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हार का ठीकरा ईवीएम पर

तवलीन सिंह

Updated Mon, 20 Mar 2017 08:04 AM IST
 Blame of defeat on EVMs

तवलीन सिंह

चुनाव हारने वाले राजनेताओं की प्रतिक्रिया सुनकर हंसना चाहिए या रोना? परिणाम आने के बाद राहुल गांधी तीन दिन अदृश्य रहे। लौटे तो पत्रकारों को संबोधित करते दिखे। उन्होंने कहा कि भाजपा ने गोवा और मणिपुर में चुनाव चोरी किए हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बारे में उन्होंने स्वीकार किया कि हां, इन राज्यों में ‘थोड़ा सा नुकसान’ हुआ है। पंजाब के बारे में ज्यादा नहीं बोले, क्योंकि वह जानते हैं कि वहां जीत का श्रेय सिर्फ और सिर्फ कैप्टन साहब को जाता है। उनकी अपनी भूमिका रही, तो सिर्फ नुकसानदेह, क्योंकि आखिरी समय तक अमरिंदर सिंह का नाम भावी मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं घोषित किया गया था।
हम राहुलजी का ‘थोड़ा-सा नुकसान’ वाला बयान हजम कर ही रहे थे कि कांग्रेस के अतिवरिष्ठ नेता, कमलनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को अगर हिसाब में से निकाल दिया जाए, तो कांग्रेस हारी नहीं, जीती है इन चुनावों में। इस अजीब-ओ-गरीब बयान पर मेरे दोस्त सदानंद धूमे ने ट्वीट किया कि अगर जाड़ों के मौसम में से सर्दी को निकाल दिया जाए, तो मौसम गर्मियों का बन जाता है। रही बात क्षेत्रीय राजनेताओं के बयानों की, तो वास्तव में रोना ही आता है। सिलसिला शुरू किया मायावती जी ने परिणाम के दिन। सीधे प्रधानमंत्री पर ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगाते हुए मांग की कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव दोबारा करवाए जाएं। ईवीएम में गड़बड़ी होने का आरोप लालू यादव ने भी लगाया, यह भूलकर कि जब उनका गठबंधन बिहार में जीता था, तो उस समय उन्हें कोई गड़बड़ी नहीं दिखी थी।

इस बहस में दिल्ली के मुख्यमंत्री देर से कूदे, पर आरोप वही ईवीएम वाला लगाया, जैसे भूल चुके हों कि यह आरोप यदि लगना चाहिए, तो दिल्ली के चुनावों को लेकर, जहां उनकी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर सबको हैरान कर दिया था। इस जीत के बाद केजरीवाल की आकांक्षाएं आसमान छूने लगी थीं और फिर से वह प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने लग गए। इस बार दिल्ली का मुख्यमंत्री होने के बावजूद उन्होंने कई महीनों से अपना तमाम समय पंजाब में बिताया। पत्रकारों ने उनके हौसले इतने बुलंद कर दिए कि उन्होंने तकरीबन एलान कर दिया कि पंजाब तो आम आदमी पार्टी किसी हाल में नहीं हारेगी। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तो ईवीएम पर दोष लगाया।

इन राजनेताओं की बातें सुनकर लगता है कि न उन्होंने चुनाव में उतरने से पहले यथार्थ को पहचाना था और न अब पहचान रहे हैं। स्वीकार करना जरूरी है कि यथार्थ को धुंधला करने में हम पत्रकारों ने इस बार अहम भूमिका अदा की थी। हमने पंजाब में केजरीवाल को जिताया, तो उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन को। सच यह है कि उत्तर प्रदेश के देहातों में न बिजली का भरोसा है, न पानी की सुविधा, न स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ है और न सड़कें बनी हैं। अखिलेश यादव ने हाइवे जरूर बनाया, लेकिन इससे उन लोगों को कोई लाभ नहीं हुआ, जिनके पास साइकिल भी नहीं है, मोटर गाड़ियां तो दूर की बात।

जो हो गया, सो हो गया, पर क्या अब समय नहीं आ गया है कि हारने वाले यथार्थ को पहचान कर आगे बढ़ें? यह कहने का समय भी आ गया है कि अब भी जो लोग यथार्थ का सामना नहीं करते, उनके लिए बेहतर होगा कि राजनीति छोड़ दूसरी लाइन में सफलता पाने की कोशिश करें। खासकर यह सुझाव मैं अखिलेश यादव को देना चाहती हूं, जिन्होंने मतदाताओं का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘वोट काम करने वालों को नहीं मिलता है, बहकाने वालों को मिलता है।’
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