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ब्रेग्जिट का असर दिखने लगा है

फिलिप लेगरैन

Updated Tue, 28 Jun 2016 08:18 AM IST
Brexit outcome reflected

Will Brexit Impact India?

ब्रिटेन में जनमत संग्रह से कुछ सप्ताह पहले यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्षधर माइकल गोवे से पूछा गया था कि विशेषज्ञ अर्थशास्त्रियों और वैश्विक दिग्गजों की राय को दरकिनार कर आप लोग अलग होना क्यों चाहते हैं। गोवे का जवाब था,' ब्रिटेन में अनेक विशेषज्ञ हैं।'
बेशक विशेषज्ञ भी गलती करते हैं। लेकिन इस मामले में जिन लोगों ने ब्रेग्जिट के पक्ष में वोट किया, वे अपने आर्थिक अज्ञान की बहुत बड़ी कीमत चुकाने वाले हैं। ब्रिटेन की हालत खराब होने लगी है। अभी तक पाउंड डॉलर की तुलना में नौ प्रतिशत गिर चुका है। इससे ब्रिटेन में संपत्तियों के दाम गिरेंगे, और आयात भी महंगा होने जा रहा है। शेयर बाजार ने गोता लगाया है। देश की वित्तीय व्यवस्था को सहारा देने के लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर मार्क कार्ने अभी तक 250 अरब पाउंड झोंक चुके हैं।

ब्रिटेन में हाल के दौर में ऐसी कारोबारी अनिश्चितता शायद ही देखी गई है। वहां की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गई है, क्योंकि जनमत संग्रह से पहले ही वहां निवेश के नए निर्णय टाल दिए गए थे। अपनी राजनीतिक और न्यायिक स्थिरता के लिए चर्चित देश अराजक दौर में पहुंच गया है। न भविष्य के प्रधानमंत्री के बारे में कुछ मालूम है, न उनकी नीतियों के बारे में। डेविड कैमरन की जगह लेने वालों में सबसे आगे चलने वाले और लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने अपनी छवि बाजार और उदारीकरण समर्थक की बनाई थी, पर जनमत संग्रह की वोटिंग के दौरान उन्‍होंने कहा कि वह यूरोपीय संघ से आने वाले आप्रवासियों पर अंकुश लगाने के पक्ष में हैं। यह तय नहीं है कि भविष्य में यूरोपीय संघ और दूसरे देशों से ब्रिटेन का कारोबार कैसे होगा। वित्त से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक की नीतियां बदल सकती हैं। स्कॉटलैंड की आजादी के मुद्दे पर दूसरे जनमत संग्रह की बात चल रही है, और इस बार शायद स्कॉटों को आजादी मिल जाए। उत्तर आयरलैंड में एकजुट आयरलैंड के मुद्दे पर जनमत संग्रह की बात की जा रही है। ऐसे अनिश्चय के बीच कारोबार का सुस्त होना तय है। इससे सरकार का बजट घाटा और अधिक हो जाएगा। पाउंड में आई गिरावट से निर्यात बेहतर होने की जो संभावना जताई जा रही है, उस पर बहुत भरोसा नहीं होता। 2008 में पाउंड में आई गिरावट से निर्यात में फायदा नहीं हुआ था।

ब्रेग्जिट के समर्थकों का दावा है कि ब्रुसेल्स के अति नियमन और संरक्षणवाद से आजाद हो जाने के बाद विनियमित ब्रिटेन को दूसरे देशों के साथ कारोबार में लाभ होगा। लेकिन चूंकि यूरोपीय संघ में ब्रिटेन का श्रम बाजार सबसे कम विनियमित, और उसके उत्पादों का बाजार सबसे कम विनियमन के मामले में दूसरे स्थान पर है, ऐसे में विनियमन का जो भी लाभ ब्रिटेन को मिलेगा, वह मामूली ही होगा। ब्रिटेन के युवाओं, उच्च शिक्षितों और शहरी लोगों ने, जो ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का सबसे प्रभावी हिस्सा है, यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में वोट किया था। पर उन बुजुर्गों, कम शिक्षितों और ग्रामीणों ने उन्हें हरा दिया, जो करदाताओं की दया पर निर्भर हैं। चूंकि अब ब्रिटेन में आर्थिक संभावनाएं सिकुड़ेंगी, ऐसे में यूरोपीय संघ के विरोधियों के फैसले की; जो मेहनती और कर दाता यूरोपीय संघ के नागरिकों को ही सारी मुश्किलों का जिम्मेदार ठहराते आए थे, कीमत पूरे ब्रिटेन को चुकानी पड़ेगी।
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