आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

दोहा में कुछ हाथ न आया

सुमन सहाय

Updated Wed, 05 Dec 2012 09:36 AM IST
did not achieve anything in doha
हाल ही में दोहा में जलवायु परिवर्तन को लेकर चल रही वार्ताओं का एक और दौर बगैर किसी नतीजे के समाप्त हो गया। सचाई तो यह है कि कोई यह उम्मीद नहीं कर रहा था कि इस बैठक में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती लाने पर कोई समझौता हो पाएगा।

पिछले कुछ समय से यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कनवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) की मुहिम के तहत होने वाली ये वार्ताएं कुछ महीनों के अंतराल पर भरपूर तड़क-भड़क के साथ आयोजित होती रही हैं। लेकिन फिर भी इनसे अपेक्षित नतीजे नहीं मिल सके हैं।

जहां पांच सितारा होटलों में होने वाली यूएनएफसीसीसी की ये वार्ताएं लगातार नाकामयाब हो रही हैं, वहीं ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसें अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं। विश्व मौसम संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, 1990 से 2011 के बीच कार्बन डाई ऑक्साइड और तापमान में बढ़ोतरी करने और वातावरण में लंबे समय तक रहने वाली दूसरी गैसों की वजह से हमारी जलवायु की उष्णता में 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।

कुछ हफ्ते पहले जारी की गई विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि जिस दर से हम बढ़ रहे हैं, इस सदी के अंत तक पृथ्वी के तापमान में चार डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो सकती है। और यदि ऐसा हो गया, तो उष्ण कटिबंधीय देशों में विनाश का तांडव मच जाएगा और कृषि का अधिक हिस्सा नष्ट हो जाएगा।

अभी तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए वार्ताओं के सिवाय किसी गंभीर प्रयास के साक्ष्य नहीं मिले हैं। इन गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार औद्योगिक देश उत्सर्जन में किसी भी प्रकार की कटौती के खिलाफ हैं। दोहा जलवायु सम्मेलन, अब तक जलवायु परिवर्तन पर हुए एकमात्र वैश्विक समझौते क्योटो प्रोटोकॉल के तहत होने वाली वार्ताओं की अंतिम कड़ी है।

इस प्रोटोकॉल की अवधि 2013 की शुरुआत में खत्म हो रही है। और कहा जा सकता है कि इसके बाद कोई भी ऐसा वैश्विक जलवायविक समझौता नहीं है, जिसके तहत विभिन्न देशों को किसी पहल के लिए बाध्य किया जा सके। क्योटो प्रोटोकॉल के तहत औद्योगिक देशों को 2012 तक अपने उत्सर्जन में 1990 के स्तर से पांच प्रतिशत की कमी लानी थी। हालांकि ऐसा हो नहीं सका।

विकसित देश क्योटो प्रोटोकॉल के तहत किए गए मूल समझौते से पूरी तरह मुकरते हुए जिद पर अड़े हैं कि वे तब तक अपने उत्सर्जन में कटौती नहीं करेंगे, जब तक इसकी परिधि में विकासशील देशों को भी शामिल नहीं किया जाता। इन विकसित देशों की इस जिद की अगुवाई वह अमेरिका कर रहा है, जो क्योटो प्रोटोकॉल का कभी सदस्य नहीं रहा और साथ ही कुछ समय पहले तक विश्व में सर्वाधिक ग्रीन हाउस उत्सर्जित करने वाला देश भी था।

अमेरिका के नेतृत्व वाली यह मुहिम उस पर्यावरणीय सिद्धांत के ठीक उलट है, जो कहता है कि प्रदूषण फैलाने वाला ही भुगतान का पात्र होगा। कहने का मतलब है कि जिसकी वजह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचा हो, वही उसकी भरपाई के लिए जुर्माना देगा। असल में अमेरिका ने अपने उद्योगों को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी वैश्विक समझौते का हमेशा विरोध किया है, भले ही पूरी दुनिया को उसकी कीमत चुकानी पड़े।

