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एमू के जाल में फंसे किसान

मेनका गांधी

Updated Sat, 06 Oct 2012 09:46 PM IST
caught in the trap of emu farmers
आंध्र प्रदेश का एक व्यवसायी 1996 में कुछ एमू पक्षियों को ऑस्ट्रेलिया की मुरगी बताकर कस्टम जांच से बाहर निकलने में सफल हो गया था। हालांकि एमू और मुरगी में जमीन-आसमान का फर्क होता है, मगर रिश्वत देकर आप कुछ भी कर सकते हैं। उसने इन एमू को अपना परिवार बढ़ाने दिया और फिर उनमें से कुछ उसने पोल्ट्री फार्म के मालिकों को दे दिए। और देखते ही देखते अवैध तरीके से आया यह पक्षी पूरे भारत में फैल गया। पशुपालन विभाग से इसकी अनेक बार शिकायतें की गईं, मगर यह विभाग खुद ही इसके कारोबार को बढ़ाने में व्यस्त हो गया। आज स्थिति यह है कि मौजूदा सरकार ने एमू की फार्मिंग को मंजूरी दे दी है। नाबार्ड इसके लिए कर्ज मुहैया कराता है।
यह बीमारी आंध्र प्रदेश से होकर तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गोवा और उत्तराखंड, यहां तक कि गुजरात तक फैल गई। मगर 15 बरसों बाद जब सैकड़ों लोग दिवालिया हो गए, तब जाकर यह एहसास हुआ है कि एमू की फार्मिंग सिर्फ छलावा है। दरअसल कुछ चालाक व्यावसायियों ने किसानों के साथ 'पोंजी स्कीम' के जरिये ठगी की। पोंजी स्कीम एक तरह का धोखा है, जिसमें पुराने निवेशकों को नए निवेशकों से मिलने वाले फंड से भुगतान करने की धोखाधड़ी की जाती है।

आप इसे इस उदाहरण से समझ सकते हैं। इरोड में एम एस गुरु नामक एक व्यक्ति ने सूसी एमू फार्म्स शुरू किया। उसने कुल 12,000 निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की। यह धोखाधड़ी दो तरह से हुई। उसकी कंपनी ने किसानों को एमू के चूजे बेचे और उनको भरोसा दिलाया कि जब ये चूजे बड़े हो जाएंगे, तो कंपनी उनसे उन्हें मोटी रकम देकर वापस खरीद लेगी। इस झांसे में आकर क्षेत्र के अनेक किसानों ने एमू पालने के लिए अपनी खेतिहर जमीन तक बेच दी। सूसी ने लोगों को अपने एमू कारोबार में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित किया और हर महीने हजार रुपये रिटर्न की गारंटी भी उन्हें दी। गुरु को ऑल इंडिया एचीवर्स कांफ्रेंस में आर्क ऑफ एक्सीलेंस (बिजनेस) अवार्ड (2008) और जेम ऑफ इंडिया अवार्ड 2011 से भी नवाजा था।

सूसी फार्म्स में 15 लाख रुपये का निवेश करने वाले ओमाल्लुर के पी सुब्रमणी बताते हैं, 'उन्होंने मुझसे कहा था कि यह काम बहुत आसान है। उन्होंने मुझसे चूजे और चारा देने का वायदा किया। मेरे परिसर में शेड बनाया गया और कहा गया कि यह मुफ्त है, लेकिन मुझे ब्याज रहित सुरक्षा निधि के नाम पर बड़ी रकम जमा करनी पड़ी थी।' 25 और लोगों को निवेश के लिए राजी करने वाले सुब्रमणी आगे बताते हैं, 'समझौते के तहत छह पक्षियों के एक समूह की देखरेख के लिए उन्हें मुझे प्रति माह 7,000 रुपये का भुगतान करना था। मेरे पास ऐसे दस समूह थे। उन्होंने सिर्फ एक बार भुगतान किया। मेरी सुरक्षा निधि भी उन्होंने नहीं लौटाई और कोई कारण भी नहीं बताया।'
सूसी में निवेश करने वालों को दो लाख रुपये जमा करने पड़े थे और बदले में उन्हें 20-20 चूजे दिए गए थे। उन्हें पांच वर्ष में साढ़े छह लाख रुपये लौटाने का वायदा किया गया था।

