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भारत को इस तरह भी देखें

सुदीप ठाकुर

Updated Sun, 09 Dec 2012 02:55 PM IST
book review by sudeep thakur
वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद महात्मा गांधी ने ट्रेन के तीसरे दरजे में सफर करते हुए पूरे भारत का भ्रमण किया था। वह दक्षिण अफ्रीका में औपनिवेशिक शासन से लंबी लड़ाई लड़कर लौटे थे और अपने देश को करीब से देखना-समझाना चाहते थे।
उनकी यात्रा के करीब 95 बरस बाद भारतीय मूल की लंदनवासी युवा पत्रकार मोनिशा राजेश ने भी इस देश को करीब से देखने के लिए ट्रेनों का सहारा लिया।

मगर वह, गांधी की रेल यात्रा से नहीं, बल्कि 1873 में आए फ्रेंच लेखक जूल्स वर्ने के रोमांचक उपन्यास अराउंड द वर्ल्ड इन 80 डेज से प्रभावित हैं, जैसा कि उनकी किताब के शीर्षक अराउंड इंडिया इन 80 ट्रेन्स से स्पष्ट भी है।
खुद मोनिशा ने यह स्वीकार भी किया है कि उन्हें किताब लिखने की प्रेरणा फ्रेंच क्लासिक से ही मिली थी। दक्षिण भारतीय मूल की लेखिका की यह यात्रा कुछ हद तक अपनी जड़ों को तलाशने जैसी भी है।   



वाकई भारत को देखने-समझने के लिए यहां की ट्रेन यात्राओं से अच्छा जरिया कुछ हो भी नहीं सकता। रेल यात्राओं पर हिंदी में कविताएं और कहानियां खूब लिखी गई हैं। कुछ बरस पहले तक स्कूलों में तो मेरी पहली रेल यात्रा शीर्षक से निबंध भी लिखवाया जाता था।

भारतीयों के लिए रेल यात्रा उनकी जरूरत तो है ही, मगर वह उनके लिए किसी रोमांच से कम नहीं। अलबत्ता, देश में रेल संरचना का विस्तार जितना होना चाहिए उतना नहीं हो सका है, जबकि रोजाना दो करोड़ से ज्यादा लोग ट्रेनों से सफर करते हैं।   

इसे मोनिशा की दीवानगी कहिये या कुछ और कि उन्होंने जनवरी, 2010 से चार महीने तक ताबड़तोड़ 80 ट्रेनों में 40,000 किमी का सफर तय कर डाला। यह दूरी पृथ्वी का पूरा एक चक्कर लगाने के बराबर है!
चेन्नई-कन्याकुमारी एक्सप्रेस से उन्होंने तमिलनाडु की राजधानी से देश के दक्षिणी छोर तक की यात्रा से अपना यह सफर शुरू किया था और इसका समापन हैदराबाद से चारमीनार एक्सप्रेस से चेन्नई लौटकर किया।

इस दौरान वह कन्याकुमारी से लेकर उधमपुर, गोवा, मुंबई, अहमदाबाद से लेकर पुरी, कोलकाता और गंगटोक तक की यात्राएं कर आईं। भारत में आज जितनी भी तरह की यात्री ट्रेनें चल रही हैं, उनमें से तकरीबन सभी में उन्होंने यात्रा की।

राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस, महाराजा डक्कन ओडेसी, दुरंतो, संपर्क क्रांति, पैलेस ऑन व्हील, लाइफलाइन एक्सप्रेस, टॉय ट्रेन से लेकर मुंबई की लोकल ट्रेन और दिल्ली की मेट्रो तक।

खास विदेशियों के लिए चलने वाली लक्जरी ट्रेन के कूपे से लेकर भीड़ भरी पैसेंजर ट्रेनों में। इस सफर में उन्हें वे सारे अनुभव हुए, जिनसे आम रेल यात्रियों को रोज दो चार होना पड़ता है।

यही वजह है कि उन्हें कभी उमरिया जैसे छोटे से स्टेशन में अगले सफर के लिए कुछ घंटे इंतजार करना पड़ा, तो शुरुआती चरण में ही टिकट दलाल ने उन्हें झटका दे दिया। मोनिशा इस सफर में हमें दक्षिण भारत के मंदिरों से लेकर खजुराहो और पुणे स्थित ओशो कम्यून तक ले जाती हैं।

उनके मुताबिक, 'भारतीय ट्रेनों की यात्रा में ऐसा बहुत कुछ है, जो उन्हें दुनिया की अन्य ट्रेन यात्राओं से अलग बनाता है। भारत में ट्रेन के सफर में लोगों की साथी यात्रियों से बातचीत की कोशिश, उनके साथ ताश खेलना, अपनी जिंदगी की कहानियां और अनुभव बताना और ऐसा ही बहुत कुछ है।

लेकिन मुझे खुद ट्रेन के दरवाजे पर बैठकर बाहर प्रकृति का सौंदर्य निहारते हुए सफर करना सबसे अच्छा लगा। इस सौंदर्य को देखकर मुझे लगा कि भारत में कितनी खूबसूरती है।'

उनकी भाषा चुटीली है और वह अपने साथी फोटोग्राफर पर, जिसे वह लंदन से साथ लेकर आई थीं, कटाक्ष करने से भी गुरेज नहीं करतीं।

बेशक, यह महंगा प्रोजेक्ट रहा होगा, जिसका जिक्र उन्होंने नहीं किया है। मगर वह यह सफर बोझिल नहीं होने देतीं। ट्रेन के अगले सफर में आप चाहें, तो यह किताब साथ में रख सकते हैं। 
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