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विदेश नीति बदलना अक्लमंदी नहीं

पुष्पेश पंत

Updated Wed, 29 Jan 2014 06:27 PM IST
Changing in foreign policy is not wisdom
हमारी सरकार ने अचानक जापान के साथ भारत के रिश्तों की सामरिक संवेदनशीलता का ‘आविष्कार’ कर उसका विज्ञापन आरंभ किया है। कुछ ही महीने पहले जापान के शाही दंपति ने भारत का दौरा किया था और पारंपरिक मैत्रीपूर्ण-तनाव रहित रिश्तों का गुणगान सुनने को मिला था। अब जब गणतंत्र दिवस के अवसर पर जापानी प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि बन पधारे, तो हमें यह समझाया जा रहा है कि समसामयिक जगत में भारत का सबसे भरोसेमंद तथा लाभदायक साझेदार जापान ही हो सकता है; तटरक्षक नौसैनिक वायुयानों का निर्माण हो अथवा परमाणविक भट्ठियां, आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए जापानी आर्थिक तथा तकनीकी सहायता-इन सब की तुलना किसी और देश की संभावनाओं के साथ नहीं की जा सकती। यह सवाल उठाना बेवजह नहीं कि क्या ये सब दावे अब तक के अनुभव के संदर्भ में जायज हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन के आक्रामक, विस्तारवादी रवैये से घबराई हमारी सरकार यह सोच रही है कि चीन के मंसूबों पर अंकुश लगाने के लिए उससे खिन्न और हमारी ही तरह परेशान जापान के साथ संयुक्त मोर्चे का गठन हम कर सकते हैं?
कुछ बातों की याद दिलाना परमावश्यक है। सदियों पहले बौद्ध धर्म के माध्यम से जापान का परिचय भारतीय संस्कृति से हुआ था। भारत को बुद्ध की जन्मभूमि होने के संयोग से तीर्थ माना जाता रहा, यह भी सच है, परंतु आधुनिक काल तक भारत और जापान के बीच उस तरह का कोई आदान-प्रदान नहीं हुआ, जैसा चीन या दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ दिखलाई देता है।

19वीं सदी के अंतिम चरण और 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने अंतरराष्ट्रीय भ्रमण के दौरान जापानी बौद्धिकों-चिंतकों-कलाकारों के साथ संवाद आरंभ किया और जापान की ओर अपने देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया। यह एशियाई विरासत की पड़ताल के उनके प्रयास का हिस्सा था-उभयपक्षीय राजनीतिक या आर्थिक रिश्तेदारी की जमीन तैयार करने की पेशकश नहीं। आजादी की लड़ाई में कुछ भारतीय देशप्रेमी जापान में शरण ले अंग्रेजी उत्पीड़न के खिलाफ संघर्षरत रहे। इस सिलसिले में रासबिहारी बोस से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम याद आते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज का गठन और उसके जांबाज सिपाहियों का बलिदान आज भी प्रेरणा का स्रोत है, परंतु इसे अनदेखा करना कठिन है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बहुमत ‘मित्र राष्ट्रों’ के साथ था, वह जापान को जर्मनी तथा इटली का संधिमित्र होने के कारण नाजी-फासीवादी, साम्राज्यवादी सैन्यीकरण का ही समर्थक-प्रतीक मानता था। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का अनुभव भी जापान के प्रति द्वेष पैदा करने वाला रहा। पहले-पहल यूरोपीय गुलामी से मुक्ति दिलाने के बाद वे खुद नस्लवादी शोषक बन बैठे और अपने इस आचरण के लिए क्षमा याचना के लिए विवश हुए।

परमाणु बम द्वारा हिरोशिमा तथा नागासाकी के विनाश के बाद जापानी विश्व भर में सहानुभूति अर्जित कर सके और अहिंसा का समर्थक भारत जापान के पक्ष में मुखर हुआ। पराजित जापान को अमेरिका ने अपनी संप्रभुता को संकुचित करने के लिए मजबूर किया। वह शीतयुद्ध के वर्षों में अमेरिकी सैनिक अड्डों को अपनी भूमि पर आधार बनाने के लिए तैयार हुआ और अपनी रक्षा के लिए अमेरिकी सैनिक छत्रछाया को भी उसने स्वीकार किया। गुटनिरपेक्ष भारत के साथ सार्थक सहकार की संभावनाए इसके साथ ही समाप्त हो गईं। आर्थिक विकास का मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला जो रास्ता भारत ने चुना, उसका कोई मेल जापान के पूंजीवादी ढांचे से नहीं था। जापान की चमत्कारी आर्थिक प्रगति को अमेरिकी संरक्षण ने संभव बनाया था।

आर्थिक महाशक्ति के रूप में जापान के उदय से अभिभूत देश यह सोचने की फुर्सत नहीं पा सके कि इस चमत्कार की नींव कितनी कमजोर है। जापान ऊर्जा तथा खाद्यान्न के मामले में बुरी तरह निर्भर है। पराजय के बाद सैन्य शक्ति के त्याग के कारण वह इनकी आपूर्ति के लिए अमेरिकी संरक्षण पर निर्भर रहा है। दक्षिण पूर्व एशिया से अमेरिका की वापसी ने मलाका या सुंडा जलमार्गों को उसके लिए निरापद नहीं रहने दिया है। चीन के सात सेनकाकू द्वीप विवाद भी इसी का उदाहरण हैं। इसलिए यह मानना कि चीन का मुकाबला करने में जापान मददगार हो सकता है, भोलापन ही है।

कभी जापानी उपभोक्ता सामग्री-मोटरकार, कैमरा, टेलीविजन या फिर कंप्यूटर- सर्वश्रेष्ठ समझे जाते थे। भारतीय बाजार में सोनी, सुजुकी, होंडा और यामाहा ऐसे ब्रांड थे, जिन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं था। परंतु दशकों से चली आ रही आर्थिक मंदी ने जापान की प्रतिस्पर्धी क्षमता को नष्टप्रायः कर दिया है। कोरियाई तथा चीनी उत्पादों ने आज किफायत की ही नहीं, गुणवत्ता की कसौटी पर भी जापानी माल को विस्थापित कर दिया है।

इसके अलावा कुछ नाजुक मुद्दों पर भारत और जापान के बीच मतभेद बरकरार हैं-मसलन परमाणविक ईंधन की आपूर्ति या परमाणविक संयंत्रों की सुरक्षा। किसी एक शाही दौरे से या उच्च स्तरीय वार्ता से उत्साहित हो जल्दबाजी में विदेश नीति की दिशा बदलना अक्लमंदी नहीं। अचानक जापान की सामरिक उपयोगिता अथवा उसके साथ राष्ट्रीय हितों के संयोग या सन्निपात की बात करना और इसका सार्वजनिक प्रचार चिंताजनक है। चीन आज भी हमारा सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार है और रूस की वरीयता का अवमूल्यन हम नहीं कर सकते। पड़ोस की महत्ता बनी रहती है। जापान का नंबर यूरोपीय समुदाय और तेल उत्पादक देशों के बाद ही आ सकता है।
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