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संसद में पहली बाजी कांग्रेस के नाम

अरुण नेहरू

Updated Fri, 30 Nov 2012 09:49 PM IST
first win in parliament name of congress
अभी मीडिया में मीडिया की ही खबर भरी पड़ी है। जी न्यूज नेटवर्क के दो वरिष्ठ संपादकों की गिरफ्तारी दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि किसी की भी गिरफ्तारी सुखद नहीं होती। लेकिन जी टीवी का यह कहना कि देश में आपातकाल जैसे हालात हैं, अतिरंजित लगता है। यह मामले को राजनीतिक रंग देना है।
इससे पुलिस और अदालत की कार्रवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि मैं इस पूरे मामले से असहज महसूस करता हूं, क्योंकि मीडिया में सौ बुराइयां हो सकती हैं, पर उसकी हजार अच्छाइयां भी हैं, जो पिछले दशक में दिखी भी हैं। इस मामले की सचाई हम नहीं जानते, पर इससे इनकार नहीं कि मीडिया में एक प्रभावी आत्म नियंत्रण की जरूरत है।

अगर स्टिंग ऑपरेशन और तत्काल फैसला ही मीडिया के काम करने का मानक बन जाएगा, तो शायद ही किसी राजनेता या व्यवसायी के मन में इसके प्रति सहानुभूति बचेगी। अब तक मीडिया के लोग दूसरों का स्टिंग ऑपरेशन करते थे, पर अब उनकी अपनी बारी है! इस प्रसंग में हमने अब तक जो देखा है, उसका प्रेस की स्वतंत्रता, मानवाधिकार या किसी नैतिक मूल्य से कोई लेना-देना नहीं है। पांच या छह घंटे के टेप सारी कहानी खुद बयां कर देंगे। वैसे टेलीफोन रिकॉर्ड्स के कारण आज कुछ भी छिपा नहीं रहता।

प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष ने कुछ बड़े मुद्दे उठाए हैं, लेकिन मुझे संदेह है कि उस पर कोई ध्यान भी देगा। राजनीति, कॉरपोरेट हित और मीडिया एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं और ताजा विवाद में भी ये तीनों शामिल हो सकते हैं। केंद्र में राजनीतिक संघर्ष जारी है। एफडीआई के मुद्दे पर लड़ाई केवल इस मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कुछ भावी राजनीतिक रुझानों का भी संकेत कर रही है।

ज्यादातर पार्टियां समय से पहले लोकसभा चुनाव के पक्ष में नहीं हैं। तृणमूल कांग्रेस का अविश्वास प्रस्ताव पेश होने से पहले ही खारिज हो गया, तो एफडीआई के मुद्दे पर द्रमुक, सपा और बसपा को अपने पाले में लाने की कांग्रेस की कोशिश कामयाब रही। लोकसभा चुनाव के बारे में अनुमान लगाना जोखिम भरा है, लेकिन क्षेत्रीय दलों के मौजूदा राजनीतिक रुझान से साफ है कि चुनाव समय से पहले नहीं होंगे।

संसद में यूपीए एवं कांग्रेस ने बेहतर तालमेल दिखाते हुए भाजपा की डावांडोल स्थिति का पूरा फायदा उठाया है, क्योंकि उसके अध्यक्ष के हठ की वजह से विवाद पैदा हो गया है। हालांकि भाजपा के करीबी सूत्र राम जेठमलानी के निलंबन से होनेवाले नुकसान से इनकार करते हैं, लेकिन सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के मसले पर भी राजग का अंतर्विरोध सामने आ गया है।

यह तब तक जारी रहेगा, जब तक भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का मसला सुलझ नहीं जाता। जब शीर्ष स्तर पर कई सत्ता केंद्र काम कर रहे हों, तो विवादों का निपटारा आसान नहीं होता। ऐसे में गुजरात के चुनाव परिणाम को देखना जरूरी होगा। वहां नरेंद्र मोदी की भारी जीत ही भाजपा और भाजपा के विवादों को कमोबेश सुलझा पाएगी।

हमारे पास वोट एक ही है, लेकिन आकांक्षाओं की सूची लंबी है। भविष्य के बारे में मैं यही सोचता हूं कि हमारी सत्ता व्यवस्था स्थिर हो। लेकिन अगर हम लगातार ऐसे मुश्किल गठबंधन ढांचे में बंटते चले जाएं, जिसमें 'संख्याबल' अस्थिरता बढ़ाने का काम करे, तो स्थिरता भला कैसे संभव है! हो सकता कि मेरे अनुमान गलत हों, पर क्या 140 सीटों के साथ कांग्रेस या 130 सीटों के साथ भाजपा और 260 से 270 सीटों के साथ क्षेत्रीय दल, जिसमें 40 अलग-अलग उद्देश्यों वाली पार्टियां शामिल हैं और जिसके छह नेता प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं, स्थिर सरकार दे सकती है।

पिछले तीन महीनों में मैंने देखा है कि अस्थिरता के वायरस ने क्षेत्रीय दलों को शिकार बनाया है। धर्म और जाति के आधार पर हमने कई छोटी-छोटी पार्टियां के गठन में तेजी देखी है। क्या यह प्रवृत्ति केंद्र में स्थिर सरकार के गठन में मदद कर पाएगी? हम हर मुद्दे पर न तो असंतोष जता सकते हैं और न ही बहस कर सकते हैं।

खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिस पर हमें इस तरह उग्र होना चाहिए, बल्कि यह वैश्विक निवेशकों का भरोसा जीतने का उपाय ज्यादा है। यह अजीब ही है कि एक मुश्किल एवं अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल में हम एक ऐसे मुद्दे पर अपना वक्त जाया कर रहे हैं, जिसका कोई मतलब ही नहीं है। खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अपनाने के लिए कोई किसी को मजबूर नहीं कर रहा है, क्योंकि इस मामले में राज्य अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करेंगे।

मुझे लगता है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस एवं भाजपा, दोनों को एक-दूसरे के साथ जीना सीखना होगा। यदि मौजूदा शीत सत्र में आर्थिक सुधार के महत्वपूर्ण मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के बीच आपसी समझदारी दिखे, तो यह खुशी की बात होगी। आर्थिक सुधार के हर कदम को कोसने वाले वाम दलों को सोचना चाहिए कि एक दशक से भी कम समय में वे 60 से भी अधिक सीटों से 20 सीटों के आसपास सिमट गए हैं।

यह अलग बात है कि तृणमूल कांग्रेस के चलते उनके फिर 30 सीटों तक पहुंचने के कुछ संकेत दिखाई देते हैं। ऐसे में यह उम्मीद है कि वे हर मुद्दे पर झगड़ेंगे नहीं। बल्कि ज्यादातर मुद्दों पर कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों को सर्वसम्मत फॉरमूले पर पहुंचना होगा।
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