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गुरबत से उबर जाएंगे किसान

तवलीन सिंह

Updated Sat, 08 Dec 2012 10:10 PM IST
farmers will overcome
एफडीआई पर लोकसभा में मैंने शुरू से अंत तक बहस सुनी और सुनने के बाद एक गहरी मायूसी छा गई दिल-ओ-दिमाग पर। वह इसलिए कि इस देश के सबसे गरीब लोग हैं हमारे किसान, और लोकसभा में बहस सुनने के बाद ऐसा लगा कि जनता के प्रतिनिधि उन गरीब किसानों की सही नुमाइंदगी नहीं कर रहे हैं संसद में। सुषमा स्वराज ने ठीक कहा कि एफडीआई के पक्ष में इतने थोड़े राजनीतिक दल खड़े हैं कि सरकार जीतकर भी बाजी हार गई है। अगर साथ-साथ यह भी कह दिया होता उन्होंने कि एफडीआई के विरोध से सबसे बड़ी हार हुई है भारत के गरीब किसानों की, तो उनकी बात का ज्यादा महत्व होता।
सुषमा जी ने अपनी जिंदगी शहरों में गुजारी है, तो शायद वाकिफ नहीं हैं इस देश के गरीब किसानों की समस्याओं से। शायद देखा नहीं होगा उनका हाल जब मंडियों में पहुंचते हैं वे अपना अनाज और अपनी सब्जियां बेचने, और कुचले जाते हैं आढ़तियों के पांव तले, क्योंकि आढ़तिया होते हैं इन मंडियों के बादशाह। लोकसभा में बहस के दौरान किसी सांसद ने आढ़तियों के बारे में कहा कि वे गरीब किसानों के एटीएम का काम करते हैं।

यानी जैसे एटीएम का बटन दबाने पर पैसे मिलते हैं, वैसे ही आढ़तियों से पैसे मिलते हैं जरूरतमंद किसानों को। लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि आढ़तिये जब किसानों से पैसा वसूलते हैं, तो ब्याज कितना लेते हैं और किस तरह उनके आर्थिक चक्रव्यूह में जीवन भर फंसे रहते हैं गरीब किसान। सो अगर उन किसानों के लिए नई मंडियां खुल जाती हैं और अगर उनके लिए नए अवसर पैदा हो जाते हैं कृषि क्षेत्र में, तो इसमें बुरा  क्या है?

किसानों की कठिनाइयों को मैंने करीब से देखा है, क्योंकि मेरा सगा भाई किसान है। बेशक गरीब नहीं है मेरा भाई, बेशक देश के गरीब किसानों के मुकाबले में वह अमीर दिखता हो, लेकिन यकीन कीजिए कि उसका सारा जीवन गुजरा है गुरबत के कगार पर। एक फसल बरबाद हो जाए, तो उसको भी जाकर हाथ फैलाने पड़ते हैं आढ़तियों के आगे।

एक अमीर किसान का अगर यह हाल है, तो आप खुद सोचिए कि क्या हाल होता होगा उन किसानों का, जिनकी खेती निर्भर रहती है बरसातों पर? मैंने अपने भाई से जब एफडीआई के बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया इन शब्दों में, 'किसान की नजर से अगर इसको देखा जाए, तो एफडीआई में एक भी बुरी चीज नहीं दिखती है। न सिर्फ नई मंडियां खुलेंगी उसके लिए, साथ-साथ आएगी नई कृषि तकनीकों की जानकारी भी, और बन जाएंगे वे कोल्ड स्टोरेज, जिनके न होने से बरबाद हो जाती हैं इतनी सारी सब्जियां, इतने सारे फल।'

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 35 से 40 फीसदी सब्जियों और फलों का नाश हो जाता है इन ठंडे गोदामों के न होने से। तो सवाल यह है कि अगर ये इतने ही जरूरी हैं, तो बन क्यों नहीं गए अभी तक? राज्य सरकारों ने क्यों नहीं बनाए कोल्ड स्टोरेज? रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों ने क्यों नहीं बनाया इनको, जब उन्होंने देहातों में अपने बड़े कृषि बाजार खोले? शायद इसलिए कि इतना पैसा था ही नहीं सरकारों के पास निवेश करने के लिए।

शायद इसलिए कि खुदरा क्षेत्र में संगठित व्यापार न होने से निवेश भी कम हुआ। कारण जो भी हो, एक बात तो स्पष्ट है, और वह यह कि देश के कृषि क्षेत्र में निवेशकों की सख्त जरूरत है और उनके आने से इस देश के सबसे गरीब लोगों के अति कठिन जीवन में शायद आएगी नई उम्मीद।

आर्थिक सुधारों के शुरू होने के बाद देश के शहरी नागरिकों के जीवन में परिवर्तन साफ दिखता है। महानगर में शायद ही कोई नागरिक होगा, जिसके पास सेलफोन न हो। कच्ची बस्तियों और झोपड़ियों में भी आजकल आ चुका है रंगीन टेलीविजन। इन दोनों चीजों के साथ-साथ आई है आधुनिकता, नई सोच और इक्कीसवीं सदी के अन्य असर। रोजगार के अवसर भी बढ़ गए हैं शहरी भारत में।

देहातों में परिवर्तन आया है, लेकिन इतना नहीं, जितना आ सकता है, और इसका मुख्य कारण यह है कि किसानों की जेब में पैसा बहुत थोड़ा है। एक फसल बरबाद हो जाए, तो कंगाली, एक साल बरसात ने धोखा दे दिया, तो बरबादी। लेकिन जब तक किसानों में आत्महत्याओं का कोई दर्द भरा दौर नहीं शुरू होता है, तब तक लगता है कि उनकी आवाज नहीं पहुंचती है संसद तक। फिर पहुंच जाते हैं राहुल गांधी विधवाओं के पास अफसोस जताने, फिर होने लगती है वामपंथी राजनीतिज्ञों की धुआंधार तकरीरें संसद में, फिर थोड़े दिनों बाद हम सब भूल जाते हैं किसानों की समस्याओं को।

शायद विदेशी निवेशकों के आने से वह परिवर्तन आ जाएगा, जिसकी उम्मीद करते हैं इस देश के किसान। शायद नहीं भी आए, लेकिन एक बात तो पक्की है, और वह यह कि इस देश के किसानों का कोई नुकसान नहीं करेगी एफडीआई।


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