आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

जाति से लड़ने का उद्यम

सुभाष गाताडे

Updated Wed, 24 Oct 2012 08:23 PM IST
article of  Subhash Gatade
जाति के खिलाफ क्या पूंजी से लड़ा जा सकता है? पिछले दिनों लखनऊ में आयोजित दलित उद्यमियों के एक संगठन दलित इंडिया चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज, अर्थात डिक्की के सम्मेलन में यही सवाल केंद्र में रहा। सम्मेलन में दलित पूंजीवाद की मुहिम के समर्थकों का कहना था कि अब दलितों को वित्तीय सहायता या आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वे बड़े कॉरपोरेट और उद्योगपतियों के साथ पार्टनरशिप करने के लिए तैयार हैं।
चाहे लखनऊ में आयोजित सम्मेलन हो या डॉ. अंबेडकर की 121वीं जयंती के उपलक्ष्य में दिल्ली में दलित वेंचर कैपिटल फंड शुरू करने का ऐलान, दलित पूंजीवाद का सवाल इन दिनों सुर्खियों में है। पिछले साल दिसंबर के अंत में पहले दलित ट्रेड फेयर का आयोजन हुआ था, जिसे रतन टाटा, गोदरेज जैसे अग्रणी उद्योगपतियों ने भी संबोधित किया था। वर्ष 2005 में गठित चेंबर ऑफ कॉमर्स की शाखाएं 18 राज्यों में हैं, जिसके साथ 3,000 उद्यमी जुड़े हुए हैं और जिनका सालाना टर्नओवर अब बीस हजार करोड़ को लांघ रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि दलित पूंजीवाद के आगमन को किस प्रकार देखा जाए?

विस्तार में जाने से पहले यह समझना जरूरी है कि इस घटनाक्रम ने मनु के उस विधान को चुनौती दी है, जिसमें शूद्रों के लिए अमानवीय और अपमानजनक पेशे तय किए गए थे और उन्हें किसी भी किस्म की आर्थिक गतिविधि से रोका गया था। कोई भी इस परिघटना के जनतांत्रिक पहलू की संभावना से इनकार नहीं कर सकता, जिससे समाज में आर्थिक गतिविधियों पर चंद जातियों या समुदायों के वर्चस्व को चुनौती मिलना तय है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या इससे दलित मानस पर मुक्तिदायी प्रभाव पड़ेगा या इसे दलितों को व्यवस्था में समाहित करने की एक अन्य रणनीति के तौर पर समझा जाना चाहिए।
 
ऐसे तमाम उदाहरण आज पेश किए जा सकते हैं, जो इस बात को प्रमाणित करते हैं कि किस तरह भौतिक प्रगति की तमाम छलांगों के बावजूद समाज में जाति बनी रहती है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीज के उत्तरी भारत के दो शहरों पर किए गए हालिया अनुसंधान में पाया गया कि हालांकि बाजार अर्थव्यवस्था ने दलितों को कई तरह की परेशानियों से निजात दिलाई है, मगर दलित उद्यमियों को आज भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

इसमें कुछ ऐसे मामलों का भी जिक्र है, जो बताते हैं कि किस तरह अपने पारंपरिक पेशे को लांघने पर जाति ही सबसे बड़ी बाधा बनती है। 75 वर्ष के सिरसवाल पानीपत के सबसे पुराने हैंडलूम यूनिट चलानेवालों में से हैं। उनके मुताबिक, उन्हें सफलता इसी वजह से मिली, क्योंकि उन्होंने अपनी असल जाति (वाल्मीकि) लोगों से छिपाई। जब ग्राहकों को उनकी जाति का पता चला, तो उन्होंने उनका बहिष्कार किया। बैंक भी उन्हें आसानी से कर्ज देने को तैयार नहीं थे, क्योंकि जाति उनके लिए भी गंभीर मसला था और बाजार मे बहुत कम दलित उद्योगपति थे, जो अपने संसाधनों से उनकी मदद कर पाते।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम्स के प्रोफेसर डॉ. सुरिंदर जोधका की मानें, तो शहरी इलाकों में भी, जाति के आधार पर भेदभाव मौजूद है, खासकर रोजगार के क्षेत्र में। दरअसल, इसके पीछे यह पूर्वाग्रह मौजूद है कि अनुसूचित जाति के लोगों में प्रतिभा की कमी होती है और वे औपचारिक रोजगार के लिए अनुपयुक्त हैं। 

समस्या का एक पहलू और भी है। मान लीजिए कि वर्तमान नव उदारवादी पूंजीवाद के दौर में पूंजी के मालिकान दलित हों, तो क्या वे पूंजी का प्रबंधन अलग ढंग से करेंगे। सचाई यह है कि चाहे पूंजीवाद को किसी भी तरह से पारिभाषित क्यों न किया जाए, जमीनी स्तर पर कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है। चूंकि दलित पूंजीवाद के प्रणेता एक व्यापक राजनीतिक उद्देश्य को पूरा करने के साथ मौजूदा शासन को भी वैधता प्रदान करने का काम कर रहे हैं, इसलिए लाजिमी है कि सत्ताधारी लोग सभी स्तरों पर उन्हें अपना समर्थन दे रहे हैं और भविष्य में भी देते रहेंगे।

  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

स्पॉटलाइट

इन खास मौकों पर हमेशा झूठ बोलती हैं लड़कियां, ऐसे करें पता

  • शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
  • +

आसमान में दिखा रहस्यमयी शहर, बिना वीडियो देखे नहीं होगा यकीन

  • शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
  • +

बीच में जिम छोड़ना पड़ सकता है सेहत पर भारी, हो सकती हैं गंभीर बीमारी

  • शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
  • +

हिट फिल्में देकर इस हीरोइन ने मचाया था तहलका, अब इस कंपनी में कर रही है काम

  • शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
  • +

मुश्किल वक्त में सलमान बने थे इंदर कुमार का सहारा, पूरे परिवार की ऐसे की थी मदद

  • शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
  • +

Most Read

निवेश के बिना कैसे होगी अच्छी खेती

How good the farming will be without investment
  • गुरुवार, 27 जुलाई 2017
  • +

तेल कंपनियों का विलय काफी नहीं

oil companies merger is not enough
  • सोमवार, 24 जुलाई 2017
  • +

खतरे में नवाज की कुर्सी

Nawaz government in Danger
  • शनिवार, 22 जुलाई 2017
  • +

नगालैंड में घूमा सत्ता का चक्र

Circle of power turn in Nagaland
  • गुरुवार, 27 जुलाई 2017
  • +

परिवहन की जीवन रेखा बनें जलमार्ग

waterways be lifeline for transportation
  • सोमवार, 24 जुलाई 2017
  • +

मतदाताओं के मन में क्या चलता है

What does the voters think
  • गुरुवार, 27 जुलाई 2017
  • +
Top
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!