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डॉलर का विकल्प खोजता ब्रिक्स

दीपक श्रीवास्तव

Updated Tue, 18 Dec 2012 01:20 AM IST
brics seek dollar alternative
गोल्डमैन सैक्स के चेयरमैन जिम ओ नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह को 2001 में ब्रिक नाम दिया था। बाद में दक्षिण अफ्रीका भी इसमें शामिल हो गया, और इस तरह बिक्र, ब्रिक्स बन गया। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर इन देशों का आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व बढ़ने के कारण सामूहिक रूप से ब्रिक्स वर्ष 2035 तक विश्व के सात प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं वाले संगठन जी-7 की तुलना में ज्यादा बड़ा हो सकता है।
ब्रिक्स में शामिल पांच देशों में तकरीबन तीन अरब लोग निवास करते हैं। इनका सामूहिक सकल घरेलू उत्पाद 137 खरब डॉलर और सामूहिक विदेशी मुद्रा भंडार 40 खरब डॉलर है। ब्रिक्स देशों ने सदस्य देशों में आधारभूत संरचना और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए वित्त मुहैया कराने के लिए संसाधन जुटाने के उद्देश्य से एशियन विकास बैंक और विश्व बैंक की तर्ज पर एक विकास बैंक की उपयोगिता पर अध्ययन करने का निश्चय किया है।

यह प्रयास ब्रिक्स देशों के लिए यूरोप और अमेरिका से जन्मी वैश्विक वित्तीय मंदी से निपटने में मददगार साबित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली में डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए एक बहस चल रही है। अपनी स्थानीय मुद्रा में ऋण सुविधाओं के विस्तार के लिए ब्रिक्स देशों ने एक समझौता किया है।

यह समझौता डॉलर पर निर्भरता को कम करने और डॉलर मूल्य-वर्ग में विदेशी मुद्रा भंडार रखने के अवसर लागत में मददगार साबित हो सकता है। इस समझौते के लागू हो जाने की स्थिति में, एक भारतीय आयातक, ब्राजील के निर्यातक को अपना भुगतान रुपये को डॉलर में बदले बगैर, उसी रूप में कर सकता है और फिर इसे ब्राजीलियन मुद्रा में दोबारा बदला भी जा सकता है।

वास्तव में, निर्यात प्रतिस्पर्धा में मजबूत बने रहने के लिए ब्रिक्स देशों ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करके अमेरिकी डॉलर के रूप में अतिरिक्त विदेशी मुद्रा भंडार जमा कर लिया है। डॉलर विश्व में गैर-आधिकारिक मुद्रा भंडार है और विश्व के विदेशी-विनिमय भंडार में उसकी हिस्सेदारी तकरीबन 62 फीसदी है। इसी कारण अमेरिका सस्ते दर पर ऋण प्राप्त करता है।

डॉलर की कीमत में गिरावट के कारण अमेरिका अपनी कुल विदेशी ऋण ग्रस्तता को समायोजित करने में सक्षम है। डॉलर की कीमत में गिरावट से अमेरिका का पूंजीगत लाभ काफी व्यापक हुआ है और उसकी कुल ऋण स्थिति में कमी आई है। अमेरिका की तकरीबन 70 फीसदी विदेशी संपत्तियां विदेशी मुद्रा में हैं, जबकि उसकी तकरीबन सभी विदेशी देनदारियां डॉलर में हैं। जब प्रमुख मुद्राओं की तुलना में डॉलर के मूल्य में गिरावट होती है, तो ऋण की कीमत में भी कमी आती है और उसकी संपत्ति की कीमत में वृद्धि होती है।

अमेरिका का फेडरल बैंक, जो वास्तव में विश्व का केंद्रीय बैंक है, आयात के लिए डॉलर की छपाई कर सकता है, जबकि विश्व के बाकी देशों को पहले इसे अमेरिका को निर्यात करना होता है और फिर अत्यधिक उपभोग के कारण घाटे की भरपाई के लिए अमेरिकी ट्रेजरी बिल में निवेश करना होता है। इसके अलावा विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को यह भी चिंता है कि अमेरिकी घाटा और और यूरोपीय देशों का विशाल ऋण विश्व अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकता है।

लिहाजा मौद्रिक स्थायित्व को बरकरार रखने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए ब्रिक्स देशों के लिए एक विकास बैंक की स्थापना करना आवश्यक है। यह कदम विश्व की सर्वाधिक उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच घनिष्ठ आर्थिक संबंधों और आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के मामले में काफी मददगार साबित हो सकता है।

ब्रिक्स देश विभिन्न महाद्वीपों में जल्दी अपने पांव जमाने में सक्षम हो सकते हैं। अमेरिका और यूरोप से जन्मी वैश्विक आर्थिक मंदी ने विश्व के बाकी देशों को दक्षिण-दक्षिण सहयोग को और तेज करने की वजह दे दी है। जहां तक भारत का प्रश्न है, वह दक्षिण-दक्षिण सहयोग के विस्तार और अन्य सदस्यों के साथ सहयोग के लिए ब्रिक्स को एक शानदार अवसर उपलब्ध करा सकता है।
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