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फलस्तीन को क्या मिला

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Ashok Kumar

Updated Mon, 03 Dec 2012 07:59 AM IST
falastin did what get
फलस्तीन को लंबी प्रतीक्षा और अनवरत रक्त रंजित संघर्ष के बाद संयुक्त राष्ट्र ने ‘पर्यवेक्षक’ के रूप में सदस्यता ‘प्रदान’ की है। यह फैसला अमेरिका तथा कनाडा के विरोध के बावजूद लिया गया है, और इसीलिए इसे महत्वपूर्ण राजनयिक मील का पत्थर माना जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से गाजा पट्टी के पश्चिमी तट वाले भूभाग में इस्राइल तथा फलस्तीन के बीच भयंकर जंग छिड़ी थी।
हमास के लोग इस्राइल के प्रमुख शहरों को निशाना बनाकर रॉकेट दाग रहे थे और उन्हें जवाब देने के लिए इस्राइल की नेतेन्याहू सरकार निहत्थे फलस्तीनियों को लहूलुहान करती जा रही थी। फिलहाल बड़ी मुश्किल से अस्थायी ही सही, युद्धविराम लागू करवाया जा सका है, और इसी कारण यह तर्क रखना संभव हुआ कि संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के बाद फलस्तीनियों का आचरण अनुशासित-संयत होने लगेगा और इस्राइली प्रतिक्रिया भी अहिंसक होगी।

लेकिन इस आशावादिता का क्या कोई वास्तविक आधार है? अव्वल तो यही कि फलस्तीन सरकार को पूरी सदस्यता नहीं मिली है, जो उसका अधिकार है। यह भी याद रखना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र इस वैमनस्य को खत्म करने में विफल रहा है। सुरक्षा परिषद में अमेरिकी वीटो हो या आम सभा में अमेरिकी प्रभाव-दवाब में मतदान, उसके प्रस्ताव निरर्थक ही रहे हैं। यह सोचना बेमानी है कि फलस्तीनियों की यह ‘विजय’ है, क्योंकि इस्राइल इसको एकतरफा सैनिक हमले के फैसले से पलक झपकते पराजय में बदलने की क्षमता रखता है। यहां अमेरिका की उस यहूदी लॉबी का तो जिक्र ही नहीं किया जा रहा, जो महाशक्ति की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस प्रभावशाली तबके की उपेक्षा का जोखिम कोई भी राष्ट्रपति नहीं उठा सकता। 9/11 के बाद से आतंकवाद के खिलाफ जिस तरह का माहौल बना है, उसने भी फलस्तीनियों के समर्थक देशों को क्रमशः निष्क्रिय-लाचार बनाया है। इसका लाभ इस्राइल को हुआ है। फिर फलस्तीन की जो हिंसक युवा पीढ़ी इस्राइल को निशाना बनाने में लगी है, संयुक्त राष्ट्र की मान्यता से उसकी खूंखार कबाइली मानसिकता में भी कोई फर्क आने वाला नहीं।

हां, अगर कुछ फर्क पडेगा, तो वह आगामी चुनाव के बाद इस्राइली राजनीति में दिशा परिवर्तन के साथ ही संभव होगा।
उल्लेखनीय है कि इस्राइल की नई पीढ़ी अपने पुरखों से बहुत भिन्न है। वह लगातार मोरचेबंदी की थकान महसूस करती है और अब ‘शांति का लाभांश’ भुनाना चाहती है। बेशुमार प्रतिभा और तकनीकी प्रगति के बाद भी आम इस्राइली नागरिक अपने को घर-दफ्तर-बाजार में निरापद नहीं समझता। कुछ वर्षों से वहां इतिहास की पुस्तकों में संशोधन का काम चल रहा है। इस नए इतिहास बोध में फलस्तीनी अब राक्षस जैसे शत्रु नहीं, बल्कि ऐतिहासिक घटनाक्रम के आगे बेबस, निरीह शिकार-सहानुभूति के पात्र शरणार्थी के रूप में भी देखे जाने लगे हैं। भले ही राजनेताओं का सोच बदलते देर लगेगी, पर उम्मीद है कि मुठभेड़ की नीति के तर्क को लंबे समय तक राष्ट्रहित की रक्षा का एकमात्र विकल्प नहीं बताया जा सकेगा। इस दिशा में बहस शुरू हो चुकी है, और पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक जैसे लोग मौजूदा इस्राइल सरकार के आलोचक होने के बाद भी इस भूभाग में इस्राइल तथा फलस्तीन के शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के समर्थक हैं।

