आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

किसान सड़कों पर न उतरें तो फिर क्या करें

हरवीर सिंह

Updated Mon, 19 Nov 2012 02:50 PM IST
farmers on the road
दिवाली के ठीक पहले पुलिस फायरिंग में दो गन्ना किसान इसलिए मारे गए, क्योंकि वे अपनी फसल की बेहतर कीमत मांग रहे थे। यह घटना उस महाराष्ट्र में हुई, जहां चीनी उद्योग पर सहकारिता का आधिपत्य है और आम धारणा है कि वहां किसान ही मिलों के मालिक और मिल की कमाई में हिस्सेदार हैं।
बात काफी हद तक ठीक है, लेकिन यह घटना दर्शाती है कि किसानों का मालिकाना हक वाला विश्वास दरक रहा है। इसीलिए वहां अब गन्ने के दाम के लिए उत्तर प्रदेश की तरह आंदोलन होने लगे हैं। बाकी फसलों के लिए भी अब उसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं मिल रहा। लेकिन यहां अभी किसान लुट रहा है और आवाज नहीं उठा पा रहा।

कमजोर बारिश के बावजूद उत्तरी राज्यों में धान की बेहतर पैदावार हुई है। सरकार ने ग्रेड ए धान के लिए 1,280 और कॉमन वैराइटी के लिए 1,250 रुपये प्रति क्विंटल का दाम तय किया है। लेकिन उत्तर प्रदेश और हरियाणा के काफी बड़े हिस्से में किसान आढ़तियों को 1,000 रुपये से 1,050 रुपये प्रति क्विंटल के बीच धान बेच रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य से करीब 20 फीसदी कम कीमत पर बेचे जा रहे इस धान से निकलने वाले चावल को केंद्र सरकार का भारतीय खाद्य निगम राइस मिलर से ऊंची कीमत पर खरीदेगा।

सरकारी एजेंसियां किसानों से धान में नमी का बहाना बनाकर उनको आढ़तियों के पास भेज रही हैं। यही नहीं, जब खरीफ की दूसरी बड़ी नकदी फसल कपास के दाम समर्थन मूल्य से नीचे आ गए, तो उसके बाद सरकार ने कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को इसे खरीदने के आदेश दिए और खरीद का लक्ष्य तय किया। जब सरकार ने यह कदम उठाया, तब तक हरियाणा, पंजाब और उनसे लगते राजस्थान के इलाकों में अधिकांश कपास आढ़तियों के पास पहुंच चुकी थी। बात केवल कृषि उत्पादों की नहीं है, दूध उत्पादक भी इसका खामियाजा भुगत रहे हैं। निजी क्षेत्र की तमाम कंपनियां इस समय किसानों से 24 से 26 रुपये लीटर की कीमत पर दूध खरीद रही हैं, जिसे उपभोक्ताओं को 40 रुपये लीटर पर बेचा जा रहा है।

पिछले सीजन के स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) के एक लाख टन से ज्यादा के स्टॉक के चलते इस साल सर्दी के फ्लश सीजन में देश के कई हिस्सों में दूध उत्पादकों की हालत और खराब होने वाली है। नियम के मुताबिक रबी सीजन की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बुवाई के पहले तय हो जाना चाहिए, ताकि किसान अपनी कमाई को ध्यान में रखकर फैसला ले सके।

लेकिन इस सीजन की सबसे अहम फसल गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य खाद्य और कृषि मंत्री के विवाद में फंसा हुआ है, जबकि किसानों के लिए बेहतर दाम का जिम्मा निभाने वाला कृषि लागत एवं मूल्य आयोग गेहूं के एमएसपी को फ्रीज करने की सिफारिश दे चुका है।

दूसरी ओर, इस साल देश में सबसे अधिक चीनी उत्पादन का खिताब हासिल करने की ओर बढ़ रहे उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार ने अभी तक गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय ही नहीं किया है, जबकि तकनीकी रूप से पेराई सीजन शुरू हुए डेढ़ महीना बीत चुका है।