कई अमेरिकी एजेंसियां तो यहां तक कहती हैं कि स्वच्छ तकनीक और उत्सर्जन में कटौती का हवाला देकर दूसरे देश अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति को धीमा करने की साजिश कर रहे हैं। अमेरिका की देखा-देखी रूस, जापान और न्यूजीलैंड जैसे दूसरे विकसित देशों ने भी अपने उत्सर्जन में कटौती लाने से इनकार कर दिया है। इन देशों ने संयुक्त रूप से चीन और भारत को निशाना बनाया है। फिलहाल चीन विश्व में ग्रीन हाउस गैसों का सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाला देश बन गया है और भारत में भी इसकी मात्रा बढ़ रही है। विकसित देशों की मांग है कि ये दोनों देश पहले अपने उत्सर्जन में भारी कटौती करें।

चीन और भारत का तर्क है कि उनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अब भी विकसित देशों, खासकर अमेरिका की तुलना में काफी कम है। इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि विकसित देश पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचा चुके हैं, पहले उसकी भरपाई की जानी चाहिए। अपने समर्थन में विकासशील देश तर्क देते हैं कि 18वीं सदी में शुरू हुए सघन औद्योगिकीकरण के बाद से औद्योगिक देश कोयले और तेल आधारित प्रदूषणकारी उद्योगों के जरिये अब तक लगभग 375 अरब टन कार्बन वातावरण में छोड़ चुके हैं।

भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि जब तक औद्योगिक देश क्योटो प्रोटोकॉल की शर्तों को स्वीकार नहीं करते और उत्सर्जन के मुद्दे पर व्यापक समझौता नहीं होता, वह ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती लाने की कानूनी बाध्यता वाले किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगी। भारत और दूसरे विकासशील देशों को जी-77 देशों के मंच पर चीन के साथ मिलकर क्योटो प्रोटोकॉल के विस्तार और उत्सर्जन को लेकर विकसित देशों की प्रतिबद्धता की मांग करनी चाहिए। इन देशों को साथ मिलकर विकसित देशों के किसी भी असंगत प्रस्ताव का विरोध करना चाहिए।

यूएनएफसीसीसी में जी-77 के जरिये अपनी मांग रखते हुए भारत को दक्षेस और आसियान देशों के साथ क्षेत्रीय सहयोग की नई दिशाओं की भी तलाश करनी चाहिए। विकासशील दुनिया के एक बड़े हिस्से की बेहतरी और ग्लोबल वार्मिंग के दानव पर नियंत्रण रखने वाली यूएनएफसीसीसी प्रक्रिया पर दबाव बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय समझौतों को हथियार बनाने की रणनीति कारगर साबित हो सकती है।

  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

स्पॉटलाइट

जानें क्या कहता है आपके आईलाइनर लगाने का अंदाज

  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

रात में लाइट जलाकर सोते हैं तो हो जाएं सावधान

  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

गीता बाली से शादी के बाद शम्मी कपूर की जिंदगी में हुआ था ये चमत्कार, रातोंरात बन गए थे सुपरस्टार

  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

अगर आप हैं ऑयली स्किन से परेशान तो जरूर आपनाएं ये घरेलू उपाय

  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

54 वर्ष की उम्र में भी झलक रही है श्रीदेवी की खूबसूरती, देखें तस्वीरें

  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

Most Read

गोरखपुर में जो हुआ

Gorakhpur tragedy
  • रविवार, 20 अगस्त 2017
  • +

मोदी से कैसे मुकाबला करेगा विपक्ष

How opposition counter Modi
  • शनिवार, 19 अगस्त 2017
  • +

मजहब का हिस्सा नहीं तीन तलाक

'triple-talaq' is not part of religion
  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

पड़ोस में पैर पसारता चीन

China sits in the neighborhood
  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +

दोनों चुनाव एक साथ ?

Simultaneous elections
  • सोमवार, 21 अगस्त 2017
  • +

संविधान मे नहीं है अनुच्छेद 35ए

Constitution does not contain Article 35A
  • बुधवार, 23 अगस्त 2017
  • +
Top
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!