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क्या देश वेलियंबरा के रास्ते चलेगा

सुभाष गाताडे

Updated Wed, 03 Oct 2012 10:46 PM IST
country will go veliyambra route
केरल के अल्लापुजा जिले के वेलियंबरा गांव में आगामी 24 अक्तूबर को एक अलग तरह का कार्यक्रम होगा। इस समारोह में गांव के लोग अंगदान से संबंधित अपने सहमति पत्र जिले के अधिकारियों को सौंपेंगे। करीब दो सौ परिवारों वाले इस गांव ने यह संकल्प लिया है कि हर परिवार के अट्ठारह साल से ऊपर के दो सदस्य अपना इंद्रियदान करेंगे। यह स्वतःस्फूर्त मामला नहीं है। इसके पीछे गांव के एक स्पोर्ट्स क्लब के नौजवानों की पहल दिखती है। इस क्लब के एक सदस्य नटराजन की किडनी न बदल पाने के कारण कुछ माह पहले हुई मौत ने इन नौजवानों को हिला दिया। उन्होंने तय किया है कि भविष्य में गरीबी के चलते किसी का इंद्रिय प्रत्यारोपण न रुक पाए। भारत जैसे मुल्क में, जहां अंगदान या देहदान का चलन न के बराबर है, वेलियंबरा का यह संकल्प सुकून पहुंचाता है।
अपने देश में अंग प्रत्यारोरण के अभाव में हर तीन मिनट पर एक मौत होती है। सालाना दो लाख लोग इस वजह से मारे जाते हैं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे इंद्रियों के रोग तथा मधुमेह जैसी बीमारियां, जो किडनी फेल होने का अहम कारण है, बढ़ने वाली हैं। लोग अंगदान करें, तो तसवीर बदल सकती है। लेकिन अपने यहां दस लाख लोगों में महज 0.08 लोग ही अंगदान करते हैं, जबकि पश्चिमी देशों में यह आंकड़ा कई गुना है। अपने यहां अंगदान से संबंधित कई भ्रांतियां हैं, जैसे अंगदान करने से शरीर विद्रूप हो जाएगा।

कइयों की धार्मिक मान्यताएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं। उन्हें लगता है कि ईश्वर ने जिस रूप में मनुष्य को भेजा है, उसी रूप में उसे लौटा देना चाहिए। इसके अलावा संसाधनों और ऐसे अस्पतालों की भी कमी है, जहां ऐसे प्रत्यारोपण किए जा सकते हैं। तमिलनाडु इस मामले में अपवाद है। बीती सदी के नौवें दशक के उत्तरार्द्ध में वहां संपन्न प्रथम फेफड़ा प्रत्यारोपण ऑपरेशन के बाद से अब तक वहां 13 लाख अंगदान संपन्न किए गए हैं। इसमें तमिलनाडु सरकार के समर्थन ने तो मदद पहुंचाई ही, जागरूक समूहों, संगठनों द्वारा फैलाई गई जनचेतना का भी हाथ रहा।

चिकित्साविज्ञान बताता है कि मृत्यु के बाद शरीर के कई हिस्सों को निकालकर दूसरों के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। ब्रेनडेथ का शिकार व्यक्ति भी कई लोगों को जीवनदान दे सकता है। कोई व्यक्ति देहदान करे, तो उसका शरीर चिकित्साविज्ञान के विद्यार्थियों के प्रशिक्षण के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। देश में हर साल पौने दो लाख मरीजों को गुर्दा प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, लेकिन प्रत्यारोपण महज पांच हजार मरीजों का ही हो पाता है। सालाना 50 हजार मरीजों को लीवर प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, जबकि प्रत्यारोपण केवल सात सौ मरीजों का ही हो पाता है। सालाना 50 हजार लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत है, मगर पिछले साल सिर्फ 30 लोगों का ही हृदय प्रत्यारोपण हो सका। हर साल करीब एक लाख लोगों को कार्निया के प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, मगर सिर्फ 25,000 लोगों का ही प्रत्यारोपण किया जा सकता है।

वर्ष 1994 में सरकार ने ‘मानवीय इंद्रियों के प्रत्यारोपण का कानून बनाया, जिसका मकसद था, चिकित्सकीय कार्यों के लिए मानवीय इंद्रियों को निकालने, उनका भंडारण और उनके प्रत्यारोपण को नियमित किया जाए, इंद्रियों के व्यावसायिक लेन-देन को रोका जा सके, ब्रेन डेथ को स्वीकारा जाए और इन मरीजों को संभावित इंद्रियदाताओं के तौर पर प्रयुक्त किया जाए। उस कानून ने पहली बार ब्रेन डेथ की अवधारणा को कानूनी जामा पहनाया। इसमें सबसे बड़ी बाधा मरीज के आत्मीय रिश्तेदारों को शिक्षित करने की होती है, जिसमें दुर्घटना में ब्रेन डेड मरीजों को कृत्रिम श्वास प्रणाली से ‘जिंदा’ रखा जाता है।

अब लोगों में बढ़ती जागृति सामूहिक प्रयासों की शक्ल धारण कर रही है। अपने शरीर को चिकित्सकीय अनुसंधान के लिए देने की घोषणा करनेवाली असम की एलोरा रायचौधुरी की याद में बना ‘एलोरा विचार मंच’ इसी मुहिम में जुटा है। इसी तरह जयपुर की एक सामाजिक संस्था ने अभियान चलाकर देहदान के इच्छुक 210 लोगों के शपथपत्र स्वास्थ्य मंत्री को पेश किए।
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