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कांग्रेस की चुनौतियां कम नहीं

अरुण नेहरू

Updated Fri, 21 Dec 2012 10:13 PM IST
congress not less challenges
अब हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे हमारे सामने हैं। मुझे लगता है कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया है और गुजरात में भी उसकी बुरी तरह से हार नहीं हुई है। मेरा यह आकलन कि हिमाचल में कांग्रेस बहुत कम अंतर से जीतेगी, पूरी तरह से गलत निकला, क्योंकि पर्याप्त अंतर से वह चुनाव जीती है। इसका पूरा श्रेय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जाता है, जिन्होंने समय पर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को चुनाव प्रभारी बनाने का फैसला लिया।

जहां तक गुजरात की बात है, नरेंद्र मोदी ने सत्ता विरोधी रुझान को निर्णायक ढंग से खत्म कर दिया और लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। अब देखने वाली बात होगी कि उनकी इस जीत का आने वाले दिनों में क्या असर पड़ेगा। हिमाचल प्रदेश में सत्ता विरोधी रुझान स्पष्ट था। यह भाजपा के लिए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं कर्नाटक में भी सिरदर्द बन सकता है, जबकि कांग्रेस को राजस्थान एवं आंध्र प्रदेश में इससे जूझना पड़ सकता है।

लेकिन मौजूदा रुझान को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि लोकसभा के चुनाव समय से पहले होंगे। यह तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमक एवं अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए गहरा झटका होगा, जो समय से पहले लोकसभा चुनाव चाहते हैं। जैसी स्थितियां हैं, मुझे लगता है कि इन नतीजों को लेकर आम लोगों में मिली-जुली प्रतिक्रिया होगी, लेकिन कांग्रेस एवं उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी बढ़ेगा, क्योंकि ऐसा महसूस किया जा रहा था कि मीडिया में लगातार आ रही नकारात्मक खबरों का पार्टी को खामियाजा भुगतना होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भावी गठजोड़ में इसका असर दिखेगा और यह भाजपा के बजाय कांग्रेस के पक्ष में होगा।

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को 36 और भाजपा को 26 सीटें मिलीं। यह कांग्रेस की निर्णायक जीत है। गुजरात में भाजपा को सर्वाधिक115, कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं। नरेंद्र मोदी की यह जीत केंद्र में भाजपा की तस्वीर बदल देगी। वह भाजपा को नेतृत्व दे सकने वाले सबसे सक्षम व्यक्ति हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्हें 125 से 135 सीटें मिलतीं, तो उसका प्रभाव अलग होता। इसलिए हैरत नहीं कि भाजपा में शीर्ष स्तर पर हाल के अंदरूनी विवाद का इन दोनों राज्यों में भाजपा के प्रदर्शन पर असर पड़ा हो।

कई बार ऐसा होता है कि आदमी अपनी अक्षमता के कारण स्तब्ध रह जाता है और घटना की नृशंसता का प्रभाव ऐसा भयावह होता है कि उसे व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल होता है। हममें से कई लोग संकट की स्थितियों में एक व्यावहारिक समाधान तलाशते हैं। मैं उपहार सिनेमा त्रासदी के आतंक को याद करता हूं। उससे पहले मैंने ऐसी घटना नहीं देखी थी। हम असहाय होकर कई युवाओं और बुजुर्गों को मरते देखने के लिए अभिशप्त थे।

जब न्यूयॉर्क में 9/11 का हमला हुआ था, तो मैं ट्वीन टावर से बस 20 मकान दूर था। मैंने दूसरे विमान को ट्वीन टावर से टकराते हुए टीवी पर लाइव देखा था। किसी को पता नहीं था कि क्या हो रहा है और एक-दो घंटे के भीतर ही 3,000 लोगों की दुखद मौत हो गई। उसके बाद मुंबई में 26/11 का नरसंहार हुआ, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। हमने सशस्त्र पाकिस्तानी आतंकियों को लोगों की जघन्य हत्याएं करते देखा।

पिछले दिनों अमेरिका के एक स्कूल में एक 20 वर्षीय लड़के ने जिस तरह से छह-सात वर्ष के मासूमों का कत्ल किया, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह अमेरिका में हुई सामूहिक नरसंहार की कोई पहली घटना नहीं थी। इस घटना पर लाखों शब्द बोले और लिखे गए, लोगों ने काफी आंसू बहाए, लेकिन इसमें जान गंवाने वाले मासूमों के परिजनों के लिए उसका क्या मतलब है! हम कई रूपों में हिंसा होते देखते हैं, अब देखिए कि दिल्ली में एक 23 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना ने कैसे पूरे देश को हिलाकर रख दिया है।

सबसे पहले हम उसके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं। हमारी संवेदनाएं उसके एवं उसके परिवार के साथ हैं। उसके साथ बर्बर तरीके से सामूहिक बलात्कार किया गया। पूरा देश इसके खिलाफ उठ खड़ा हुआ है और यह मुद्दा बलात्कार से आगे जाकर यौन उत्पीड़न, कानून-व्यवस्था और बालिकाओं के प्रति हमारे व्यवहार और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर सवाल खड़े करेगा। हमें समझना होगा कि आधी आबादी महिलाओं की है और शेष आधी महिलाओं के कारण ही है।

माहौल में परिवर्तन की लहर है और जिस तरह पूरा समाज जांच के दायरे में है, उसी तरह शासन के तीनों अंग भी जांच के दायरे में आएंगे। दुख की बात है कि जब ऐसी बर्बर घटनाएं होती हैं, तभी सुधार की बातें होती हैं, न कि सुशासन के हिस्से के रूप में। मैंने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार का एक इंटरव्यू देखा, जो पीड़िता से मिलने अस्पताल गई थीं।

उन्होंने उस लड़की के साहस और परिवार के सम्मान के बारे में बातें कीं और उम्मीद जताई कि ऐसा कभी भी किसी दूसरी लड़की के साथ न हो। उसके माता-पिता एक निम्न आय वर्ग परिवार से हैं और उनके दो बेटे हैं। उन्होंने अपनी बेटी की डॉक्टरी की शिक्षा के लिए अपनी जमीन बेच दी। आज जब उनकी बेटी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही है, कैसे कोई उन्हें सांत्वना दे सकता है!
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