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रोमां‌टिक सिनेमा की विदाई

गौतम कौल

Updated Mon, 19 Nov 2012 03:51 PM IST
farewell of romantic cinema
वर्ष 2012 की विदाई के करीब डेढ़ महीने बचे हैं। इस साल का लेखा-जोखा करने का वक्त आ गया है। यह साल फिल्म व्यापार के लिहाज से स्वर्णिम वर्ष रहा। आने वाले 20 वर्षों तक हम कहेंगे कि फीचर फिल्मों का सौवां साल सौ करोड़ी साल भी था। यह बात केवल हिंदी फिल्मों के लिए ही लागू नहीं होती, कुछ तमिल और तेलुगू फिल्मों ने भी काफी कमाई की है। लेकिन हम केवल हिंदी सिनेमा की ही बात करेंगे।
यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि व्यतीत होता यह वर्ष कम बुद्धिमत्ता वाली फिल्में बनाने के मामले में भी उल्लेखनीय साबित हुआ। परदे पर फिल्म शुरू होने से पहले दिखाए जाने वाले एक अनिवार्य संदेश में अब बताया जाता है कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस संदेश को थोड़ा और बढ़ाकर इसमें यह जोड़ा जा सकता है कि कृपया अपना दिमाग सिनेमा हॉल से बाहर रखकर आएं।

थ्री इडिएट्स जैसी कुछ फिल्मों को छोड़ दिया जाए, तो ये सौ करोड़ी फिल्में वास्तव में ऐसी ही होती हैं, जिनके लिए अपना दिमाग हॉल के बाहर रख आना ही बेहतर है। सिनेमा के अनेक क्षेत्रों में अब व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय सिनेमा ने नए क्षेत्रों, विशेषकर लैटिन और मध्य अमेरिका में अपना विस्तार किया है। परंपरागत विदेशी बाजार में भी इसने अपनी पैठ और मजबूत की है। यह पहली बार है, जब एक प्रवासी भारतीय फिल्म कंपनी इरोज इंटरनेशनल ने सबसे अच्छा कारोबार किया है।

अपने कमजोर प्रदर्शन के साथ यशराज फिल्म दूसरे स्थान पर है। फिल्म थ्री इडियट्स द्वारा दुनिया भर में की गई कमाई इस बात का संकेत है कि कुछ बेहतर चीजें आनी बाकी हैं। चीन में इस फिल्म ने किसी भी भारतीय फिल्म के लिए कारोबार का नया रिकॉर्ड कायम कर दिया है। अभी तक वहां की मौजूदा पीढ़ी भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी की ताकत से खौफजदा रहती थी। अब भारतीय फिल्में भी चीनी दिमाग पर कब्जा जमा सकती हैं।

हिंदी सिनेमा ने यूरोप और अमेरिका के पूर्वी समुद्रतटीय युवाओं के बीच बेहतर छवि बनाई है। इस छवि का श्रेय कत्थक और भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य से लेकर नई पीढ़ी के उस नृत्य को जाता है, जिसे बॉलीवुड नृत्य कहते हैं। स्वीडन, चेक रिपब्लिक, स्विट्जरलैंड जैसे देशों और मास्को, बीजिंग, न्यूयॉर्क, लंदन और पेरिस जैसे शहरों में नृत्य की नई कक्षाएं खुली हैं, जहां बॉलीवुड जैसे नृत्य सिखाए जाते हैं।
 
लेकिन कामयाबी और विस्तार की इस कहानी का निराशाजनक पहलू यह है कि रचनात्मक संगीत के मामले में हिंदी सिनेमा का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है। एआर रहमान की गैरमौजूदगी लगभग बरकरार है, और उन्होंने जो संगीत दिया, वह भी कोई छाप नहीं छोड़ पाया। सिनेमा के लिए आधारभूत सुविधाओं के विकास की दिशा में भी इस दौरान कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

