि हम आतंकियों से संबंध के मामले में पाकिस्तान को नहीं घेर पाए, न ही कसाब से इन लोगों के बारे में वैसी जानकारी हासिल कर पाए, जो इसलामाबाद को शर्मिंदा कर सकता था और अंतरराष्ट्रीय दबाव के समक्ष खुद द्वारा पोषित आतंकियों पर कार्रवाई करने के लिए उसे बाध्य कर सकता था।

उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय मीडिया की मौजूदगी में कसाब का टेलीविजन पर एक इंटरव्यू लिया जा सकता था, जिसमें वह अपने पाकिस्तानी आकाओं की तसवीरें पहचानने के साथ यह भी बताता कि उन्होंने उससे क्या कहा था तथा पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियां कैसे संचालित होती हैं। इससे इसलामाबाद के खिलाफ नई दिल्ली का पक्ष काफी मजबूत होता। वैसे में बहुत संभव था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का विचार प्रभावी तरीके से बदलता और वह पाकिस्तान पर दबाव डालता कि नई दिल्ली द्वारा सौंपे गए मुंबई हमले से संबंधित सुबूतों के आधार पर तेजी से कार्रवाई करते हुए दोषियों को दंडित करे।

जहां तक पाकिस्तान को आतंकवाद की नीति से विरत करने का सवाल है, तो विगत के हमारे राजनयिक प्रयास विफल ही रहे हैं। हम यह सोच रहे थे कि इसके लिए अमेरिका पाकिस्तान पर दबाव डालेगा, लेकिन सचाई यह है कि महाशक्ति देश हमेशा अपने फायदे के लिए काम करता है, दूसरों के फायदे के लिए नहीं। वास्तव में यह यूपीए सरकार ही है, जो पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए उत्सुक रही है, जबकि 26/11 पर अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ-साफ कहा था कि इसमें पाक सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ पर्याप्त सुबूत मिले हैं। वस्तुतः इस तरह के हमले बिना सरकारी सहायता के संभव ही नहीं हैं।

आतंकी हमलों के प्रति हमारी पिछली कमजोर प्रतिक्रिया के आधार पर पाकिस्तानी भी जानते हैं कि भारतीय माफ करने एवं जल्दी ही भूल जाने वालों में से हैं। इसलामाबाद का यह आकलन गलत भी नहीं है। यह आतंकवाद के खिलाफ हमारी लिजलिजी मानसिकता का ही सुबूत है कि मुंबई नरसंहार का घाव ताजा होने, और पाकिस्तान द्वारा 26/11 से जुड़े अपराधियों पर शिकंजा कसने के बजाय उससे पीछे हटने के बावजूद हमारे प्रधानमंत्री ने इसलामबाद की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। विद्रूप देखिए, पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार के बजाय उससे बातचीत करते हुए यूपीए सरकार जान-बूझकर यह भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रही है कि यह 'समग्र वार्ता' नहीं है।

कसाब की सुरक्षा, उस पर मुकदमा चलाने और सजा दिलाने की पूरी प्रक्रिया में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन एक सवाल हमारे तमाम दावों को झुठला देता है कि पाकिस्तान के वकीलों को कसाब से जिरह की अनुमति क्यों नहीं दी गई। कुछ लोग तर्क देंगे कि परिस्थिजन्य साक्ष्य और कसाब द्वारा लोगों को स्वचालित राइफल से मार गिराने के फुटेज उसके खिलाफ पर्याप्त सुबूत थे। पाकिस्तान के वकीलों को, जो बेशक इसलामाबाद की ही भाषा बोल रहे थे, कसाब से बात करने और उसका बयान दर्ज करने से रोककर हमने अपना ही नुकसान किया है। कसाब की फांसी के औचित्य पर बेशक कोई सवाल नहीं उठाएगा, लेकिन यह साफ है कि हमारा देश कसाब के पकड़े जाने का पूरा फायदा उठाने में विफल रहा है।
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