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क्या भारत की राह चलेगा मिस्र!

थॉमस एल फ्रीडमैन (जाने-माने स्तंभकार)

Updated Tue, 18 Dec 2012 01:02 AM IST
egypt finds its way to india
मध्य-पूर्व देश मिस्र के बारे में बात करने से पहले मैं एक खबर का जिक्र करना चाहूंगा, जिसे शायद आप भूल गए होंगे। तीन सप्ताह पहले भारत के प्रधानमंत्री ने सैयद आसिफ इब्राहिम को भारतीय खुफिया ब्यूरो का नया निदेशक नियुक्त किया है।
भारत हिंदू बहुसंख्यक राष्ट्र है, लेकिन वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश भी है। आज के दौर में भारत की सुरक्षा को सबसे ज्यादा खतरा हिंसक मुस्लिम कट्टरपंथियों से है। ऐसे में भारत के लिए खुफिया विभाग के मुखिया के तौर पर एक मुस्लिम को नियुक्त करना न सिर्फ बहुत बड़ी बात है, बल्कि अल्पसंख्यकों के सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम भी है।

भारत के प्रधानमंत्री एवं थल सेना प्रमुख, दोनों सिख हैं, जबकि विदेश मंत्री एवं सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश मुसलमान हैं। मगर आप मौजूदा दौर में मिस्र में कल्पना नहीं कर सकते कि वहां किसी ईसाई को सैन्य प्रमुख नियुक्त कर दिया जाए। बेशक आप इसे बेतुका कह सकते हैं। मगर एक-दो दशकों में मिस्र में हालात नहीं बदले, तो हम देखेंगे कि वहां लोकतंत्र विफल हो गया।

हम समझेंगे कि मिस्र ने पाकिस्तान का रास्ता अपनाया, न कि भारत का और वह एक लोकतांत्रिक देश, जहां नागरिक अपनी क्षमता का एहसास कर सकें, बनने के बजाय एक मुस्लिम देश बन गया, जहां सेना एवं मुस्लिम ब्रदरहुड एक-दूसरे का पोषण करते हैं और जनता मूकदर्शक रह गई है। मिस्र चाहे पाकिस्तान जैसा देश बने या भारत जैसा, पर उसका अरब जगत में लोकतंत्र के भविष्य पर असर जरूर पड़ेगा।

बेशक भारत अभी शासन-व्यवस्था (गवर्नेंस) की समस्याओं से जूझ रहा है और वहां के मुसलमान अब भी भेदभाव झेलते हैं। लेकिन मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में साउथ एशिया स्टडीज प्रोजेक्ट के निदेशक तुफैल अहमद, जो एक भारतीय मुसलमान हैं, बताते हैं कि वह भारत का लोकतंत्र ही है, जिसने छह दशकों से ज्यादा समय से जाति, जनजाति एवं धर्म की मूलभूत सीमाओं को धीरे-धीरे खत्म किया है और भारतीय समाज के विभिन्न समुदायों के लिए अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ने का रास्ता खोला है।

इब्राहिम की नियुक्ति वास्तव में इसी का प्रतिफल है। जबकि मिस्र के छह दशकों की क्रूर तानाशाही ने देश को पूरी तरह से बांटकर रख दिया है, जहां बड़े समुदाय एक-दूसरे को नहीं जानते और एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते। आज पूरे मिस्र को विचार करने की जरूरत है कि एक पूर्व ब्रिटिश औपनिवेशिक देश भारत आखिर कैसे लोकतांत्रिक रास्ते पर आगे बढ़ पाया।  

इसका सबसे पहला उत्तर है, समय। भारत में दशकों से सक्रिय लोकतंत्र है और आजादी से पहले यहां लोकतंत्र के लिए व्यापक संघर्ष हुआ था। मिस्र में लोकतंत्र को बहाल हुए दो वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के लोकतंत्र विशेषज्ञ लैरी डायमंड बताते हैं कि मिस्र की राजनीतिक पृष्ठभूमि दशकों से जड़ता एवं एकाधिकारवाद का शिकार थी। जबकि उन्हीं दशकों में भारत में जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह जैसे राजनेताओं ने एक असाधारण, वैविध्यपूर्ण, कठोर, मगर प्रभावी तरीके से लचीली एवं सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था का निर्माण किया।

भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) शायद 20 वीं सदी के किसी भी उपनिवेश में आजादी के लिए संघर्ष करने वाली पार्टियों में सबसे ज्यादा बहुजातीय, समावेशी एवं लोकतांत्रिक पार्टी थी, जिसने औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंका। जबकि मिस्र में होस्नी मुबारक की तानाशाही को खत्म करने वाली प्रमुख राजनीतिक पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड दबंग धार्मिक अलगाववादी पार्टी थी, जो हाल ही में कुछ-कुछ खुलेपन और बहुलतावाद की ओर बढ़ी है।

महात्मा गांधी एवं मुस्लिम ब्रदरहुड के पथ प्रदर्शक सईद कुत्ब के दर्शन एवं राजनीतिक विरासत की डायमंड तुलना करते हैं। वह कहते हैं, नेहरू कोई संत नहीं थे, लेकिन वह सहिष्णुता एवं आम सहमति को बनाए रखना चाहते थे और कानून का सम्मान करते थे। उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझा।

जबकि कट्टरपंथी मुस्लिम ब्रदरहुड के नेताओं ने, जो लोकतांत्रिक दिशा में बढ़ते मिस्र के नीति-निर्धारक हैं, न केवल अपनी पार्टी के नरमपंथियों से किनारा कर लिया, बल्कि आपात समय में सत्ता हथिया ली और अपने विरोधियों को सड़कों पर पीटा। और अब वे एक ऐसा संविधान चाहते हैं, जिसको लेकर मिस्र के समाज के एक बड़े तबके में असहमति है और वे स्वयं को बहिष्कृत एवं व्यथित  महसूस कर रहे हैं।

पाकिस्तान से अलग भारत में आजादी के बाद के नेताओं ने सेना को राजनीति से अलग कर दिया। दुर्भाग्य से मिस्र में 1952 के तख्तापलट के बाद गैमल आब्देल नासिर ने सेना को राजनीति में शामिल कर लिया। उनके उत्तराधिकारियों और मुबारक तक ने इसी का अनुकरण किया। पर जब मुबारक का पतन हुआ, तो नए ब्रदरहुड शासकों ने सेना को बैरक में भेज दिया। जिससे सैनिकों को लगा कि व्यापक आर्थिक हितों के संरक्षण से उन्हें वंचित कर दिया गया है।

सत्तारूढ़ मुस्लिम ब्रदरहुड को यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र चुनाव जीतने से कहीं ज्यादा बड़ी चीज है। यह समावेशी संस्कृति एवं शांतिपूर्ण संवाद का पोषण है, जहां विरोधियों को हुक्म देने के बजाय उनसे समझौता करके सम्मान अर्जित किया जाता है।

नोबलजयी अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने काफी समय पहले कहा था कि यह भारत की सभ्यतागत बातचीत एवं तर्कशीलता का इतिहास ही है, जिसने लोकतांत्रिक संस्थानों की बुनियाद खड़ी की। मिस्र को अब ऐसे ही संवाद की संस्कृति और शांतिपूर्ण व सम्मानपूर्ण तर्कशीलता को विकसित करने की जरूरत है, जिसे मुबारक के शासन में पूरी तरह से दबा दिया गया था। इसके बिना लोकतंत्र सफल नहीं हो पाएगा।
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