करीब दो साल से पूरा अरब जगत भयंकर झंझावात की चपेट में है। निरंकुश, कुनबापरस्त तानाशाही के खिलाफ जनाक्रोश का विस्फोट मिस्र, लीबिया, सूडान, सोमालिया, यमन आदि देशों में देखने को मिलता रहा है। इस ‘जनतांत्रिक ज्वार’ से मोरक्को और जॉर्डन भी अछूते नहीं रहे हैं। यह कहना ठीक नहीं कि इस सारी उथल-पुथल के पीछे अमेरिका या पश्चिमी यूरोप का हाथ है और वे अपनी अनुकूल सत्ता व्यवस्था के लिए ऐसा कर रहे हैं। दरअसल अधिकांश अरब राज्य आंतरिक अस्थिरता से परेशान हैं और अपने जरूरतमंद फलस्तीनी भाइयों के कष्ट निवारण में पहले जैसी दिलचस्पी दिखाने में असमर्थ रहे हैं। यह तथ्य इस्राइल तथा फलस्तीनी अधिकारियों के बीच तनाव घटाने में सहायक हो सकता था, यदि इस्राइल इस मौके का लाभ उठाने की कुचेष्टा न करता। आशंका यही है कि फलस्तीनियों को असहाय आंककर वह घातक वार कर इस पुरानी बीमारी को जड़ से मिटाने की कोशिश कर सकता है।  

सबसे बडी परेशानी भारत की है। एक जमाना था, जब यासिर अराफात इंदिरा गांधी के मुंहबोले भाई माने जाते थे और धर्मनिरपेक्ष समाजवादी झुकाव वाला भारत फलस्तीनियों को खुले हाथ समर्थन देता था। तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है और भारत भी बदला है। कभी राजनयिक दृष्टि से अस्पृश्य समझा जाने वाला इस्राइल आज भारत का महत्वपूर्ण सामरिक साझेदार है। जटिल टेक्नोलॉजी वाले सैनिक उपकरण हों या आतंकवाद के विरुद्ध दुर्लभ संवेदनशील खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान, उस देश के साथ हमारे संबंध निरंतर घनिष्ठ होते जा रहे हैं। कभी फलस्तीनियों को समर्थन देना भारतीय चुनावों के संदर्भ में भी अहम समझा जाता था, लेकिन आज अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के नए तरीके ईजाद किए जा चुके हैं, जिस कारण फलस्तीन का सवाल गौण हो गया है।

भारत के लिए बिना कोई जोखिम उठाए संयुक्त राष्ट्र के इस फैसले का स्वागत करना आसान है, पर इससे गुत्थी सुलझने वाली नहीं। जब तक बेघर-अनाथ फलस्तीनी सड़कों पर बेरोजगार भटकने को मजबूर रहेंगे, तब तक उनके जायज गुस्से को खतरनाक हिंसा के लावे में बदलने से कोई रोक नहीं सकता। धर्म के आधार पर औपनिवेशिक हितों की रक्षा के लिए निर्मित कृत्रिम ‘राष्ट्र राज्य’ इस्राइल के नागरिकों की तुलना इन राज्य विहीन वंचितों-उत्पीड़ितों से आज भी नहीं की जा सकती।
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