इन हालात में अगर किसान सड़क  पर नहीं उतरेगा, तो क्या करेगा! हाल ही में उत्तर प्रदेश के किसान संगठन राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह के साथ पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने गन्ना किसानों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और कहा कि अगर प्रधानमंत्री हमारी मांगें नहीं मानते, तो चार दिसंबर को किसान संसद का घेराव करेंगे।

इसके बाद तमाम चैनलों पर इस बार में चर्चा हुई कि पूर्व जनरल के घेराव में शामिल होने का फैसला सही है या गलत, लेकिन गन्ना किसानों का मुद्दा इन चर्चाओं में गायब रहा। महाराष्ट्र की घटना अचानक नहीं हुई। इस महीने की शुरुआत से ही 300 रुपये प्रति क्विंटल की पहली किस्त के लिए स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के नेता और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी यह आंदोलन चला रहे थे।

घटना के पांच दिन पहले से वह राज्य के सहकारी मंत्री के नेतृत्व में चलने वाली चीनी मिल पर धरना दे रहे थे। लेकिन बातचीत के बजाय सुबह पांच बजे उनको गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके चलते महाराष्ट्र के पश्चिमी जिलों में किसान भड़क गए। यह संदर्भ सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है, क्योंकि उसके पास किसानों को बेहतर दाम देने की कोई साफ नीति नहीं दिख रही।

गेहूं के दाम इसलिए नहीं बढ़ाए जा रहे हैं, क्योंकि इससे खाद्य सबसिडी बढ़ेगी और उसका प्रतिकूल असर राजकोषीय घाटे पर पड़ेगा। लेकिन केंद्रीय पूल में मौजूद करीब 800 लाख टन के खाद्यान्न भंडार का एक बड़ा हिस्सा बेहतर कीमतों पर निर्यात करने का मौका सरकार के पास था।

तब सबसिडी में बचत के साथ भंडारण की समस्या को कम करने में मदद मिलती, लेकिन उस समय सरकार ने निर्यात पर रोक लगाए रखी, क्योंकि उसे चुनाव जीतने में मददगार साबित होने वाले प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लिए अधिक खाद्यान्न की जरूरत है। सरकार के इस गलत प्रबंधन और फैसलों का नतीजा है कि किसान लुटने को मजबूर है, और अगर आंदोलन करता है, तो उसे पुलिस की गोली मिल रही है।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

harvir

स्पॉटलाइट

PICS: पार्टी में पत्नी को छोड़ श्रद्धा कपूर को चूम बैठे मोहित सूरी, मच गई खलबली

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

लड़कियों के इस खास ऐप के बारे में नहीं जानते होंगे लड़के, यहां होती हैं ऐसी बातें

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

शाम की पूजा में भूलकर भी ना बजाएं घंटी, होते हैं अशुभ परिणाम

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

शर्लिन चोपड़ा ने खिंचवा डाली ऐसी फोटो, जमकर आए भद्दे कमेंट

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

रमजान 2017: सेहरी में खाएंगे ये 5 चीजें तो दिनभर नहीं लगेगी प्यास

  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

Most Read

सामरिक आत्मनिर्भरता की ओर

Toward strategic self-reliance
  • शनिवार, 27 मई 2017
  • +

पत्थरबाज और मेजर गोगोई

Stone-pelter and Mejor Gogoi
  • गुरुवार, 25 मई 2017
  • +

ये तय करेंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे

Four Implications Leading Up to India’s 2019 General Election
  • सोमवार, 22 मई 2017
  • +

दूसरी पारी में चुनौती अमेरिका से भी

Challenge in second term from US too
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

विपक्षी एकता की परीक्षा

Test of Unity of Oppositions
  • मंगलवार, 23 मई 2017
  • +

नक्सलवाद: पचास साल और आगे?

Naxalism: 50 years and henceforth?
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +
Live-TV
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top