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इतिहास से संवाद और एक शहर

कल्लोल चक्रवर्ती

Updated Fri, 14 Sep 2012 01:57 PM IST
conversations with history and a city
गर्रा और खन्नौत नदियों के बीच बसा शाहजहांपुर कई अर्थों में एक विलक्षण शहर है। 1857 की क्रांति में रूहेलखंड की बड़ी भूमिका थी। शहर शाहजहांपुर ने तब अंगरेज अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था। आजादी की लड़ाई में यहां के तीन सपूतों, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाकउल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह ने फांसी का फंदा चूमा था। बेशक यह शहर क्रांति और क्रांतिकारियों का शहर है, लेकिन साहित्य के मामले में इसकी समृद्धि से भी कोई कम रश्क नहीं होता। चाहे वह एब्सर्ड नाटकों के प्रणेता भुवनेश्वर रहे हों या स्त्री संवेदना को गहराई से उकेरने वाली राजी सेठ या चर्चित कथाकार हृदयेश- सब इसी शहर के हैं।
बेशक इन्हीं विभूतियों के बूते कोई शहर इतिहास में अपनी जगह दर्ज कर सकता है। लेकिन शाहजहांपुर का परिचय इतना भर नहीं है। कम से कम उन सुधीर विद्यार्थी के लिए तो नहीं ही, जिन्होंने क्रांतिकारियों के इतिहास के साथ-साथ जनपदीय इतिहास पर भी उतनी ही रुचि, विस्तार और गहन शोध के साथ काम किया है। 'पहचान बीसलपुर' इस दिशा में अगर एक अद्भुत शुरुआत थी, तो शाहजहांपुर पर यह दूसरी किताब उसी धारा का विस्तार है। लेखक ने इस सीरीज की पहली किताब (मेरे हिस्से का शहर) में यहां के शहीदों और उनके परिवार पर डूबकर लिखा है, तो दूसरे खंड में भी शाहजहांपुर का इतिहास और यहां के लोग हैं। चूंकि शहीदी इतिहास लेखक का प्रिय विषय रहा है, इसलिए इस दूसरे खंड में भी यत्र-तत्र गदर, यहां के शहीद, शाहजहांपुर बम कांड और उससे जुड़े लोगों की चर्चा है। किताब की शुरुआत में ही सेंट मेरी चर्च के बारे में बताते हुए लेखक गदर का दौर, चर्च पर रस्किन बांड की किताब और 'जुनून' फिल्म के बारे में बताते हैं, जिसमें इस चर्च की ऐतिहासिकता को बताया गया है।

लेखक सीधे शाहजहांपुर के इतिहास में नहीं झांकते, बल्कि यहां के एक-एक पात्र को उठाते हैं और उनके जरिये तत्कालीन दौर के बारे में बताते हैं। उनके पात्र तीन तरह के लोग हैं। एक तो वे लोग हैं, जिन्हें लेखक ने देखा नहीं। बेनीमाधव रुस्वा, वहशी शाहजहांपुरी, चिम्मनलाल शाह और छायावादी कवि होरीलाल वर्मा जैसे लोग इसी कोटि में आते हैं। दूसरी तरह के लोग हैं, जिनका कभी शाहजहांपुर से रिश्ता रहा था, जैसे मास्टर रुद्रनारायण सिंह या पीडी टंडन जैसे लोग। तीसरी कोटि में वे लोग आते हैं, जिनके साथ लेखक का उठना-बैठना रहा है। किताब में ऐसे ही लोगों का चित्रण ज्यादा है। चाहे वह क्रांतिकारी पत्रिका 'साथी' निकालने वाले श्यामसिंह बागी हों या मानसरोवर के जरिये शहर में कॉफी हाउस चलाने वाले की भूमिका अदा करने वाले काशीनाथ कपूर उर्फ गप्पी बाबू या इस निर्मम दौर में प्रकाशन संस्था चलाने वाले संवेदनशील कवि-व्यक्तित्व श्याम किशोर-इन सबको मिलाकर शाहजहांपुर का एक चित्र बनता है। हालांकि इन पात्रों में सब धवल हों, ऐसा ही नहीं है। इनमें कई लोग वक्त के साथ ताल मिलाकर चलने वाले भी हैं, जो समाजवाद और क्रांति के रास्ते से अपनी यात्रा शुरू करते हुए दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़कर सत्ता तक भी पहुंचते हैं। लेकिन लेखक इनमें से किसी के भी प्रति अशालीन या क्षुब्ध नहीं होता।

इस किताब के दो पात्र ऐसे हैं, जिनसे गुजरते हुए अद्भुत अनुभूति होती है। लेखक ने अपने दिवंगत बेटे पर जिस तरह लिखा है, हिंदी में वैसा कम ही है। संतान के खो देने का दुख कितना बड़ा होता है, मेरा राजहंस पढ़कर जाना जा सकता है। इसी तरह शाहजहांपुर में अपना बचपन बिताने वाली राजी सेठ पर लेखक ने जो लिखा है, वह न सिर्फ मुग्ध करता है, बल्कि राजी सेठ के जीवन और लेखन पर कम शब्दों में इससे बेहतरीन टिप्पणी नहीं हो सकती। इन दो अध्यायों में सुधीर एक संवेदनशील लेखक के रूप में हमारे सामने आते हैं।

हम सबके जीवन में एक शहर है। वह शाहजहांपुर की तरह भी हो सकता है और नहीं भी। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उस शहर को ढूंढ़ निकाल पाते हैं या नहीं, जो हमारे सपनों में है। सुधीर विद्यार्थी ने एक मिसाल पेश की है। चूंकि ग्लोबल का एक अर्थ लोकल भी है, ऐसे में लाजिमी तो यही है कि स्थानीय इतिहास पर ऐसी ही और किताबें सामने आएं।

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