सिनेमा हॉल सिकुड़ रहे हैं, जबकि कुछ राज्यों में सरकारी अदूरदर्शिता के कारण सिंगल स्क्रीन सिनेमा का भविष्य खतरे में है। इसी तरह मल्टीप्लेक्स संपत्ति कर पर छूट के बदले टिकट की कीमत कम रखने का वायदा पूरा नहीं कर रहे। नतीजतन किसी भी मल्टीप्लेक्स में कोई फिल्म तीन हफ्ते से ज्यादा नहीं चलती, जो अच्छी बात नहीं।
कुछ क्षेत्रों में जश्न की वाजिब वजहें हैं। मसलन, कृष्ण और कंस तथा डेल्ही सफारी जैसी फिल्मों की शानदार सफलता के साथ हमारा फिल्म उद्योग एनिमेशन फिल्म के युग में प्रवेश कर गया है, यह अलग बात है कि इनकी चमक बहुत दूर तक नहीं बिखरी। लेकिन इस तरह की दो फिल्में अगर ऑस्कर की दौड़ में हैं, तो यह कम बड़ी बात नहीं।

सुपरसिनेमा की चमक और बढ़ी है। पर मौलिक लेखन का अभाव स्पष्ट तौर पर सामने आया है। नई प्रतिभाओं की खोज में भी हम नाकाम रहे हैं। इस साल परदे पर दिखने वाली ज्यादातर प्रतिभाएं पिछले साल खोजी गईं, जिन्होंने फिल्मोद्योग में अपनी जगह मजबूत ही की। हां, विकी डोनर जैसी फिल्मों का हिट होना जरूर आश्चर्यजनक है। सलमान खान ने अपनी मांसपेशियां दिखाकर फिल्म इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया है। जबकि अनुपम खेर और नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं की फिल्मों का कारोबार 50 लाख का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाता। इसके बावजूद अनुपम खेर के लिए यह खबर अहम है कि वह एशियाई फिल्मोद्योग के शीर्ष पांच कलाकारों में शुमार किए गए हैं।

कॉरपोरेट वर्ल्ड जैसी फिल्मों के निर्माण के अच्छे और बुरे दोनों पक्ष हैं। बुरा पक्ष यह है कि भारतीय फिल्म उद्योग पर अधिग्रहण के लिए अमेरिकी फिल्म कारोबार इसे एक अच्छे बाजार के रूप में देख रहा है। हिंदी और तेलुगू सिनेमा के कुछ बड़े कारोबारियों को हॉलीवुड से धन मुहैया कराया जा रहा है और फिल्म कारोबार का मालिकाना हक हासिल करने के लिए सूटकेस भरकर रकम लाने वाले एजेंटों की उड़ान बढ़ रही है। इस तरह मनोरंजन में स्थानीय लोगों और संस्कृति को किनारे धकेला जा रहा है।

इसका नतीजा भी दिख रहा है। रोमांस वाली परंपरागत फिल्में गायब हो रही हैं। इसकी जगह ऐसी फिल्में ले रही हैं, जो डरावनी और हिंसक हैं। इसके अलावा इनमें धूम्रपान,  सड़कों पर वाहनों की दौड़ और महिलाओं से मारपीट जैसे दृश्यों की भरमार है। गुलजार और जावेद अख्तर इस साल बेरोजगार रहे। अनुराग कश्यप ने गलियों में खून बहाया, तो राम गोपाल वर्मा की भी खास अच्छी स्थिति नहीं रही।

इसी तरह बीआर इशारा, यश चोपड़ा, देव आनंद, राजेश खन्ना सहित तीन दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों ने इस साल हमें अलविदा कह दिया। भारतीय फिल्मोद्योग के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि हम फिल्म निर्माण में ज्यादा खर्चीले और खतरनाक परियोजनाओं पर काम करने के लिए तैयार हो रहे हैं। ऐसी दो फिल्मों का पटाखा भी बॉक्स ऑफिस पर फूट गया, तो फिल्म उद्योग घुटनों पर आ जाएगा। हम विश्वव्यापी मंदी को दोष देंगे और कहेंगे कि इस तरह की फिल्में हमारे दर्शकों के लिए नहीं हैं।

हां, एक बात और। अपनी फिल्म सन ऑफ सरदार और यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म जब तक है जान की रिलीज की तारीख को लेकर हुए विवाद में अजय देवगन अदालत में पहुंच गए। फिल्म उद्योग के अंदर यह एक अप्रत्याशित कदम है, जिसका असर आने वाले वक्त में भी दिखेगा।
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