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बाजार पर एकाधिकार टूटेगा

अजय वीर जाखड़

Updated Thu, 27 Sep 2012 10:56 PM IST
आज देश भर की मंडियों में आढ़तियों का कब्जा है। उनका एकाधिकार पूरे बाजार पर है और किसानों को उनकी फसलों के सही दाम नहीं मिल पाते हैं। यह अन्याय सालों से होता आ रहा है। मगर, किसानों के पास और कोई दूसरा माध्यम नहीं है, जहां वे अपना माल बेच सकें।
वॉलमार्ट जैसी रिटेल कंपनियों के आने से आढ़तियों का एकाधिकार टूट सकता है और इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। आढ़तियों और कंपनियों में से जो भी बेहतर दाम देगा, उसी को किसान माल बेचेंगे। ऐसे में किसानों को फसलों के अच्छे दाम मिलने की पूरी उम्मीद है। किसान से माल सीधा खरीदा जाएगा, तो उसे फायदा ही होगा।
 
आशंकाएं जताई जा रही हैं कि विशालकाय रिटेल कंपनियों का सामना परंपरागत बाजार के व्यापारी नहीं कर पाएंगे और करोड़ों लोगों का रोजगार छिन जाएगा। भारत के पारंपरिक बाजार और उसकी ताकत को देखकर ये आशंकाएं अतिरंजित लगती हैं।

किसानों को इससे मतलब नहीं है कि उनका माल खरीद कौन रहा है, वे तो बस यह चाहते हैं कि उन्हें उनकी फसलों के अच्छे दाम मिलें। फिर चाहे अमेरिकी कंपनी माल खरीदे, या रूस की या फिर इंग्लैंड की। नहीं भूलना चाहिए कि हमारी और यूरोप या अमेरिका की परिस्थितियां बिलकुल अलग हैं और उनके और हमारे यहां खेती में भी फर्क है।

इसलिए अमेरिका में यदि वॉलमार्ट के खिलाफ विरोध हो रहा है या वहां उसे बेरोजगारी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, तो जरूरी नहीं कि उसका वैसा ही असर हमारे यहां भी हो। किसी एक देश का मॉडल दूसरे में लागू नहीं किया जा सकता। कोई चीज अगर पंजाब में कामयाब है, तो जरूरी नहीं है कि महाराष्ट्र में भी वह सफल ही हो। इसी तरह अमेरिका या यूरोप में अगर वॉलमार्ट, सेंसबेरी या टेस्को जैसी कंपनियां फेल हुई हैं, तो इससे यह मान लेना कि भारत में भी वे नाकाम होंगी, सही नहीं है।

उन देशों में खेती का तरीका और उनकी प्राथमिकताएं हमसे बिलकुल अलग हैं। यह भी तो देखना चाहिए कि हमारे देश की परिस्थितियों में अगर किसी मॉडल के सफल होने की उम्मीद है, तो उससे परहेज क्यों किया जा रहा है! इसलिए दूसरे देशों के अनुभव के आधार पर हमेशा अपने देश की नीतियां नहीं बनाई जा सकतीं।

पैसा कमाना अगर सचमुच इतना आसान होता, तो बिग बाजार और रिलायंस जैसी कंपनियां तो यहां पहले मौजूद हैं और वे खूब पैसा कमा रही होतीं। हकीकत यह है कि ऐसा नहीं हो पा रहा है। यही चुनौती वॉलमार्ट, टेस्को, कारफूर या सेंसबेरी जैसी कंपनियों के सामने भी होगी और उन्हें भारत के किसानों के साथ ही यहां के उपभोक्ताओं की उम्मीदों पर भी खरा उतरना होगा। और बाजार में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी।

एक सवाल उठ सकता है कि हम अपनी परंपरागत बाजार व्यवस्था को आखिर ठीक क्यों नहीं कर लेते? लेकिन परंपरागत व्यवस्था को ठीक होना होता, तो अब तक वह सुधर चुकी होती। आढ़तियों के दबदबे के कारण इसमें सुधार ही नहीं हो पाता। जो लोग शोर मचा रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि इससे किसानों को कोई नुकसान होने वाला नहीं है। बल्कि इसे उम्मीद की किरण की तरह देखना चाहिए। हम यह भी नहीं चाह रहे कि बिचौलिये खत्म हो जाएं, क्योंकि ऐसा होगा तो पूरा सिस्टम प्रभावित होगा और प्रतिस्पर्धा की बात धरी रह जाएगी। किसान के लिए भी यह संभव नहीं है कि वह शहर जाकर अपना माल पहुंचाए।

कुछ लोगों का तर्क है कि सुपर मार्केट किसानों को अच्छे दाम नहीं देते, जबकि खुले बाजार की अपेक्षा वे उपभोक्ताओं से 20-25 फीसदी तक अधिक कीमत वसूलते हैं। लेकिन अभी क्या उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई गई कीमत उत्पादकों तक पहुंच रही है? इसका जवाब सबको पता है। इसलिए एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उपभोक्ताओं द्वारा दिए जाने वाले मूल्य में किसानों को भी पर्याप्त हिस्सेदारी मिले।

आढ़तियों का एकाधिकार टूटने से इस बात की पूरी संभावना नजर आती है। अगर कोई कहता है कि सिर्फ उम्मीद के बूते देश के 78 प्रतिशत छोटे किसानों को रिटेल कंपनियों की दया पर छोड़ दिया जा रहा है, तो यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सब्जी उत्पादन का काम छोटा किसान और उसका परिवार ही करता है।

दो से चार एकड़ का किसान ही सब्जी उगाता है। बडे़ किसान तो गेहूं और चावल जैसी फसलों की खेती अधिक करते हैं, जिसे एफसीआई सीधे खरीद लेती है। अब बात आती है कि कंपनियां छोटे किसानों से माल नहीं खरीदती हैं, जिसके लिए हम मांग कर रहे हैं कि एक शर्त होनी चाहिए कि 75 फीसदी माल छोटे किसानों से ही रिटेल कंपनियां खरीदें।

यह कहना सही नहीं है कि रिटेल एफडीआई के दरवाजे खोलने से हम अपनी पूरी व्यवस्था कंपनियों के हवाले कर देंगे। आखिर किसी दुकानदार को दुकान खोलने की इजाजत देने से भला पूरी व्यवस्था उसके हवाले कैसे हो सकती है! एक सवाल यह भी है कि जिन देशों की ये रिटेल कंपनियां हैं, अगर ये वहां फायदा नहीं पहुंचा पा रही तो भारत में ये आखिर कैसे फायदा पहुंचाएंगी! वास्तव में हमारे किसानों के लिए यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं है।  

चीन में तो छोटे और बडे़ हर तरह के स्टोर चल रहे हैं। वहां तो कोई शोर नहीं मच रहा है। इसलिए गिलास आधा खाली है, तो आधा भरा भी है। आंकड़ों से किसानों को कोई मतलब नहीं है, वह तो सिर्फ उम्मीद पर ही जीता है और खुदरा में एफडीआई से भी एक उम्मीद की जानी चाहिए।
(लेखक ‘भारत कृषक समाज’ के चेयरमैन हैं। )
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