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देर से ही सही मौलाना को याद तो किया

फिरोज बख्त अहमद

Updated Sat, 10 Nov 2012 11:13 PM IST
did so recalled belatedly maulana
मौलाना अबुल कलाम आजाद के इंतकाल के लंबे समय बाद उन्हें याद करने के लिए उनके जन्म दिन को ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस' के रूप में मनाए जाने का फैसला देर से आया है, लेकिन दुरुस्त है। यदि शिक्षक दिवस सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन की याद में मनाया जाता है, तो देश के प्रथम शिक्षा मंत्री के सम्मान में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाया जाना एक सटीक अवसर है। मौलाना आजाद का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जो महान विद्वानों और असाधारण प्रतिभाओं को जन्म देता आया है।
आजाद के पिता मौलाना खैरुद्दीन न केवल एक असाधारण विद्वान थे, बल्कि एक पीर भी थे, जिनके मुरीद संपूर्ण विश्व में फैले हुए थे। मौलाना ने इसलामी शिक्षा को एक नई दिशा दी। ‘गुबार-ए-खातिर’ में आजाद की लेखनी का जादू सिर चढ़कर बोला है।

वह लिखते हैं, ‘मजहब इनसान को उसकी खानदानी विरासत के साथ मिलता है। मुझे भी मिला, परंतु मैं परंपरागत विश्वास की विरासत पर कायम न रह सका। मेरी प्यास उससे कहीं ज्यादा निकली, जितनी वह प्यास बुझा सकते थे। लिहाजा मुझे पुरानी राहों से निकलकर नई राहें ढूंढनी पड़ीं। अभी 15 बरस ही बीते थे कि तबीयत का जुस्तजूओं से मिलन हो गया।

इसी सिलसिले में पहले इसलाम के अंदरूनी भेदभाव सामने आए, तो उनके दावों प्रतिदावों, आरोपों तथा प्रत्यारोपों ने मुझे हैरान व परेशान कर दिया। फिर कदम कुछ आगे बढ़े, तो मजहब की सार्वभौमिकता ने मुझे हैरानी, हैरानगी से शक तक तथा शक से इनकार तक पहुंचा दिया। फिर इसके बाद मजहब और इल्म के बाह्य आडंबर प्रकट हुए, तो उनसे मैंने रहा-सहा अकीदा (विश्वास) ही खो दिया।’

शायद यही कारण था कि मौलाना ने अपना उपनाम ‘आजाद’ रख लिया था, जबकि उनका असली नाम मुहिउद्दीन अहमद था। ‘आजाद’ नाम रखने का तथ्य इस बात का संकेत था कि उनको परंपरा में जो विश्वास, मान्यताएं तथा मूल्य मिले थे, वे अब उनसे बंधे हुए नहीं रहे। यही कारण था कि उन्होंने अपने पिता की भांति पीरी-मुरीदी का सिलसिला जारी रखने से परहेज किया। बतौर शिक्षा मंत्री मौलाना ने आईसीसीआर, आईसीएसआर, यूजीसी, तकनीकी विज्ञान के संस्थानों आदि की नींव रखी। भारत में शिक्षा का विस्तार उनकी शिक्षा नीतियों की ही देन है।

मौलाना ने पत्रकारिता और इसलाम का स्वच्छ रूप जनता को समझाने को अपने जीवन का ध्येय बनाया। आज भी उन्हें उर्दू, फारसी और अरबी के श्रेष्ठतम लेखकों में से माना जाता है। वह न केवल आपसी भाईचारे के प्रतीक थे, बल्कि राष्ट्रीय सौहार्द का जीता-जागता उदाहरण थे। उनके लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वर्षों पूर्व उन्हें इस बात का आभास हो गया था यदि भारत का विभाजन हुआ, तो उससे न तो पाकिस्तान में मुसलमान और न ही भारत में हिंदू वर्ग खुश रहेगा।

मौलाना आजाद देश की आन-बान के लिए जिस तरह सब कुछ लुटाने को तैयार थे, उससे आज के नेताओं को सबक सीखना चाहिए। मौलाना आजाद ने इसलाम की देश भक्ति और भारत के सांप्रदायिक सौहार्द का समन्वय बिठाकर एक सर्वधर्म समभाव वाली सभ्यता को जन्म दिया। पत्रकारिता में उन्होंने खास मुकाम हासिल किया। जब वह दर्स-ए-निजामी के छात्र थे, तभी 1900 में उन्होंने अपना अखबार 'अहसन' निकाला था, लेकिन वह अधिक दिनों तक नहीं चल सका।

फिर भी बारह वर्ष की आयु में ऐसा कार्य करने पर उन्हें बड़ी शाबासी दी गई। उसके बाद उन्होंने समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए लेख लिखने शुरू किए। वर्ष 1902 के जनवरी में लाहौर से प्रकाशित 'मुखजिन' में जब उर्दू पत्रकारिता पर उनका लेख फन-ए-अखबारनवीसी प्रकाशित हुआ, तो पूरे देश में उन्हें ख्याति प्राप्त हुई।

वर्ष 1912 में उन्होंने ‘अल-हिलाल’ अखबार प्रकाशित किया, जिसका ध्येय अंगरेजों के विरुद्ध भारतवासियों की राष्ट्रीय भावना को जागृत करना और देश पर न्योछावर होने की तमन्ना पैदा करना था, जिसमें वह पूर्ण रूप से सफल रहे। मगर हिंदू-मुसलिम संप्रदाय की आपसी सद्भावना पनपते देख अंगरेज सरकार ने इसे जब्त कर लिया। लेकिन 1916 में ‘अल-बलाग’ के नाम से मौलाना ने इसे फिर से प्रकाशित किया और उस समय इसकी प्रसार संख्या 29,000 पहुंच गई थी। लेकिन अंगरेजों ने उसे भी बंद कर दिया। अपनी लेखनी से भी भारत की आजादी के लिए मौलाना ने बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। उनका जीवन आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
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