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जनतांत्रिक परंपरा के नवरत्न

democratic tradition navaratna

Updated Fri, 14 Sep 2012 12:46 PM IST
democratic tradition navaratna
सचिन तेंदुलकर सवा अरब में एक समझे जाने वाले अद्वितीय, असाधारण हिंदुस्तानी हैं। इसलिए यह बात समझ में आती है कि भारत माता के खजाने में जो कुछ भी है, वह उन पर न्यौछावर कर दिया जाए। भारत रत्न वाला प्रस्ताव अभी अधर में है, संभवतः इसीलिए बतौर सांत्वना पुरस्कार उन्हें राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में नामजद कर दिया गया है। हाल कुछ ऐसा है कि बतर्ज पुराने हिंदी फिल्मी गाने के मेरे मेहबूब में क्या नहीं, क्या नहीं।
सचिन पहले ही भारतीय वायुसेना के आला मानद अफसर बनाए जा चुके हैं। और जब चमत्कारी प्रदर्शन के लिए करोड़ों रुपये की फरारी कार उन्हें तोहफे में मिलती है, तब उनके प्रशंसक नेता तथा अफसर एक-दूसरे पर गिरे पड़ते हैं, उन्हें सीमा शुल्क तथा सड़क कर से छूट दिलाने के लिए। क्या किसी भी जनतंत्र में, जहां कानून का राज हो, सिर्फ मशहूर हस्ती होना किसी व्यक्ति को तमाम कानूनी बाधाओं से मुक्ति दिलाने वाला कवच हो सकता है?

सवाल सिर्फ इतना भर नहीं, कुछ और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, इस घड़ी जिन पर विचार करना जरूरी है। सिर्फ सचिन की पात्रता का सवाल नहीं है, बल्कि संसदीय जनतंत्र की परंपरा और जनतांत्रिक संस्कार का भी है। इस घोषणा के बाद सचिन तेंदुलकर ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के यहां सपत्नीक हाजरी लगाने में देर नहीं लगाई। इसके कुछ ही देर बाद संजय निरूपम ने उन्हें यह न्योता दे डाला कि अगर वह कांग्रेस पार्टी का सदस्य बनना चाहते हैं, तो उनका सहर्ष स्वागत है।

कांग्रेस के राजीव शुक्ल ने, जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के तंत्री हैं, यह बात गैरजरूरी ढंग से दोहराई कि राज्यसभा में अच्छे लोगों को आना चाहिए। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि सचिन बिना हिचक अच्छे लोगों की सूची में शुमार किए जा सकते हैं, पर यह कह पाना कठिन है कि कांग्रेसी नेताओं की राजनीतिक जमात में शामिल होने के बाद उनकी अपनी छवि कितनी देर तक बेदाग बची रहेगी।
जाहिर है कि भारत के किसी भी नागरिक को अपनी पसंद के अनुसार किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता स्वीकार करने का अधिकार है। पर बेहतर यह होता कि सचिन की राजनीतिक पक्षधरता जगजाहिर होने के बाद उनका मनोनयन राज्यसभा के सदस्य के रूप में किया जाता।

संविधान में राज्यसभा के लिए जो भूमिका तय की गई है, उसमें इसे ऊपरी सदन के साथ राज्यसभा नाम इसलिए दिया गया है कि भारत की संघीय प्रणाली में गणराज्य की घटक इकाइयों का प्रतिनिधित्व संसद में संतोषप्रद रूप से हो सके। यह दुर्भाग्य का विषय है कि हाल के वर्षों में इस सदन की पहचान एक ऐसे विशिष्ट क्लब के रूप में की जाने लगी है, जिसकी सदस्यता के अधिकार अमीर उद्योगपति या तिकड़मी नौकरशाह या असरदार राजनेताओं के संकटमोचक शातिर वकील ही हो सकते हैं। शोभा बढ़ाने के लिए कलाकारों, साहित्यकारों का तड़का इस काली दाल में लगाया जाता है।

जो बात जोर देकर कहने लायक है, वह यह कि आज सत्तारूढ़ यूपीए का बहुमत राज्यसभा में नहीं है। एक-एक मत के लिए उसका मोहताज होना लोकपाल विधेयक वाले मतदान के समय शर्मनाक ढंग से सामने आ चुका है। ऐसी हालत में मशहूर हस्ती को नामजद करना और फिर अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता देना, किसी भी तरह से नैतिक नहीं कहा जा सकता।

इसके अलावा राज्यसभा की सदस्यता के लिए उपयुक्त व्यक्तियों की जिन अर्हताओं का उल्लेख है, उनमें खेल के मैदान की उपलब्धियां शामिल नहीं। साहित्य, कला, विज्ञान एवं समाज सेवा के क्षेत्र में उपलब्धियां ही इसकी कसौटी हो सकती हैं। समाज सेवा के क्षेत्र में सचिन गुप्तदानी ही रहे हैं और यही बात उन्हें भारत रत्न के लिए विचारणीय बनाने में भी रोड़ा साबित होती रही है। यहां चूंकि बात राज्यसभा की सदस्यता की हो रही है, अतः भारत रत्न वाली बहस में उलझना ठीक नहीं पर इतना जरूर जोड़ने का मन है कि किसी भी उत्कृष्ट सम्मान के लिए क्षेत्रीय भाषाई पूर्वाग्रह से मुक्त होना जरूरी है।

गुजरे जमाने में सल्तनत-ए-मुगलिया में अकबर ने नवरत्न दरबारी चुने थे, जो उसके प्रभामंडल के गिर्द मंडराते जगमगाते नक्षत्र थे। अकबर ने ही मनसबदारी व्यवस्था चालू की थी। अपने-अपने रुतबे और हैसियत के अनुसार हजारों की मनसब भरोसे के लोगों को मान्यता प्रदान करने के लिए ही नहीं, बख्शीश और ईनाम के तौर पर दी जाती थी। आरंभ में इसकी जो भी उपयोगिता रही हो, मुगल साम्राज्य के खस्ताहाल होने के बाद इस बंदोबस्त ने साम्राज्य के विघटन को तेजी दी थी।

यूपीए-2 की हालत आज बिल्कुल ऐसी ही है। नवरत्नों की बात जितनी कम की जाए, उतना अच्छा है। यदि पत्नी का कार्यकाल राज्यसभा में पूरा हो जाए, तो पति को नामजद किया जाता है। मानो प्रतिभा का घोर अकाल सवा अरब की आबादी वाले इस देश में पड़ चुका है। स्वयं भारत कोकिला लता मंगेशकर राज्यसभा में नामजद सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद अनुपस्थित ही रही थीं। सचिन घोषणा कर चुके हैं कि अभी संन्यास लेने का उनका इरादा नहीं, ऐसे में वह राज्यसभा में कोई सार्थक भूमिका निभा पाएंगे, इसमें संदेह है।
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