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इस देश में सभी बच्चे हैं

अरविंद तिवारी

Updated Mon, 20 Jan 2014 07:12 PM IST
every one in this country is child
कहा जाता है कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं। लेकिन हमारे देश में बड़े लोग भी बच्चों जैसा बनना चाहते हैं। भारतीय बच्चे बहादुर होते हैं, हालांकि वे शोले फिल्म के गब्बर और घने जंगलों से डरते हैं। इन दिनों सियासत में बच्चों की तरह सच्चाई और पारदर्शिता की होड़ लगी है। इसे यों कहें, लालफीताशाही से लेकर सियासत तक में बचपन तारी हो गया है!
देश के बच्चों की तरह देश की पुलिस भी किसी से नहीं डरती। वह मंत्रियों के इशारे पर किसी अपराधी को दबोचना पसंद नहीं करती। दिल्ली हो या शेष भारत, पुलिस अपनी रणनीति पर ही काम करती है। फिर भी देश की जनता बच्चों को प्यार करती है, पुलिस को नहीं।

पुलिस हर रोज यह साबित करती है कि उसकी कार्यशैली बच्चों की तरह है, मगर जनता इस पर विश्वास नहीं करती! पुलिस बच्चों की तरह ही नादानियां करती है, मसलन वह घरों में घुसकर फर्नीचर तोड़ देती है, राह चलते व्यक्ति की पिटाई कर देती है, और उत्तर दिशा में जाना हो, तो दक्षिण में चल देती है।

देश की पुलिस और देश के बच्चों में बेहद समानताएं हैं। दोनों ही जिद्दी स्वभाव के होते हैं, और यदि उनकी जिद पूरी न हो, तो वे कुछ भी कर गुजरते हैं। बच्चा क्रिकेट की गेंद से पड़ोसी की खिड़कियों के शीशे तोड़ सकता है, जबकि पुलिस ऐसे कामों में डंडे का इस्तेमाल करती है। बच्चा खेल-खेल में हजारों रुपयों का नुकसान कर देता है, जबकि पुलिस वैसे ही करोड़ों का नुकसान करने की क्षमता रखती है।

‘मैं तो चंद्र खिलौना लैहों’ की तर्ज पर पुलिस और बच्चा कभी भी रूठ सकते हैं। बच्चों का रूठना परिवार पर भारी पड़ता है, जबकि पुलिस का रूठना इलाके पर भारी पड़ता है! बच्चे को नमक लेने दुकान पर भेजो, तो वह गली में क्रिकेट खेलने लगता है। यही हाल पुलिस का है, वह अपराधियों को पकड़ने के लिए निकलती है, मगर शरीफ आदमी को पूछताछ के लिए पकड़ लेती है।

नौकरशाहों में भी बच्चाजन्य हरकतें देखी गई हैं। वे फाइल पर ऐसे नोट लिख देते हैं कि मंत्रीजी को भी माथा पीटना पड़ता है। सियासत में भी आजकल बयानों को लेकर बचपना झलकने लगा है। नई सियासत सड़क और सचिवालय में फर्क मिटा रही है। सियासत की तरह साहित्य में भी बचपने का बोलबाला है। चर्चित होने के लिए लेखक बाल-सुलभ चेष्टाएं करते देखे जा रहे हैं। बहरहाल बाजार इस बचपने का फायदा उठा रहा है। उसका मुख्य काम बच्चे के बचपन का सौदा करना है।
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