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सही नहीं नकद सबसिडी का आधार

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Mon, 03 Dec 2012 08:10 AM IST
base of cash subsidy is not right
सबसिडी का सच यह है कि गरीबों के लिए दी जाने वाली यह सरकारी मदद आम तौर पर गंतव्य पर नहीं पहुंच पाती। योजना आयोग के मुताबिक, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से एक रुपये की सबसिडी पहुंचाने के लिए सरकार को चार रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। कुछ अर्थशास्त्री सबसिडी की नीति को इसलिए सही नहीं मानते, क्योंकि इससे वस्तुओं की कीमत कम हो जाती है। नतीजतन लोग उसका अधिक उपयोग करने लगते हैं। सामान्यतः सबसिडी वाली वस्तुएं ऐसी होती हैं, जिनकी कमी होती है। मसलन, पेट्रो उत्पादों के लिए हम आयात पर निर्भर हैं। डीजल पर सबसिडी देने के कारण इसका अनुचित इस्तेमाल भी होता है। इससे सरकार पर सबसिडी का बोझ बढ़ता है, आयात पर निर्भरता भी बढ़ती है।
खाद्य सबसिडी की बात करें, तो 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक की सबसिडी देने के बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से आम आदमी को अच्छा अनाज और चीनी बाजार से कम कीमत पर नहीं मिल पाती। यदि प्रत्येक बीपीएल उपभोक्ता को 1,000 रुपये की नकद सबसिडी दी जाए, तो वह बाजार से वस्तु खरीद कर महंगी कीमत की भरपाई कर पाएगा। यदि देश में 40 करोड़ बीपीएल उपभोक्ता हों, तो कुल सबसिडी 40 हजार करोड़ रुपये की होगी और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का कुछ भला हो पाएगा।

नकद सबसिडी की शुरुआत इसी पृष्ठभूमि में हो रही है। सूचना प्रौद्योगिकी के युग में उपभोक्ताओं के खाते में नकद पैसे भेजना कठिन काम नहीं रहा। रोजगार गारंटी योजना के तहत कई जगह मजदूरी बैंक खाते में सीधे भेजी जाती है, विधवाओं एवं बुजुर्गों को पेंशन राशि बैंक में दी ही जाती है। गरीबी रेखा से नीचे के लाखों लोगों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ स्मार्ट कार्ड के जरिये पहुंच रहा है। सरकार की सबसिडी केवल खाद्य वस्तुओं तक सीमित नहीं है। पेट्रोलियम उत्पाद और उर्वरक इस सबसिडी के अन्य महत्वपूर्ण हिस्से हैं। लेकिन अभी सरकार इन सबसिडियों को समाप्त करने की बात नहीं सोच पाई है। जाहिर है, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो नकद सबसिडी योजना को मूर्त रूप देना असंभव नहीं। लेकिन सरकार जिस रूप में इसे लागू करने जा रही है, उसकी सफलता पर संदेह स्वाभाविक है।

दरअसल यह योजना आधार पर आधारित होगी। यूआईडी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुताबिक, आधार योजना के तहत जो यूआईडी क्रमांक दिया जाएगा, उसके तहत सबसिडी को लाभार्थी के बैंक खाते में भेजा जा सकेगा। हेराफेरी की सूरत में लाभार्थी सरकार से शिकायत भी दर्ज करा सकेंगे। अथॉरिटी ने सरकार को इस योजना के क्रियान्वन के लिए योजना भी बनाकर दी। इस संदर्भ में राजस्थान के अलवर जिले से प्राप्त अनुभवों को सरकार की नकद सबसिडी योजना के अंतिम प्रारूप में शामिल किया गया है।

आधार योजना देश में कुछ समय पहले शुरू की गई थी और उसके लिए यूआईडी अथॉरिटी की भी स्थापना हुई। देश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपना आधार कार्ड बनवा सकता है, लेकिन दूसरे देशों के नागरिक भी धड़ल्ले से आधार कार्ड बनवा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पड़ोस के बांग्लादेश में भारी गरीबी के कारण वहां से बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर यहां बसते हैं। चूंकि वे लोग राजनीतिक पार्टियों के वोट बैंक हैं, ऐसे में उन्हें यहां तमाम तरह की सुविधाएं मिलती हैं। नकद सबसिडी के लिए आधार की अनिवार्यता होगी, तो इस योजना का लाभ उन्हें भी मिलेगा। नतीजतन न सिर्फ राजस्व का एक बड़ा हिस्सा देश के वास्तविक गरीबों तक नहीं पहुंच पाएगा, बल्कि सबसिडी का बोझ भी शायद ही घटेगा। अभी इसका लाभ मध्यवर्ग और अमीर उठा रहे हैं, नकद सबसिडी में विदेशी नागरिक उठाएंगे। इसलिए नकद सबसिडी का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड की नहीं, नागरिकता प्रमाण पत्र की अनिवार्यता होनी चाहिए। आज हमारे देश में गरीबों की सही पहचान भी नहीं हो पा रही। ऐसे में गरीबों के लिए आवंटित राशि का लाभ उन तक नहीं पहुंच पाता। नकद सबसिडी की जल्दबाजी में गरीब की पहचान का मुद्दा भुला दिया गया है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
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