इरोड जिले के पेरुनथुरई कसबा एमू फार्मिंग का गढ़ कहा जा सकता है, जहां 28 और कंपनियों ने सूसी की तरह जाल बिछाया। पुलिस के आकलन के मुताबिक पूरे राज्य में इस पक्षी की कांट्रेक्ट फार्मिंग से 250 प्रमोटर जुड़े हुए हैं। कोयंबटूर, कृष्णागिरि, पोल्लाची, पेरुंदुरई, धर्मपुरम और सलेम जैसी जगहों में किसानों को लुभाने वाले विज्ञापनों के साथ दर्जनों एमू फार्म शुरू किए गए थे। मगर अब जिला प्रशासन और पुलिस ने एमू फार्मिंग और उसमें निवेश को लेकर आगाह किया है।

तमिलनाडु अकेला उदाहरण नहीं है। पिछले तीन महीने के दौरान पीपुल फॉर एनिमल्स के लोगों ने उत्तराखंड में घूम-घूमकर एमू फार्म का पता लगाया है। नैनीताल के किसानों ने कुछ वर्ष पूर्व एमू ब्रीडिंग शुरू की थी। मगर, एमू तो कहीं नजर नहीं आ रहे हैं, किसान जरूर बरबाद हो गए हैं। किसानों ने उन्हें चारा देना बंद कर दिया, जिससे लाखों की संख्या में इन पक्षियों की मौत हो गई।

कंपनियां दावा करती हैं कि एमू ऐसा पक्षी है, जिसे पालना आसान है, इसका मांस, तेल, चमड़ा यहां तक कि अंडा बहुत प्रसिद्ध है। उनका यह दावा बिलकुल सही नहीं है। हकीकत यह है कि इसका मांस कठोर होता है और उसे पकाने में बहुत मुश्किल होती है। यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया में भी लोग एमू का मांस नहीं खाते। सूसी ने तो एक रेस्तरां भी शुरू किया था, जहां एमू सबसे बड़ा आकर्षण था। मगर यह रेस्तरां नहीं चला।

हकीकत यह है कि एमू को पालना आसान नहीं। छह फीट के इस पक्षी को दिन भर में चार किग्रा खाना चाहिए। यह पक्षी बीज, फल, कीट, छिपकली जैसी चीजें खाता है। एक एमू दिन भर में 10 लीटर पानी पी जाता है। मादा एमू अक्तूबर से मार्च के दौरान अंडे देती है। अमूमन वह तीन से पांच दिन में एक अंडा देती है, जिनमें से कुछ ही बच पाते हैं। उसे सेने के लिए इंक्यूबेटर की जरूरत होती है। 2010 में पंजाब एग्रो टेक ने एमू फार्मिंग का यह कहते हुए प्रचार किया था कि इसके अंडे से बने ऑमलेट पांच सितारा होटलों में 5,000 रुपये तक में बिकते हैं। यह दावा पूरी तरह से गलत साबित हुआ।

एमू कंपनियां अब दावा कर रही हैं कि एमू के तेल, नाखून और पंखों से वे खाना पकाने का तेल और सौंदर्य उत्पाद बेचेंगी! अभी तक एमू के मांस का बाजार नहीं बन पाया है और न ही विदेशों से ऐसी कोई पेशकश है। इसके तेल की प्रोसेसिंग और अन्य औद्योगिक इकाइयां सिर्फ अखबारों में ही हैं।

वर्ष 2010 में इस घोटाले के सामने आने के बाद से पंजाब और महाराष्ट्र के एमू फार्मिंग में उतरे किसान तबाह हो चुके हैं। इसके बावजूद गोवा, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे राज्य एमू फार्मिंग को लगातार बढ़ावा देते जा रहे हैं। बिहार के पशुपालन और मत्स्य विभाग मंत्री ने विश्व बैंक से एमू फार्मिंग शुरू करने के लिए कर्ज मांगा है! भारत में एमू फार्मिंग पर रोक लगाने के लिए आखिर और कितने किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा?
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