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कम पानी वाली खेती चाहिए

सुमन सहाय

Updated Fri, 19 Oct 2012 06:16 PM IST
artilcle of suman sahay on agriculture
अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा जारी वैश्विक भूख सूचकांक की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि अच्छी आर्थिक विकास दर के बाद भी भारत वैश्विक भूख सूचकांक में अपनी स्थिति सुधारने में पीछे रहा है। वह इस मामले में चीन, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से पिछड़ गया है और 79 देशों की सूची में उसे 65वां स्थान मिला है।
'भूखे' देश की कुछ ऐसी ही तसवीर द इंडियन स्टेट हंगर इंडेक्स (भारतीय राज्य भूख सूचकांक) में भी दिखती है, जिसके तहत 17 राज्यों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि 12 राज्यों में भूख की 'भयावह' स्थिति है। इसमें मध्य प्रदेश की स्थिति तो और भी बुरी है, जिसे 'अत्यधिक भयावह' की सूची में रखा गया है। ग्रामीण भारत की करीब 87 फीसदी आबादी को न्यूनतम कैलोरी नहीं मिल पाती। दूसरी ओर, गोदामों में अनाज सड़ने की खबरें आती रहती हैं।

कहना अतिशयोक्ति नहीं कि हमारे देश में खाद्यान्न की उपलब्धता घटी है। आजादी के तुरंत बाद, 1950 से लेकर 1964 के दौरान, यह प्रति व्यक्ति सालाना 140 से 170 किलोग्राम के बीच थी। वर्ष 1979 से लेकर 1994 के दौरान यह बढ़कर 180 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना तक पहुंच गई। पर आर्थिक सुधारों के दौरान खाद्यान्न उपलब्धता तेजी से घटी और यह 150 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना रह गई।

खाद्यान्न की उपलब्धता और जरूरत के बीच गिरावट आई है। मौजूदा कृषि संकट के आधार पर आकलन करें, तो खाद्य उपलब्धता की यह प्रवृत्ति उन समुदायों के लिए गंभीर खतरा है, जो पहले ही भूख से जद्दोजहद कर रहे हैं। असल में, आर्थिक सुधारों ने कृषि क्षेत्र में निवेश खत्म कर दिया, जिसका देश की दो-तिहाई से अधिक उस आबादी पर विपरीत असर पड़ा, जो अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। किसान तक भूख से लड़ रहे हैं, क्योंकि खेती की लागत और कृषि उत्पादों पर गैर-पारिश्रमिक बोझ बढ़ गया है।

इस विकट परिस्थिति में बदलती जलवायु नई चुनौती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मौसम में परिवर्तन से दक्षिण एशिया में खेती-बाड़ी बुरी तरह प्रभावित होगी और तापमान बढ़ने के साथ कृषि उत्पादन 40 फीसदी तक नीचे गिर जाएगा। लिहाजा खेती पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से लड़ने के लिए हमें अपनी भूमि, जल और जैव-विविधता के प्रबंधन में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें अपने किसानों को जागरूक करना होगा और उनके लिए सार्वजनिक शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना होगा, ताकि वे जलवायु परिवर्तन से होने वाले बदलावों का मुकाबला कर सकें।

इसके अतिरिक्त कृषि क्षेत्र के विस्तार में आने वाली रुकावट को भी अविलंब दूर कर विस्तार-कार्यक्रम को गति देने की जरूरत है। कृषि के आसन्न संकट और उसके कारणों को समझने में प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण कार्यक्रम मदद करेंगी। फिलहाल ग्रामीण समुदायों में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर जानकारी का अभाव है और उन्हें उन अप्रत्याशित मौसमी बदलावों से सामंजस्य बिठाने में मुश्किलें आ रही हैं, जो खेती के उनके पारंपरिक तरीकों को बिगाड़ रहा है।

ऐसे में विस्तार-कार्यक्रम किसानों को शिक्षित करेगा कि कैसे नई मौसमी परिस्थिति में कृषि से सामंजस्य बिठाना है। इसके साथ खाद्यान्न उत्पादन की बुनियादी रणनीति में भी बदलाव करना होगा। मशीनी या अत्यधिक पानी की मांग वाली खेती के बजाय हमें टिकाऊ खेती को अपनाना होगा, जिसमें कम पानी लगे। सूखे से निपटने के लिए 'पानी की हर बूंद से अधिक फसल' जैसी रणनीति को स्वीकार करना होगा। ऐसी ही पहल ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से लड़ने के लिए जरूरी है।

आज जब मानसून में कम बारिश होने लगी है और उसकी कोई निश्चितता नहीं होती अथवा पिघलते ग्लेशियर का पानी नदियों में जा रहा है, तब किसानों को उपलब्ध पानी के अधिक इस्तेमाल का तरीका अवश्य जानना चाहिए। वर्षा जल से कृषि और तालाब, कुएं और पोखर जैसी पारंपरिक जल-संग्रहण संरचना को पुनर्जीवित करना होगा। सभी पारिस्थितिक तंत्र में प्राथमिकता के आधार पर वाटरशेड का विकास और तालाब को पुनर्जीवित करने जैसे कार्यक्रम को मंजूरी मिलनी चाहिए। इससे अनिश्चित बारिश की स्थिति में तालाबों, कुओं और पोखरों में मौजूद पानी फसलों के लिए संजीवनी होगा।
 
मिट्टी में पोषण और जल धारण क्षमता को बेहतर बनाने के लिए मृदा प्रबंधन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। फलीदार पौधों की झाड़ियों की तरह रोपाई जरूरी है, ताकि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्र नियत रहे, मृदा-क्षरण पर लगाम लगे और मिट्टी की नमी बरकरार रहे। मिट्टी का क्षरण रोकने और उसकी नमी बरकरार रखने के लिए उसे खर-पतवारों से आवृत रखना भी एक जरूरी कदम हो सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेतों में जल-धारण क्षमता बढ़ाने और उत्पादन बेहतर करने के लिए मेड़ बनाना फायदेमंद होगा।

यह मेड़बंदी ही है, जिसने पश्चिम अफ्रीका के बुर्किना फासो में बेकार मिट्टी को पुनर्जीवित किया और कृषि उत्पादन को पहले ही वर्ष करीब 40 फीसदी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अगर खाद्यान्न सुरक्षा को हम संभव बनाना चाहते हैं, तो हमें उन सब तरीकों को आत्मसात करना होगा, जो कहीं भी-किसी भी क्षेत्र में सफलतापूर्वक चल रहे हैं, और उसकी जानकारी लघु किसानों को, विशेष तौर पर सिंचित क्षेत्रों में रहने वाले किसानों तक पहुंचानी होगी।
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