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दीवार में तबदील होता चेहरा

सुधीर विद्यार्थी

Updated Tue, 27 Nov 2012 08:52 PM IST
face would transform it into wall
साधो, मेरे मकान की दीवार पर हर रोज नए इश्तहार आकर चस्पां हो जाते हैं। देखकर मैं परेशान-हैरान हूं। मैंने बहुत ताक-झांक की कि इश्तहार लगाने वाले को रंगे हाथ पकड़ लूं, पर कम्बख्त हैं कि हाथ ही नहीं आते। दरवाजे पर खट होते ही मैं बाहर को दौड़ता हूं, तो हर बार मुझे एक नया इश्तहार चिपका मिलता है, पर उसे लगाने वाला नदारद।
कल दीवार पर जो इश्तहार चिपका हुआ था, वह मर्दाना कमजोरी दूर करने का था। कभी चुनाव के इश्तहार, तो कभी सभाओं-रैलियों के। कभी-कभी तो इतना गुस्सा आता है कि लगाने वाले को कह दूं कि तुम सब मेरे चेहरे पर ही इश्तहार टांग दो, ताकि गली और सड़कों पर घूम-घूमकर तुम्हारा प्रचार कर सकूं।

पर अब तो मुझे अपनी जिंदगी भी चलता-फिरता इश्तहार लगने लगी है, जिस पर लिखी इबारत बताती है कि यह दुनिया अब रहने लायक नहीं रह गई है। लेकिन मेरे चेहरे पर लगे इस इश्तहार को क्या कोई पढ़ पाएगा, जो समय की बरसातों में बदरंग पड़ने लगा है? इश्तहारों पर बहुत कम लोग गौर करते हैं। कौन जानता है कि बहुत दिनों से मैं आदमकद होने की कोशिशों में लगा हूं। पर हर बार मैं अपनी कोशिश में विफल हो जाता हूं। बाजार के इस जंजाल और निपट पूंजी के दुर्दांत समय में आदमकद होना कठिन है।

मैंने अपने दीवारनुमा चेहरे पर लिखा कि मैं ईमानदारी से जिंदगी बिताना चाहता हूं। पर लोग इसे पढ़कर हंसे और मेरी तरफ थूककर चल दिए। तब से लगता है कि मेरा चेहरा एक निहायत गंदे थूकदान में तबदील हो गया है। फिर मैंने अपने चेहरे पर ऐसा इश्तहार चिपकाया, जिस पर लिखा था कि मैं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आजीवन संघर्ष करूंगा। कई लोगों ने सवाल जड़ दिया, तुम्हारी जिंदगी अब बची ही कितनी है?

उसके बाद मैंने चेहरे पर तीसरा इश्तहार चस्पां किया, जिस पर लिखा था, मुझे इस दुनिया को जितनी जल्दी हो सके तबदील कर आदमियों के रहने लायक बनाना है। इस पर लोगों ने मेरी खिल्लियां उड़ाते हुए कहा, यह दुनिया है, तुम जैसे सिरफिरों के रहने का पागलखाना नहीं है।

वे हर बार मेरे चेहरे पर लगे इश्तहारों को नोच-नोचकर फेंकने लगे। आखिर एक दिन उन्होंने मेरा चेहरा ही अपने पैने नाखूनों से खरोंच कर उसे पहचान-विहीन कर दिया। तब से मेरा यह मुखड़ा एक अदद दीवार में तबदील होकर रह गया है।


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